Monday, June 27, 2011

सियासी गलियारे

सियासी गलियारे 

बड़ी चहल - पहल है यहाँ ,
बड़े दिलकश नज़ारे हैं ,
ये सियासी गलियारे हैं |

यहाँ कोई दुश्मन नहीं ,
पर दोस्तों का खौफ है |
दुश्मनों से दोस्ती 
पुराना सियासी शौक है |

जुबाँ पर मीठे बोल हैं ,
मगर दिल में अंगारे हैं ,
ये सियासी गलियारे हैं |

छूना चाहो गगन तो 
ऊंचाइयों की हद नहीं |
नीचे गिरना चाहो तो 
गड्ढों की भी सरहद नहीं |

अभी बुलंद, अगले ही पल 
यहाँ गर्दिश में सितारे हैं |
ये सियासी गलियारे हैं |

यहाँ कोई जुर्म कभी ,
होता नहीं संगीन है |
घर का ही कानून है ,
तो शाम भी रंगीन है |

जनता पे लाठी तोड़ें जो ,
इस मुहल्ले के प्यारे हैं |
ये सियासी गलियारे हैं |

एक बार इन गलियों में 
जो भी प्रवेश कर जाता है |
या राज दिलों पे करता है ,
या दिल से उतर जाता है |

कितने ही बिठाये गद्दी पर,
जाने कितने उतारे हैं |
ये सियासी गलियारे हैं |


                                    "प्रवेश "

Wednesday, June 22, 2011

एक मोल की दुकान

एक मोल की दुकान

 कभी देखी है 

एक मोल की दुकान !

यहाँ एक ही भाव मिलता है 

हर एक सामान |


हर ग्राहक के लिए 

एक ही भाव ,

भेद - भाव नहीं ,

सब एक समान |


लेकिन देखा है मैंने 

यहाँ नियम बदलते ,

पल - पल हर घडी ,

इंसान दर इंसान |


ग्राहक दर ग्राहक 

 बदलता व्यवहार ,

किसी को दुत्कार 

तो किसी को सम्मान  |


चेहरा बदलते ही 

भाव भी बदलते ,

लेकिन बाहर लिखा है ,

एक मोल की दुकान |


लोकतंत्र की तुलना दुकान से की गयी है |

                              "प्रवेश "


Monday, June 20, 2011

लाल पाणी कि बोतल

लाल पाणी कि बोतल 

लाल पाणी कि बोतला सलाम तकैं |
राती ब्याव सबै कुनी फाम तकैं |

गणेश पूजा में लै तेरी मांग है गे ,
तेरी जरूरत आब हर आंग है गे ,
तू दगड़ी छै तो नि लागुन ग़म मकैं |
लाल पाणी कि बोतला सलाम तकैं |

म्यर गौं क नन -  ठुल सब तयार यार छीं ,
आब तो सैनी लै त्यारै तरफदार छीं , 
तू ना तो पसंद नि ऑन क्वे काम मकैं |
लाल पाणी कि बोतला सलाम तकैं |

हर बखत आब  त्यारै विचार कुनू ,
त्यर बिना हर घडी बीमार रहुनू ,
तू छै तो नि ऑन जर - जुकाम मकैं |
लाल पाणी कि बोतला सलाम तकैं |

ब्याव जब लेबरी कबर घर में आनू ,
सच बतूं , कसम से भौते थाकि जानू ,
त्यर द्वी घूँट दी दिनी  ऐराम मकैं |
लाल पाणी कि बोतला सलाम तकैं |

जब बै गौं - गौं में तेरी चर्चा है गे ,
तू लै खूब रंग बदलन भै गे ,
त्यर बकाई रंगोंक लै औनी नाम मकैं |
रंगीली - चंगिली  कि बोतला सलाम तकैं |

                                                         " प्रवेश"


