Thursday, April 28, 2011

साम - दाम - दण्ड - भेद

साम - दाम  - भेद - दण्ड

सर्वोत्तम उपाय राजनीति में 
बतलाया है साम ,
लेकिन इस उपाय से 
अब कहाँ बनते हैं काम !

साम वहाँ अपनाया जाता ,
जहाँ समझदारी हो ,
वहाँ भला किस काम का 
जहाँ समझ ही भारी हो !

दाम को बताया गया दूसरा उपाय ,
घर बुलाओ  किसी को पीने चाय ,
दे दो उसे मुंह माँगा दाम ,
कौन रोक सकता है फिर आपका काम !

यूँ तो दाम से ही बन जाते हैं काम ,
न बने तो तनिक भी न कीजिये खेद ,
बदलिये दल और निकालिये काम ,
बचाइये दाम और दीजिये भेद |

चौथे उपाय की तो बात ही न कीजिये 
दण्ड कौन भला राजनेताओं को देता है !
कभी चले भी जाएँ अगर स्पेशल जेल ,
तो प्रशासन उन्हें तमाम सुविधाएँ देता है |
                                                                            
                                                                              "प्रवेश" 

Thursday, April 21, 2011

ट्यूशन

ट्यूशन 

प्राथमिक कक्षाओं तक 
सोहन बड़ा होशियार था ,
शिक्षकों को उस पर नाज था ,
सबको लगाव और प्यार था |

उसी गाँव के माध्यमिक में 
सोहन के पिता अध्यापक हैं ,
वहीँ श्रीमान शर्मा जी ,
गणित के अध्यापक हैं |

शर्मा जी का मिंटू थोडा 
फितरत से उद्दण्ड है ,
कभी नहीं अव्वल आया 
जाने फिर क्यों घमण्ड है !

शर्मा जी बच्चों को घर पर 
ट्यूशन भी पढ़ाते हैं ,
जितनी नहीं तनख्वाह , उससे 
ज्यादा घर पर कमाते हैं |

जो बच्चे ट्यूशन पढ़ते हैं ,
शर्मा जी के ख़ास होते हैं ,
गणित विषय की परीक्षा में 
वही बच्चे पास होते हैं |

सोहन तो होशियार है ,
कभी ट्यूशन नहीं पढता ,
इसीलिए सोहन को 
मिंटू पसंद नहीं करता |

परीक्षा हुई शुरू ,
जैसे मिंटू के लिए खेल हो गया ,
अब तक अव्वल आने वाला 
सोहन गणित में फेल हो गया |

                                             " प्रवेश"

Monday, April 18, 2011

सर्वोपरि माँ

सर्वोपरि माँ 

चाहे अमृत पान किया हो ,
चाहे खायी रसमलाई ,
सब कुछ ही बेकार है ,
जब तक माँ की डांट न खायी |

चाहे आलीशान भवन और 
सारी सुख - सुविधा हो जुटाई,
सब कुछ ही बेकार है अगर 
माँ के आँचल की छाँव न पाई |

चाहे दान किया हो लाखों ,
चाहे स्वर्ण नगरी हो बसाई ,
सब कुछ ही बेकार है अगर 
माँ के मन को ठेस लगाईं |

चाहे चारों धाम नहाये ,
चाहे धूनी - भस्म रमाई ,
सब कुछ ही बेकार है अगर 
माँ की क़द्र नहीं की भाई |

चाहे शीश नवाया प्रभु को ,
चाहे कीर्तन - भजन कराई ,
सब कुछ ही बेकार है ,
माँ को अगर न धोक लगाई |

                                             " प्रवेश "

Friday, April 15, 2011

तेरा दीदार

तेरा दीदार 

तेरी एक झलक पाने को ,
मचल रहे हैं लोग |

दीदार - ए - हुस्न तेरा करने को ,
खास से आम में ,
बदल रहे हैं लोग |

मेरे शहर में तेरी मौजूदगी का चर्चा है ,
बेसबर , घरों से 
निकल रहे हैं लोग |

तेरे दीदार को तक़दीर की मेहर समझें ,
कड़कती धूप में बेताब 
चल रहे हैं लोग |

तेरे दीदार में जब मेरा भी दीदार पाया ,
दिल सुलगने लगे अंगार से ,
जल रहे हैं लोग |

                                         "प्रवेश"

Saturday, April 9, 2011

अन्नागिरी

अन्नागिरी 

बदल रहा इतिहास 
जुड़ रहा एक नया पन्ना,
गाँधी के अवतार में 
अवतरित हुए श्री अन्ना |

अन्न ना ग्रहण किया 
आमरण का प्रण लिया ,
जागृति की लहर  फैली 
हुआ हर कोई चौकन्ना |

