Friday, September 23, 2011

रास्ते का पत्थर

रास्ते का पत्थर 

वो ठोकरें खाता ,
मगर लोग गिर जाते |
किसी के जूते फट जाते ,
कोई अंगूठे पे चोट खाता ,
कोई मुँह के बल गिरता ,
किसी के दाँत गिर जाते |
कोई जो संभल कर चलता 
तो लाँघकर निकल जाता ,
अपनी ही धुन के मतवाले 
अक्सर चोट खा जाते |
कोई इतना नहीं करता 
कि झुककर उठा दे उसको ,
किनारे रख दे ताकि 
और कोई चोट न खाये |
मिटटी - पानी की संगत से 
वो जम चूका है अब वहीं, 
बिन आयास - आलम्ब के 
अब उखड सकता है नहीं |
जाने कितनी पीढियाँ
अभी और ठोकर खायेंगी !
उखाड़ फेंकेंगी उसे 
या लाँघकर ही जायेंगी |
वक़्त रहते रास्ते का 
वो पत्थर हटा दिया जाता ,
क्यों लाँघना होता उसे ,
क्यों बेवजह कोई चोट खाता !

                                                         "प्रवेश "

रूढ़िवादिता को रास्ते का पत्थर कहा गया है |

                                                                     

Saturday, September 17, 2011

ये दुनिया ऐसी ही है !

ये दुनिया ऐसी ही है !

कहीं पर डोली उठती है ,
और कहीं पर उठें जनाजे |
किसी जगह मातम का क्रंदन ,
और कहीं पर बजते बाजे |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कहीं खेल में हुई सियासत ,
कहीं सियासत बन गयी खेल |
उड़ते जहाज का पहिया फटता ,
खड़ी - खड़ी टकराती रेल |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कोई सबको अपना समझे ,
कोई अपनी ही दुनिया में मगन है |
कहीं सुधा प्रेम की बरसे ,
और कहीं ईर्ष्या की अगन है |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कोई कहे देश मेरा है (अधिकार जताना)
कोई खुद को देश का माने (कर्तव्य निर्वाह )
कोई देना न चाहे धेला ,
कोई चला सर्वस्व लुटाने |

ये दुनिया ऐसी ही है !

किसी को मेवों से नफरत है ,
कोई एक गास को तरसे |
चैन किसी को नहीं महल में ,
कोई खुश चतुर्दिक घर से |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कहीं निरा सूखा पड़ा है ,
कहीं कहर बरपाती बाढ़ |
कहीं द्वेष और घृणा ही है ,
और कहीं प्रेम - प्रगाढ़ |

ये दुनिया ऐसी ही है ! 

                                   "प्रवेश "

Wednesday, September 14, 2011

हिंदी का पुट


हिंदी का पुट


आमजन की बोली में , हँसी में ठिठोली में 

दीन की पुकार में , नेता की जयकार में 

हिंदी का पुट है |



गृहस्थी के भोग में , जोगी के जोग में 

बहुत बड़े सोची में , सड़क के मोची में 

हिंदी का पुट है |



अनाड़ी की गाली में , महफ़िल ए कव्वाली में 

बोली में किसान की , शोध में विज्ञान की 

हिंदी का पुट है |



माँ के प्यार में , बाप के दुलार में 

राशन की दुकान में , सपनों की उड़ान में 

हिंदी का पुट है |



अनशन में - आन्दोलन में , घृणा में - सम्मोहन में 

गाड़ी में रेल में , प्रतिस्पर्धा और खेल में 

हिंदी का पुट है |


                                                           "प्रवेश "

Friday, September 9, 2011

मौसम का मिजाज !


मौसम का मिजाज !

कभी देखा है बदलते हुये मौसम का मिजाज !

नहीं अगर , तो कभी मेरे शहर में आइये |



इस तरह शाम ढले लुढ़कते हैं लोग ,

जैसे टेबल के कोने पे रखा , हिल जाये गिलास |



रोज ही लोग हलाल होते हैं बकरों की तरह ,

कौन रखता है भला इतनी लाशों का हिसाब |



बेआबरू होती हैं बेटियाँ , केले की तरह ,

जिस्म बिकते हैं सरेआम , कौड़ियों के हिसाब |


कभी देखा है बदलते हुये मौसमका मिजाज !!