कल का अखबार

कल का अख़बार 

कल सुबह 
साईकिल की टोकरी में बैठकर 
इस घर तक आया था ,
सबसे पहले मुझे 
दादीजी ने देखा और 
दादाजी को बताया |
दादाजी ने बड़े प्यार से 
मेरा दीदार किया |
कभी मंद- मंद मुस्काए ,
कभी भौंहे चढ़ा ली |
धीरे -धीरे  मुझे 
हर सदस्य ढूँढने लगा |
किसी ने ' समाज '
किसी ने ' परिवार '
किसी ने 'खेल '
तो किसी ने 'शेयर '
एक - एक कर सभी पन्ने 
अलग कर दिए |
धीरे - धीरे सब अपने 
काम में व्यस्त होने लगे ,
जो जहाँ था उसने 
वहीँ पन्ने छोड़ दिये |
शाम होते - होते 
मेरी अहमियत 
समाप्त हो चुकी थी |
आज सुबह मेरे 
सभी पन्ने समेटे गये ,
और ' कल का अख़बार '
कहकर डाल दिया रद्दी में |
कल मेरी कीमत 
तीन रुपये थी ,
आज प्रति किलो तीन रुपये के 
ढेर में पड़ा हूँ |
कभी हाथों - हाथ लिया ,
कभी गोद में बिठाया ,
कभी सीने से लगाया ,
कभी चूमा भी मुझे कल तक ,
लेकिन आज ... आज मैं बेकार हूँ |
जी हाँ.. मैं कल का अख़बार हूँ |

                                               "प्रवेश "

Wednesday, June 15, 2011

भौत कुछ बदली गो |

भौत कुछ बदली गो 

भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |

टीने कि छत तोड़ी बे 
इस्कूलम लेन्टर है गो ,
दस तकौक इस्कूल 
आब इंटर है गो |
ननूं कें दिक्कत नि छौ
आब इस्कूल जाण में ,
भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |

बट घटूंक पाणि 
आब भ्यार है गो ,
दूर आब यूँ बटुक 
कच्यार है गो |
सीमेंटक बट बणे हाली  
खड़ंज उखाड़ बे ,
भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |

बिन पियै डंगरी  
आसन में नि जान ,
दी पैग लगाई बिना 
आंग द्य्यप्त ले नि आन |
जाणी क्या - क्या बकि दिनी 
अखाण बखाण में ,
भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |

टी. वी. देखी बिना 
टैम पासै नि हुन ,
बिन टी. वी. देखियै 
भैंस दूध ले नि दयून |
ना जुमुई, ना भीमू ,
आब पघरूंछ टी. वी. लगाण में 
भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |

आठ बोरी ग्यौनूं जगम 
चारै हनी ,
कुछ बानर , कुछ सुंगर 
कुछ छुटी गोर खानी |
के मेहनत ले कम है गे 
और पाणि ले नि छौ गाण में 
भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |


                                    "प्रवेश"





Tuesday, June 14, 2011

उल्लंघन

उल्लंघन 

कभी अनशन , कभी सत्याग्रह , कभी आन्दोलन करना पड़ता है ,
मेरे देश में एक कानून बनाने के लिये |
तोड़ दिया जाता है , झाड़ू की सींक सा ,
रिश्वत से पैंसा कमाने के लिये |
हर वाहन में यात्रियों की संख्या को लेकर ,
प्रावधान है दुर्घटना से बचने के लिये |
कल ही रिश्वत लेते - देते देखा ,
पुलिस से बच निकलने के लिये |
दस की जगह में पन्द्रह को लेकर ,
राजमार्ग पर चली जा रही थी गाड़ी |
पुलिस ने रोका , चालक से पूछा ,
इतनी सवारी कैसे भर दी अनाड़ी?
कायदा कहता है , जुर्माना लगाओ ,
पाँच सवारी उतारो , टालने को हादसा |
लेकिन सवारी उतारी ना कोई ,
चुपचाप थाम लिया एक नोट पचास का |
क्या जरूरत है ऐसे में ,
नियम - प्रावधान की !
जहाँ पचास रुपये कीमत हो ,
पन्द्रह की जान की |


                                      "प्रवेश" 

Saturday, May 28, 2011

काश !

काश !


बड़ी तकलीफ होती है 
आज जब बेटा मुझसे 
दो दूनी पूछता है और 
मैं अपनी उँगली उसकी 
माँ की तरफ कर देता हूँ |
कभी दस रुपये के सामन के 
बीस भी दे आता हूँ |
बड़ी तकलीफ होती है 
जब कलाई पर घडी होते हुए भी 
दूसरों से समय पूछना पड़ता है |
लोगों के नाम के साथ - साथ 
मोबाइल में मैंने उनकी 
तस्वीर भी लगवा रखी है |
एक बटन दबाकर मुझे 
गाना चलाना तो आता है ,
पर जो गाना बजता है 
वही सुनना पड़ता है ,
क्योंकि मुझे गाना बदलना नहीं आता |
ठेकेदार मजदूरी के 
जो भी रुपये देता है ,
चुपचाप थाम लेता हूँ ,
अगर गिन पाता तो 
मजदूरी क्यों करता |
कभी समय निकालकर जब 
दुकान पर बैठता हूँ ,
तो मेरा बेटा भी साथ जाता है ,
मैं पंक्चर निकालता  हूँ और 
वो हिसाब लगाता है |
मुझे याद है जब पिताजी 
मुझे स्कूल छोड़ने जाते थे ,
मेरी तख्ती और दावात 
खुद ही ले जाते थे ,
पर गिल्ली - डंडा, 
गेंद - बल्ले के सिवाय कुछ 
सूझे तो स्कूल में रुकें |
पिताजी ने प्रलोभन भी दिया 
और डांट भी लगाई,
लेकिन मैं स्कूल की ओर
पीठ करके सोता था |
आज जब सर्वांग होते हुए भी 
खुद को लाचार पाता हूँ ,
तब सोचता हूँ 
काश ! मैंने पढ़ लिया होता |