सुनी जाती गर जन - जन की 
क्यों आती नौबत अनशन की ,
बहुत निचोड़े जा चुके हैं 
जैसे मशीन में गन्ना |

माँ भारती के लाल आये 
दूध पीते बाल आये ,
पालकी छोड़ कहार भागे,
घोड़ी छोड़ दौड़े बन्ना |

लड़ने बिना ही ढाल आये 
ले हाथ में मशाल आये,
भ्रष्टाचार का अंत और 
परिवर्तन की तमन्ना |

                                    "प्रवेश"

Wednesday, April 6, 2011

ग़ुरबत

ग़ुरबत 

सब कुछ दाँव पर लगा बैठे ,
थोडा बहुत पाने को ,
कुछ भी हासिल कर न पाये,
सब कुछ भी खोने से |

दास्तान - ए - ग़ुरबत 
बयाँ भी  कैसे करें,
पसीजते नहीं अब दिल ,
फूट -फूट कर रोने से |

शेर के साथ - साथ 
सियार भी शिकारी हो गए ,
जान के लाले पड़े हैं ,
भागते मृगछौने से |

जहर पीकर सोते हैं तो
आँख खुल जाती है सुबह ,
आँख नहीं खुलती है ,
दवा पीकर सोने से |

भ्रष्ट शासन में हमारी 
हालत सुधर सकती नहीं ,
चाहे कर लो कोशिशें ,
खेतों में सोना बोने से |

                                           "प्रवेश"

Monday, April 4, 2011

सादगी

सादगी 

दोनों हथेलियों की 
रेखाओं का मिल जाना ,
गर्दन में हरकत हो ,
थोडा सिर का झुक जाना |
सादगी की और 
पहचान क्या होती है !

दूर -दूर तक 
" मैं " का नाम न हो ,
सब खास हों निगाह में,
कोई आम न हो |
सादगी की और 
पहचान क्या होती है !

जिससे भी मिलो,
मुस्कराकर मिलो ,
सब शिकवे गिले 
भुलाकर मिलो |
सादगी की और 
पहचान क्या होती है !

कोई भी टीस 
 न मन में रहे ,
कोई उलझन नहीं 
जीवन में रहे |
सादगी की और 
पहचान क्या होती है !

                                       "प्रवेश"

Thursday, March 31, 2011

शादी कर लें

शादी कर लें 

खुद ही डाल 
पैरों में बेडी
खुद की नीलाम
आजादी कर लें ,
वे चाहते हैं ,
हम शादी कर लें |

कैसे स्वछन्द से 
नजरबन्द हो जायें ,
समय पर आना -जाना ,
उठना -बैठना, सोना  - जागना ,
कैसे इतने पाबन्द हो जायें !
कैसे खुद को गुलाम ,
उन्हें शहजादी कर लें !
वे चाहते हैं ,
हम शादी कर लें |

आज हम मालिक हैं 
अपनी मर्जी के ,
कैसे बंदिश में 
रहेंगे किसी के !
गैर - मियादी छूट को 
कैसे भला मियादी कर लें |
वे चाहते हैं ,
हम शादी कर लें |

                                      "प्रवेश"

Monday, March 28, 2011

वक़्त नहीं लगता

वक़्त नहीं लगता 

वक़्त गुजरते , वक़्त नहीं लगता |

लग जाते हैं बरसों , 
शिखर तक पहुँचते,
शिखर से उतरते , वक़्त नहीं लगता |

कल की ही बात है ,
हम दोस्त हुआ करते थे ,
रिश्ते बदलते, वक़्त नहीं लगता |

किसके वश में भला 
चाहना , न चाहना !
दिल को मचलते , वक़्त नहीं लगता |

यूँ सरेआम न 
इशारा किया कीजिये ,
लोगों को समझते , वक़्त नहीं लगता |

आज नाकारा हैं ,
तो ठुकराओगे हमें !
तकदीरें बदलते , वक़्त नहीं लगता |

अब कुछ भी कहने की 
गुंजाइश ही नहीं है , 
इरादा बदलते , वक़्त नहीं लगता |

(राजनीति से )

कर लो जतन
कल की खातिर ऐ गद्दारो,
तख्ता पलटते , वक़्त नहीं लगता |

                                                    " प्रवेश" 

Saturday, March 26, 2011

प्रेम अम्बर का धरा से

प्रेम अम्बर का धरा से

प्रेम अम्बर का धरा से 
ताकना दिन- रात ऐसे,
मूक संकेतों से करते 
हैं परस्पर बात जैसे |

रात में रोता गगन है ,
दिवस में तपती धरा है ,
मिलन हो सकता है नहीं ,
कैसी प्रेम की परंपरा है !

