रास्ते का पत्थर
वो ठोकरें खाता ,
मगर लोग गिर जाते |
किसी के जूते फट जाते ,
कोई अंगूठे पे चोट खाता ,
कोई मुँह के बल गिरता ,
किसी के दाँत गिर जाते |
कोई जो संभल कर चलता
तो लाँघकर निकल जाता ,
अपनी ही धुन के मतवाले
अक्सर चोट खा जाते |
कोई इतना नहीं करता
कि झुककर उठा दे उसको ,
किनारे रख दे ताकि
और कोई चोट न खाये |
मिटटी - पानी की संगत से
वो जम चूका है अब वहीं,
बिन आयास - आलम्ब के
अब उखड सकता है नहीं |
जाने कितनी पीढियाँ
अभी और ठोकर खायेंगी !
उखाड़ फेंकेंगी उसे
या लाँघकर ही जायेंगी |
वक़्त रहते रास्ते का
वो पत्थर हटा दिया जाता ,
क्यों लाँघना होता उसे ,
क्यों बेवजह कोई चोट खाता !
"प्रवेश "
रूढ़िवादिता को रास्ते का पत्थर कहा गया है |