                                                              "प्रवेश "

Thursday, September 8, 2011

वाह री मेरी पिलानी

वाह री मेरी पिलानी 

वाह री मेरी पिलानी 
सड़क में गड्ढे ही गड्ढे 
गड्ढों में पानी ही पानी 
वाह री मेरी पिलानी |

यूँ तो बहुत कुछ है ,
सभाओं में बोलने के लिए |
एक ही बारिश काफी है ,
पोल खोलने के लिए | 
सभाओं में सुनी जाती है 
कर्णप्रिय और अमृत बानी |
वाह री मेरी पिलानी |

सड़क में गाड़ियों से 
गड्ढों की संख्या ज्यादा है |
अगले चुनाव से पहले 
सड़क सुधारने का भी वादा  है |
कथनी से करनी की 
है रंजिश बड़ी पुरानी |
वाह री मेरी पिलानी |

कहीं कूड़ा , कहीं कीचड 
ख़बरें भी हैं अख़बारों में |
साफ़- सफाई के अनगिनत 
फायदे  भी हैं इश्तहारों  में |
ये  सब सच है, मिथ्या नहीं ,
समझें न मनगढ़ंत कहानी |
वाह री वाह , वाह री वाह ,
वाह री मेरी पिलानी |

                                         "प्रवेश "

Monday, September 5, 2011

शिक्षक

शिक्षक 

जान फूँक दे पत्थर में 
और जड़ को चेतन कर दे |
सच्ची राह दिखाकर वो 
निश्छल , निर्मल मन कर दे |

हों अगर निराश कभी 
वो फिर से आस जगाता है |
पस्त होते हौंसलों में 
आत्मविश्वास जगाता है |

स्नेहमय ह्रदय कभी है .
कभी कठोर व्यव्हार भी |
दण्डित भी करता है वही ,
देता है अगणित प्यार भी |

मानवता का परम मित्र 
धर्म का सच्चा रक्षक है |
भगवान  से भी ऊँचा दर्जा 
मिलता है जिसे वो शिक्षक है |

केवल पुस्तक पढ़ाने  वाला 
महज एक अध्यापक है |
जीने की कला सिखाने वाला ,
सच्चे अर्थों में शिक्षक है |

                                  "प्रवेश "

Saturday, August 27, 2011

क्यों बड़ा हो गया !


क्यों बड़ा हो गया !


कितने अच्छे दिन थे वो 

जब सच - झूठ का पता न था |

एहसास ख़ुशी - गम का न था ,

छाँव - धूप का पता न था |



जो भी होता , अच्छा होता ,

कुछ बुरा कभी होता न था |

रूह कभी दुखती न थी ,

मन कभी रोता न था |



रोने की वजह मालूम न थी |

हँसने का कारण पता न था ,

सब अपने थे, न पराया कोई ,

कभी राग - द्वेष में फंसा न था |



क्यों होश संभाला मैंने और 

क्यों लगा समझने खुशियाँ - गम |

क्यों घृणा - प्रेम के भाव जगे ,

क्यों समझ आया रहम - ओ- सितम |



क्यों चलने लगा दुनिया के संग ,

क्यों कन्धा मिलाकर खड़ा हो गया !

क्यों बचपन छोड़ गया मुझको ,

जाने क्यों मैं बड़ा हो गया !!

                                           "प्रवेश "

Friday, August 19, 2011

रुक जाना नहीं


रुक जाना नहीं

उठो , जागो , आगे बढ़ो 

अब कदम रुकने पाये ना ,

बेईमान ठेकेदारों के सम्मुख 

मस्तक ये झुकने पाये ना |



अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति है ,

सब जानकर यदि मौन हो ,

तंत्र को बुरा या भला 

कहने वाले फिर कौन हो !



न बंद नयनों को करो ,

पर  जोश  पर लगाम हो ,

सजग हर इन्द्री रहे ,

मन को नहीं विश्राम हो |



कुछ न  हो , एक जुनूं हो 

अन्याय के प्रतिरोध का ,

सच्ची लगन सच की तरफ ,

न भाव हो प्रतिशोध का |



संघर्ष आज का तुम्हारा 

व्यर्थ जायेगा नहीं ,

ऐसे पावन यज्ञ का फिर 

मुहूर्त आयेगा नहीं |
                                          

                                    "प्रवेश "

कीचड़ के छींटे !

