Saturday, May 28, 2011

काश !

काश !


बड़ी तकलीफ होती है 
आज जब बेटा मुझसे 
दो दूनी पूछता है और 
मैं अपनी उँगली उसकी 
माँ की तरफ कर देता हूँ |
कभी दस रुपये के सामन के 
बीस भी दे आता हूँ |
बड़ी तकलीफ होती है 
जब कलाई पर घडी होते हुए भी 
दूसरों से समय पूछना पड़ता है |
लोगों के नाम के साथ - साथ 
मोबाइल में मैंने उनकी 
तस्वीर भी लगवा रखी है |
एक बटन दबाकर मुझे 
गाना चलाना तो आता है ,
पर जो गाना बजता है 
वही सुनना पड़ता है ,
क्योंकि मुझे गाना बदलना नहीं आता |
ठेकेदार मजदूरी के 
जो भी रुपये देता है ,
चुपचाप थाम लेता हूँ ,
अगर गिन पाता तो 
मजदूरी क्यों करता |
कभी समय निकालकर जब 
दुकान पर बैठता हूँ ,
तो मेरा बेटा भी साथ जाता है ,
मैं पंक्चर निकालता  हूँ और 
वो हिसाब लगाता है |
मुझे याद है जब पिताजी 
मुझे स्कूल छोड़ने जाते थे ,
मेरी तख्ती और दावात 
खुद ही ले जाते थे ,
पर गिल्ली - डंडा, 
गेंद - बल्ले के सिवाय कुछ 
सूझे तो स्कूल में रुकें |
पिताजी ने प्रलोभन भी दिया 
और डांट भी लगाई,
लेकिन मैं स्कूल की ओर
पीठ करके सोता था |
आज जब सर्वांग होते हुए भी 
खुद को लाचार पाता हूँ ,
तब सोचता हूँ 
काश ! मैंने पढ़ लिया होता |

                                           "प्रवेश"

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