                                           "प्रवेश"

Sunday, May 22, 2011

लकीरें

लकीरें



किस्मत का फैसला करती हैं 
हाथों की लकीरें 
और बदकिस्मती भी तय 
ये लकीरें ही करती हैं |

दो हाथों की लकीरें 
एक तक़दीर से खेलती हैं ,
कभी संवार देती हैं उसे 
तो कभी बिगड़ देती हैं |
मगर दिलों में खिंची लकीरें 
दरारें बन जाती हैं ,
और चौड़ी होकर दरारें 
बन जाती हैं खाईयाँ |
खाई के दो हिस्से अगर 
कोशिश भी करें मिलने की ,
और बड़ी खाईयाँ 
बन जाती हैं नाकामी में |
और जब लकीरें खींचती हैं 
दो मुल्कों के बीच
तो बदकिस्मती शुरू 
हो जाती है आवाम की |
लकवा मार जाता है 
दोनों ही मुल्कों को ,
होंठ कहते नहीं , कान सुनते नहीं ,
आँखों के सामने भी धुंधलका सा होता है |
बातें होतो हैं तो 
सिर्फ तोपों और बंदूकों से ,
जिसमे झुलसकर दम 
तोड़ देती है इंसानियत |
मगर खिंची हुई लकीर को 
मिटाता नहीं कोई ,
एक बड़ी लकीर खींच देता है ,
पहली को छोटी करने को |

                                      "प्रवेश " 

Wednesday, May 18, 2011

परमानेंट स्टाफ

परमानेंट स्टाफ 

क ने ख से कहा एक दिन ,
क्यों देर से आते आप हैं ?
ख ने कहा नादान हो तुम ,
हम परमानेंट स्टाफ हैं |

देर से आना , जल्दी जाना ,
शान हमारी बढती है ,
इससे परमानेंट होने की 
पहचान हमारी बढती है |

हम एक दिन काम पे न भी आयें ,
सात खून हमारे माफ़ हैं ,
तुम दैनिक मजदूरी वाले ,
हम परमानेंट स्टाफ हैं |

एक साल में नहीं कमा 
पाते हो मजदूरी से जितना ,
एक महीने में ही मजे से 
पाते हैं हम वेतन उतना |

ये पिछले पुण्य हमारे हैं ,
पिछले ही तुम्हारे पाप हैं ,
इसीलिये तुम दैनिक हो ,
हम परमानेंट स्टाफ हैं |

सुनकर ख की बात ,
क ने चुप्पी साध ली ,
चुपचाप लग गया काम में ,
शिकायत की गठरी बाँध ली |

मजदूरी से बच्चे पालेगा,
 छः बच्चों का बाप है ,
इनका भला क्या जाता है ,
ये तो परमानेंट स्टाफ है |

                                       "प्रवेश"

Saturday, May 14, 2011

परीक्षा परिणाम


परीक्षा परिणाम 

आजकल गोलू मंदिर जाता ,
कभी न मंदिर जाने वाला |
गुप्त सूत्रों से पता चला है ,
परीक्षा परिणाम है आने वाला |

सुबह - शाम एक -एक घंटा ,
मंदिर में बिताता है |
माथा टेकता, मिन्नत करता ,
भजन भी जोर से गाता है |

लौटता है जब घर को ,
तो ये बात अवश्य कह आता है ,
भगवन ! गणित में पास करा दे ,
भला तेरा क्या जाता है |

कल रात अक्ल की देवी ,
गोलू के सपने में आई ,
गणित के पेपर से पहले की
सारी मस्ती याद दिलाई |

बोली वत्स ! उस दिन तू अगर ,
कनौट प्लेस नहीं जाता ,
एक घंटा और पढता ,
दो प्रश्न और हल कर आता |

