Sunday, May 22, 2011

लकीरें

लकीरें



किस्मत का फैसला करती हैं 
हाथों की लकीरें 
और बदकिस्मती भी तय 
ये लकीरें ही करती हैं |

दो हाथों की लकीरें 
एक तक़दीर से खेलती हैं ,
कभी संवार देती हैं उसे 
तो कभी बिगड़ देती हैं |
मगर दिलों में खिंची लकीरें 
दरारें बन जाती हैं ,
और चौड़ी होकर दरारें 
बन जाती हैं खाईयाँ |
खाई के दो हिस्से अगर 
कोशिश भी करें मिलने की ,
और बड़ी खाईयाँ 
बन जाती हैं नाकामी में |
और जब लकीरें खींचती हैं 
दो मुल्कों के बीच
तो बदकिस्मती शुरू 
हो जाती है आवाम की |
लकवा मार जाता है 
दोनों ही मुल्कों को ,
होंठ कहते नहीं , कान सुनते नहीं ,
आँखों के सामने भी धुंधलका सा होता है |
बातें होतो हैं तो 
सिर्फ तोपों और बंदूकों से ,
जिसमे झुलसकर दम 
तोड़ देती है इंसानियत |
मगर खिंची हुई लकीर को 
मिटाता नहीं कोई ,
एक बड़ी लकीर खींच देता है ,
पहली को छोटी करने को |

                                      "प्रवेश " 

Wednesday, May 18, 2011

परमानेंट स्टाफ

परमानेंट स्टाफ 

क ने ख से कहा एक दिन ,
क्यों देर से आते आप हैं ?
ख ने कहा नादान हो तुम ,
हम परमानेंट स्टाफ हैं |

देर से आना , जल्दी जाना ,
शान हमारी बढती है ,
इससे परमानेंट होने की 
पहचान हमारी बढती है |

हम एक दिन काम पे न भी आयें ,
सात खून हमारे माफ़ हैं ,
तुम दैनिक मजदूरी वाले ,
हम परमानेंट स्टाफ हैं |

एक साल में नहीं कमा 
पाते हो मजदूरी से जितना ,
एक महीने में ही मजे से 
पाते हैं हम वेतन उतना |

ये पिछले पुण्य हमारे हैं ,
पिछले ही तुम्हारे पाप हैं ,
इसीलिये तुम दैनिक हो ,
हम परमानेंट स्टाफ हैं |

सुनकर ख की बात ,
क ने चुप्पी साध ली ,
चुपचाप लग गया काम में ,
शिकायत की गठरी बाँध ली |

मजदूरी से बच्चे पालेगा,
 छः बच्चों का बाप है ,
इनका भला क्या जाता है ,
ये तो परमानेंट स्टाफ है |

                                       "प्रवेश"

Saturday, May 14, 2011

परीक्षा परिणाम


परीक्षा परिणाम 

आजकल गोलू मंदिर जाता ,
कभी न मंदिर जाने वाला |
गुप्त सूत्रों से पता चला है ,
परीक्षा परिणाम है आने वाला |

सुबह - शाम एक -एक घंटा ,
मंदिर में बिताता है |
माथा टेकता, मिन्नत करता ,
भजन भी जोर से गाता है |

लौटता है जब घर को ,
तो ये बात अवश्य कह आता है ,
भगवन ! गणित में पास करा दे ,
भला तेरा क्या जाता है |

कल रात अक्ल की देवी ,
गोलू के सपने में आई ,
गणित के पेपर से पहले की
सारी मस्ती याद दिलाई |

बोली वत्स ! उस दिन तू अगर ,
कनौट प्लेस नहीं जाता ,
एक घंटा और पढता ,
दो प्रश्न और हल कर आता |

मक्खी का दशमलव भी ,
वहीँ पर काम आता है ,
जहाँ पूरा प्रश्न
विधिवत हल किया जाता है |

                                              "प्रवेश"

Tuesday, May 10, 2011

पानी और शराब

पानी और शराब 

अजी ! खाली दिमाग 
शैतान का घर ,
यूँ ही बैठे -बैठे 
खयाल आ गया |

दोनों ही तरल 
और पेय हैं ,
फिर भी दोनों में 
भेदभाव किया जाता है ,
शराब तो पी जाती है ,
जबकि पानी पिया जाता है |

फिर खयाल आया कि
पानी से कोई
 बहकता नहीं ,
पानी पीकर ना ही
 बना है कभी ,
पानी पीकर कोई 
घर उजड़ता नहीं |
शराब से ज्यादा
 जरूरी है पानी ,
फिर भी पानी की
 किसी को लत नहीं |

कई गुना कम कीमत है 
एक बोतल पानी की ,
इसीलिये पानी की 
क़द्र भी नहीं की जाती है ,
अब समझ में आया,
क्यों पिया जाता है पानी ,
और शराब क्यों पी जाती है |

                                                "प्रवेश"