धीर- धारिणी पवन मार्फ़त 
भेजती सन्देश नभ को ,
गरजकर व्याकुल गगन,
कर देता है खबर सबको |

देखना बस दूर से 
पर मिल नहीं पाना परस्पर ,
सोचिये , कैसी विकट स्थिति 
झेलते हैं दोनों अक्सर |

है कोई उदहारण 
धरती - गगन के प्रेम जैसा ?
कई प्रेम - प्रसंग देखे ,
देखा कभी न प्रेम ऐसा |

                                      " प्रवेश" 

Thursday, March 24, 2011

बछिया की फ़िक्र

बछिया की फ़िक्र 

नयी ख़ुशी घर आने को थी ,
गाय दोबारा ब्याने को थी ,
सबने बछड़े की आस लगाई ,
इस बार भी बछिया ही आई |

सबको ही बछिया की फ़िक्र ,
कैसे निजात मिले ये जिक्र ,
इसकी कीमत कौन लगायेगा ,
कोई मुफ्त भी न ले जायेगा |

जब बछिया बड़ी हो जायेगी ,
और घर से बाहर जायेगी ,
छूटे सांड गली में फिरते ,
कैसे लाज बचायेगी |

अगर मिल गयी आँख किसी से ,
और जुड़ गयी काँख किसी से ,
खुद तो ये बदनाम होगी ,
घर की इज्जत नीलाम होगी |

घर वालों को कौन बताये ,
कैसे कोई उन्हें समझाये,
गायें ही बछड़े जनती हैं ,
बछिया ही गायें बनती हैं |

                                             "प्रवेश"

Tuesday, March 22, 2011

श्वान - तंत्र

श्वान - तंत्र

कुत्तों की सभा में तय हुआ ,
जब राज हमारा आयेगा,
तब कोई कुत्ता , कुत्ते की
मौत न मारा जायेगा |

किस दिन हो चुनाव , कब दें 
अंजाम चुनावी दंगल को ,
ये तय हुआ मतदान 
कराया जाये आगामी मंगल को |

"कुत्ता कल्याण संगठन " से 
टॉमी लंडूरा खड़ा हुआ ,
"कुतिया बचाओ संघ" से 
जबरू भूरा खड़ा हुआ |

टॉमी को चुनाव चिह्न मिला 
एक आँख का बिल्ला ,
जबरू चले प्रचार को ,
लेकर भौंकता पिल्ला |

टॉमी - पंथी और जबरू - पंथी 
लग गए प्रचार में ,
तू - तू , मैं -मैं , झड़प हुई 
टॉमी - जबरू के वार में |

खुजली वाले कुत्तों की गली में 
जब टॉमी जी आये ,
देख उधडती चमड़ी उनकी 
थोड़ा मुँह पिचकाये |

बोले आपकी गली में 
चिकित्सा शिविर लगायेंगे ,
निःशुल्क दवा खुजली की मिलेगी 
सब चंगे हो जायेंगे |

अगले दिन जबरू भूरा जी 
उसी गली में आये ,
सभी कुत्तों के लिये
खुजली की दवा साथ में लाये |

खुजली वाली गली में 
जबरू की जय -जयकार हुई ,
ताज्जुब , उसी गली से 
जबरू जी की हार हुई |

सारे खुजली वालों ने 
बेदुम टॉमी को वोट दिये,
जबरू जी ने दवा बाँटी
टॉमी जी ने नोट दिये |

जबरू विपक्ष में विराजे 
टॉमी जी बैठे गद्दी में ,
टॉमी - पंथी , जबरू - पंथी 
बिके नहीं फिर रद्दी में |

                                  "प्रवेश"

Saturday, March 19, 2011

जिन्हें जल्दी थी

जिन्हें जल्दी थी 

कुछ बुरे गये, कुछ भले गये,
जिन्हें जल्दी थी , वे चले गये |

कुछ दूर हमारे साथ चलें ,
अरमान ये दिल में पले गये ,
जिन्हें जल्दी थी , वे चले गए |

जो ख्वाब जुड़े थे संग उनके ,
कुछ भून दिए , कुछ तले गये ,
जिन्हें जल्दी थी , वे चले गये |

हालात , वक़्त और रब ने हमको ,
जिस रूप में ढाला, ढले गये ,
जिन्हें जल्दी थी , वे चले गये |

लौट आने की आस में उनकी ,
जलने लगे और जले गये ,
जिन्हें जल्दी थी , वे चले गये |

जल्दी जाने की होड़ में हम ,
वक़्त के हाथों मले गये ,
जिन्हें जल्दी थी , वे चले गये |

                                            "प्रवेश "