मक्खी का दशमलव भी ,
वहीँ पर काम आता है ,
जहाँ पूरा प्रश्न
विधिवत हल किया जाता है |

                                              "प्रवेश"

Tuesday, May 10, 2011

पानी और शराब

पानी और शराब 

अजी ! खाली दिमाग 
शैतान का घर ,
यूँ ही बैठे -बैठे 
खयाल आ गया |

दोनों ही तरल 
और पेय हैं ,
फिर भी दोनों में 
भेदभाव किया जाता है ,
शराब तो पी जाती है ,
जबकि पानी पिया जाता है |

फिर खयाल आया कि
पानी से कोई
 बहकता नहीं ,
पानी पीकर ना ही
 बना है कभी ,
पानी पीकर कोई 
घर उजड़ता नहीं |
शराब से ज्यादा
 जरूरी है पानी ,
फिर भी पानी की
 किसी को लत नहीं |

कई गुना कम कीमत है 
एक बोतल पानी की ,
इसीलिये पानी की 
क़द्र भी नहीं की जाती है ,
अब समझ में आया,
क्यों पिया जाता है पानी ,
और शराब क्यों पी जाती है |

                                                "प्रवेश"

Saturday, May 7, 2011

कभी - कभी

कभी - कभी 

जिनके नाम से चलती थी साँसे ,
वही अब कभी - कभी ख्यालों में आते हैं |

जिनके दीदार से होती थी सुबह ,
जिनकी आगोश में गुजरता था दिन ,
जिनके नाम से ढलती थी शाम ,
वही अब कभी - कभी ख्यालों में आते हैं |

कभी जिनको हमने खुदा माना अपना ,
और सदा सर- आँखों पर बिठाया ,
कभी जिनके संग में खायी थी कसमें,
वही अब कभी - कभी ख्यालों में आते हैं |

हमने सदा ही ख़ुशी चाही जिनकी ,
साया कभी गम का पड़ने दिया ना,
इतना बड़ा गम दिया है जिन्होंने ,
वही अब कभी - कभी ख्यालों में आते हैं |

हमको पता न हमारी खता का ,
फिर भी उन्होंने सजा हमको दी है ,
कभी जिनकी राहों के काँटे चुगे थे ,
वही अब कभी - कभी ख्यालों में आते हैं |

अब एक ख्वाहिश है ग़मगीन दिल की ,
और हम यही माँगते हैं खुदा से ,
कभी हम भी जाएँ ख्यालों में उनके ,
जो कभी - कभी हमारे ख्यालों में आते हैं |

                                                        "प्रवेश"

कभी - कभी का मतलब अक्सर नहीं बल्कि बहुत कम (rare ) है | 

Wednesday, May 4, 2011

पिता हूँ मैं !

पिता हूँ मैं !

बचपन में बहन की हत्या का 
कारण बना दिया मुझको ,
कोई जुर्म नहीं किया,
मुजरिम अकारण बना दिया मुझको |

दादी माँ को नारी होकर 
पोती से है रोष बड़ा ,
इसमें मेरा, पिताजी और
 दादाजी का दोष है क्या ?

बड़ा हुआ तो दहेज़ का झोला 
मेरे कंधे पर टांग दिया,
जो बड़ी बहन को दिया,
वही छोटी ने भी मांग लिया |

दिन भर मेहनत - मजदूरी से
जो भी कमाकर लाता हूँ ,
एक निवाला कम खाता हूँ ,
पर बच्चों को पढ़ता हूँ |

बच्चों की कलम - दावात की खातिर 
एक चाय नहीं पीता हूँ मैं ,
बाकी समाज से गिला नहीं,
कवियों से उपेक्षित पिता हूँ मैं |

जब बच्चे तकलीफ में होते हैं,
मैं भी तकलीफ में होता हूँ ,
माँ तो आँसू बहा ले लेकिन   
मैं दिल ही दिल में रोता हूँ |

ये  बच्चे जीते हैं मुझमे ,
इन बच्चों में जीता हूँ मैं ,
बाकी समाज से गिला नहीं,
कवियों से उपेक्षित पिता हूँ मैं |

कवियों को लगता है मुझे
बच्चों और समाज की फ़िक्र नहीं,
इसीलिए किसी रचना में,
मेरा कोई जिक्र नहीं |

बच्चों और समाज की चिंता में 
भूसे की जलती चिता हूँ मैं,
बाकी समाज से गिला नहीं,
कवियों से उपेक्षित पिता हूँ मैं |


                                                   "प्रवेश"