Saturday, May 7, 2011

कभी - कभी

कभी - कभी 

जिनके नाम से चलती थी साँसे ,
वही अब कभी - कभी ख्यालों में आते हैं |

जिनके दीदार से होती थी सुबह ,
जिनकी आगोश में गुजरता था दिन ,
जिनके नाम से ढलती थी शाम ,
वही अब कभी - कभी ख्यालों में आते हैं |

कभी जिनको हमने खुदा माना अपना ,
और सदा सर- आँखों पर बिठाया ,
कभी जिनके संग में खायी थी कसमें,
वही अब कभी - कभी ख्यालों में आते हैं |

हमने सदा ही ख़ुशी चाही जिनकी ,
साया कभी गम का पड़ने दिया ना,
इतना बड़ा गम दिया है जिन्होंने ,
वही अब कभी - कभी ख्यालों में आते हैं |

हमको पता न हमारी खता का ,
फिर भी उन्होंने सजा हमको दी है ,
कभी जिनकी राहों के काँटे चुगे थे ,
वही अब कभी - कभी ख्यालों में आते हैं |

अब एक ख्वाहिश है ग़मगीन दिल की ,
और हम यही माँगते हैं खुदा से ,
कभी हम भी जाएँ ख्यालों में उनके ,
जो कभी - कभी हमारे ख्यालों में आते हैं |

                                                        "प्रवेश"

कभी - कभी का मतलब अक्सर नहीं बल्कि बहुत कम (rare ) है | 

Wednesday, May 4, 2011

पिता हूँ मैं !

पिता हूँ मैं !

बचपन में बहन की हत्या का 
कारण बना दिया मुझको ,
कोई जुर्म नहीं किया,
मुजरिम अकारण बना दिया मुझको |

दादी माँ को नारी होकर 
पोती से है रोष बड़ा ,
इसमें मेरा, पिताजी और
 दादाजी का दोष है क्या ?

बड़ा हुआ तो दहेज़ का झोला 
मेरे कंधे पर टांग दिया,
जो बड़ी बहन को दिया,
वही छोटी ने भी मांग लिया |

दिन भर मेहनत - मजदूरी से
जो भी कमाकर लाता हूँ ,
एक निवाला कम खाता हूँ ,
पर बच्चों को पढ़ता हूँ |

बच्चों की कलम - दावात की खातिर 
एक चाय नहीं पीता हूँ मैं ,
बाकी समाज से गिला नहीं,
कवियों से उपेक्षित पिता हूँ मैं |

जब बच्चे तकलीफ में होते हैं,
मैं भी तकलीफ में होता हूँ ,
माँ तो आँसू बहा ले लेकिन   
मैं दिल ही दिल में रोता हूँ |

ये  बच्चे जीते हैं मुझमे ,
इन बच्चों में जीता हूँ मैं ,
बाकी समाज से गिला नहीं,
कवियों से उपेक्षित पिता हूँ मैं |

कवियों को लगता है मुझे
बच्चों और समाज की फ़िक्र नहीं,
इसीलिए किसी रचना में,
मेरा कोई जिक्र नहीं |

बच्चों और समाज की चिंता में 
भूसे की जलती चिता हूँ मैं,
बाकी समाज से गिला नहीं,
कवियों से उपेक्षित पिता हूँ मैं |


                                                   "प्रवेश"






Thursday, April 28, 2011

साम - दाम - दण्ड - भेद

साम - दाम  - भेद - दण्ड

सर्वोत्तम उपाय राजनीति में 
बतलाया है साम ,
लेकिन इस उपाय से 
अब कहाँ बनते हैं काम !

साम वहाँ अपनाया जाता ,
जहाँ समझदारी हो ,
वहाँ भला किस काम का 
जहाँ समझ ही भारी हो !

दाम को बताया गया दूसरा उपाय ,
घर बुलाओ  किसी को पीने चाय ,
दे दो उसे मुंह माँगा दाम ,
कौन रोक सकता है फिर आपका काम !

यूँ तो दाम से ही बन जाते हैं काम ,
न बने तो तनिक भी न कीजिये खेद ,
बदलिये दल और निकालिये काम ,
बचाइये दाम और दीजिये भेद |

चौथे उपाय की तो बात ही न कीजिये 
दण्ड कौन भला राजनेताओं को देता है !
कभी चले भी जाएँ अगर स्पेशल जेल ,
तो प्रशासन उन्हें तमाम सुविधाएँ देता है |
                                                                            
                                                                              "प्रवेश" 

Thursday, April 21, 2011

ट्यूशन

ट्यूशन 

प्राथमिक कक्षाओं तक 
सोहन बड़ा होशियार था ,
शिक्षकों को उस पर नाज था ,
सबको लगाव और प्यार था |

उसी गाँव के माध्यमिक में 
सोहन के पिता अध्यापक हैं ,
वहीँ श्रीमान शर्मा जी ,
गणित के अध्यापक हैं |

शर्मा जी का मिंटू थोडा 
फितरत से उद्दण्ड है ,
कभी नहीं अव्वल आया 
जाने फिर क्यों घमण्ड है !