कीचड़ के छींटे !

बरसात का मौसम है ,
बरसाती बात कहता हूँ |
जो आज घटी मेरे संग ,
वो वारदात कहता हूँ |

जलमग्न और अधपकी सड़क पर 
मैं साईकिल पर सवार था |
एक मनचले चौपहिये वाले को 
अय्याशी का बुखार था |

उस जलमग्न खंडित सड़क पर 
उसकी जो रफ़्तार थी |
मेरे संग दुआ थी आपकी ,
रहमत परवरदिगार की |

मगर मेरी पतलून पर 
कीचड़ के छींटे आ गये |
और मेरे मस्तिष्क में 
एक प्रश्न सा जगा गये |

व्यवस्था - विकास - व्यवहार का 
असर चैन - ओ - सुकून पर |
कीचड़ के छींटे कहाँ पड़े ,
इन तीन पर या पतलून पर |


                                            "प्रवेश "

Tuesday, August 9, 2011

जबान की सफाई


जबान की सफाई 

कभी -कभी तो साँसों में 
इतनी बदबू आती है ,
खुशमिजाज महबूबा भी 
पल में बेरूख हो जाती है |

साँसों की बदबू मिलन को 
पल में कर दे जुदाई ,
इसीलिये जरूरी है ,
जबान की सफाई |

जबान की गन्दगी से 
चरित्र से भी बू आती है ,
महफ़िल में रुसवा होते हैं ,
इज्जत रफू हो जाती है |

भाई को दुश्मन बना दे 
दुश्मन को बना दे भाई ,
निहायत ही जरूरी है ,
जबान की सफाई |

                             "प्रवेश "

Tuesday, August 2, 2011

बिल



बिल 



आस्तीन में रहने वाले ,

चले हैं नया बिल बनाने |


कैसा होगा बिल का ढांचा ,

झूठा हँसेगा , फँसेगा सांचा |


निकल पायेगा यहाँ से कौन ,

जो बिल निर्माण में रहेगा मौन |


जिसने भी आवाज उठाई ,

मार डालेंगे उसे कसाई |


जो भी करेगा बिल की बात ,

रखे याद चार जून की रात |


बाहर है तबला , अन्दर ताल ,

देखें क्या होगा बिल का हाल !

                                             "प्रवेश "

Saturday, July 30, 2011

जिन्दा फ़रिश्ते

जिन्दा फ़रिश्ते 

हैं जिन्दा फ़रिश्ते अभी घर में मेरे ,
मुझे मंदिर में जाने की जरूरत नहीं |

इनकी खुशामद ही मन से करूँ ,
पत्थरों को रिझाने की जरूरत नहीं |

बुतपरस्ती नहीं है गंवारा मुझे ,
माँ सी ज़माने में मूरत  नहीं |

वालिद का साया है सर पे मेरे ,
मुझे आशियाने की जरूरत नहीं  |

इनका रहम - ओ - करम है अगर ,
फिर गंगा नहाने की जरूरत नहीं |

खुद को खड़ा कर लूँ इनकी जगह ,
फिर किसी भी बहाने की जरूरत नहीं |


                                                           "प्रवेश "

Wednesday, July 27, 2011

बुढ़ापा - उपेक्षा

बुढ़ापा - उपेक्षा 


जितना प्यार करता है प्यारे 

अपने प्यारे पप्पी से |

आधा भी कर पाए अगर तू 

बूढ़े पापा - मम्मी से |



उनका बुढ़ापा सुधर जायेगा 

तू भी तो कल इधर आएगा 

साथ न होगा पप्पी तेरा 

बच्चों के ही घर जायेगा |



पेड़ लगाकर कीकर का ,

उम्मीद न कर तू आम की |

एक पल में ही भूल गया ,

इनकी सेवा उम्र तमाम की !



याद अगर है तुझको ,

तेरी खातिर इनके कुछ बलिदान |

इनकी सेवा  कर पहले ,

खुश हो जायेंगे सब भगवान |



कुछ वक़्त निकाल इनकी खातिर ,

कुछ सोच कर विचार कर |

प्यार चाहता है अगर ,

तो माँ - बाप से प्यार कर |

                                        

                                         "प्रवेश "