शर्मा जी बच्चों को घर पर 
ट्यूशन भी पढ़ाते हैं ,
जितनी नहीं तनख्वाह , उससे 
ज्यादा घर पर कमाते हैं |

जो बच्चे ट्यूशन पढ़ते हैं ,
शर्मा जी के ख़ास होते हैं ,
गणित विषय की परीक्षा में 
वही बच्चे पास होते हैं |

सोहन तो होशियार है ,
कभी ट्यूशन नहीं पढता ,
इसीलिए सोहन को 
मिंटू पसंद नहीं करता |

परीक्षा हुई शुरू ,
जैसे मिंटू के लिए खेल हो गया ,
अब तक अव्वल आने वाला 
सोहन गणित में फेल हो गया |

                                             " प्रवेश"

Monday, April 18, 2011

सर्वोपरि माँ

सर्वोपरि माँ 

चाहे अमृत पान किया हो ,
चाहे खायी रसमलाई ,
सब कुछ ही बेकार है ,
जब तक माँ की डांट न खायी |

चाहे आलीशान भवन और 
सारी सुख - सुविधा हो जुटाई,
सब कुछ ही बेकार है अगर 
माँ के आँचल की छाँव न पाई |

चाहे दान किया हो लाखों ,
चाहे स्वर्ण नगरी हो बसाई ,
सब कुछ ही बेकार है अगर 
माँ के मन को ठेस लगाईं |

चाहे चारों धाम नहाये ,
चाहे धूनी - भस्म रमाई ,
सब कुछ ही बेकार है अगर 
माँ की क़द्र नहीं की भाई |

चाहे शीश नवाया प्रभु को ,
चाहे कीर्तन - भजन कराई ,
सब कुछ ही बेकार है ,
माँ को अगर न धोक लगाई |

                                             " प्रवेश "

Friday, April 15, 2011

तेरा दीदार

तेरा दीदार 

तेरी एक झलक पाने को ,
मचल रहे हैं लोग |

दीदार - ए - हुस्न तेरा करने को ,
खास से आम में ,
बदल रहे हैं लोग |

मेरे शहर में तेरी मौजूदगी का चर्चा है ,
बेसबर , घरों से 
निकल रहे हैं लोग |

तेरे दीदार को तक़दीर की मेहर समझें ,
कड़कती धूप में बेताब 
चल रहे हैं लोग |

तेरे दीदार में जब मेरा भी दीदार पाया ,
दिल सुलगने लगे अंगार से ,
जल रहे हैं लोग |

                                         "प्रवेश"

Saturday, April 9, 2011

अन्नागिरी

अन्नागिरी 

बदल रहा इतिहास 
जुड़ रहा एक नया पन्ना,
गाँधी के अवतार में 
अवतरित हुए श्री अन्ना |

अन्न ना ग्रहण किया 
आमरण का प्रण लिया ,
जागृति की लहर  फैली 
हुआ हर कोई चौकन्ना |

सुनी जाती गर जन - जन की 
क्यों आती नौबत अनशन की ,
बहुत निचोड़े जा चुके हैं 
जैसे मशीन में गन्ना |

माँ भारती के लाल आये 
दूध पीते बाल आये ,
पालकी छोड़ कहार भागे,
घोड़ी छोड़ दौड़े बन्ना |

लड़ने बिना ही ढाल आये 
ले हाथ में मशाल आये,
भ्रष्टाचार का अंत और 
परिवर्तन की तमन्ना |

                                    "प्रवेश"

Wednesday, April 6, 2011

ग़ुरबत

ग़ुरबत 

सब कुछ दाँव पर लगा बैठे ,
थोडा बहुत पाने को ,
कुछ भी हासिल कर न पाये,
सब कुछ भी खोने से |

दास्तान - ए - ग़ुरबत 
बयाँ भी  कैसे करें,
पसीजते नहीं अब दिल ,
फूट -फूट कर रोने से |

शेर के साथ - साथ 
सियार भी शिकारी हो गए ,
जान के लाले पड़े हैं ,
भागते मृगछौने से |

जहर पीकर सोते हैं तो
आँख खुल जाती है सुबह ,
आँख नहीं खुलती है ,
दवा पीकर सोने से |

भ्रष्ट शासन में हमारी 
हालत सुधर सकती नहीं ,
चाहे कर लो कोशिशें ,
खेतों में सोना बोने से |

                                           "प्रवेश"

Monday, April 4, 2011

सादगी

सादगी 

दोनों हथेलियों की 
रेखाओं का मिल जाना ,
गर्दन में हरकत हो ,
थोडा सिर का झुक जाना |
सादगी की और 
पहचान क्या होती है !

दूर -दूर तक 
" मैं " का नाम न हो ,
सब खास हों निगाह में,
कोई आम न हो |
सादगी की और 
पहचान क्या होती है !

जिससे भी मिलो,
मुस्कराकर मिलो ,
सब शिकवे गिले 
भुलाकर मिलो |
सादगी की और 
पहचान क्या होती है !

कोई भी टीस 
 न मन में रहे ,
कोई उलझन नहीं 
जीवन में रहे |
सादगी की और 
पहचान क्या होती है !

                                       "प्रवेश"