Wednesday, June 19, 2013

मेघा रे ! तुम क्यों बरसे ?

मेघा रे ! तुम क्यों बरसे ?
मंदिर - मस्जिद कुछ न छोड़ा
सब बहा ले गये शहर से ।

क्या बड़ी - क्या छोटी
तोड़ डाली पर्वत की चोटी
भारी - भरकम पेड़ न छोड़े
कोई बचा न तुम्हारे कहर से ।

बह गये युवा - बूढ़े और बच्चे
तूने ना देखे झूठे - सच्चे
जो रह गये वो थर्र थर्र काँपे
तेरे प्रकोप के डर से ।

गलियाँ बह गयी, गाँव बह गये
उखड़ गये जब पाँव , बह गये
कोशिश का मौका भी न दिया
निकल भी न पाये घर से ।

मवेशी क्या इन्सान न छोड़े
तूने तो भगवान न छोड़े
छोड़े तो शमशान ही छोड़े
सब ख़त्म कर दिया जहर से ।

भवन ढहे ज्यों ताश के पत्ते
कुछ भी नहीं बचा अलबत्ते
तुम  से तो सारे ही हारे
ताज उठा ले गये सर से ।

जिम्मेदार नहीं हो तुम ही
गुनहगार बराबर हम भी
हरे - भरे जंगल उजाड़कर
पहाड़ बना दिये जर्जर से ।

बहती ना तो और क्या करती
चिरी - फाड़ी नंगी धरती
तुम्हें कोसना मज़बूरी है
आफत आई अम्बर से ।
                            " प्रवेश "

Monday, May 13, 2013

खाकी से डर लगता है

नदी किनारे घर है
पर तैराकी से  डर लगता है । 

मैखानों का शौक भी है 
और साकी से डर लगता है । 

सिर्फ तुम्ही पर ऐतबार है 
बाकी से डर लगता है । 

शौक नहीं  परदे का 
तांका - झाँकी से डर लगता है । 

जाने दुनिया क्या सोचे !
बेबाकी से डर लगता है । 

दोस्त बताती है खुद को 
पर खाकी से डर लगता है । 
                                  " प्रवेश " 


Friday, May 3, 2013

कोयल अब इस उजाड़ में बोलती नहीं ।

कोयल अब इस उजाड़ में बोलती नहीं ।
मिसरी सी बोली कानों में घोलती नहीं ।।

नदी के बीच में पत्थर प्यासे पड़े हैं ।
पानी नहीं तो कश्ती कोई डोलती नहीं ।।

उसको कहा तू लड़की है , छोड़ बचपना ।
घर पहुँचने पर मुन्नी जेबें टटोलती नहीं ।।

सड़क पर देखा था कत्लेआम सभी ने ।
ये भीड़ निरी गूँगी है , जुबाँ खोलती नहीं ।।

हमदर्द नहीं है , सरकार बनी बैठी है ।
गरीब को इंसान  सा तोलती नहीं ।।
                                          " प्रवेश "

शायद ! कविता तैंयार है ।

एक कड़ाही  है , एक थाली है ।
रसोई अभी संभाली है ।
जुगाड़ भी है आँच का ।
मौका है कुछ जाँच का ।

कुछ शब्द रखे हैं छाँटकर ।
स्वादानुसार बाँटकर ।
अलग - अलग मसाले हैं ।
सबके स्वाद निराले हैं ।

कोई तेज है , कोई फीका है ।
अपना - अपना तरीका है ।
ये सच है , थोड़ा तीखा है ।
मीठा बनना नहीं सीखा है ।

तैंयार सामग्री सारी  है ।
कविता बनने की तैंयारी है ।
ट्रेनिंग अभी अधूरी है ।
सावधानी जरूरी है ।

प्यार की दे दी आँच नरम ।
तेल लक्ष्य का हुआ गरम ।
अब तड़का भावों का डाला ।
फिर मिला दिया है  मसाला ।

शुरू हुई नयी पारी ।
डाले शब्द बारी - बारी ।
अब पानी डाला नापकर ।
पकने को छोड़ा ढाँपकर । (ढाँपकर = ढककर )

धीमी आँच पर पकाई ।
चम्मच से थोड़ी हिलाई ।
एक खुशबू आर - पार है ।
शायद ! कविता तैंयार है ।
                          " प्रवेश "









Thursday, May 2, 2013

तुमसे यारी हुई

तुमसे यारी हुई
बहुत उधारी हुई ।

जाने कितनों से पंगा लिया
कितनों से मारामारी हुई ।

बहुतों को सीने में दर्द हुआ
बहुतों को दिल की बीमारी हुई ।

गली - गली लेनदार हो गये
पहले न इतनी देनदारी हुई ।

आसमां पर तुम्हारे नखरे गये
जमीं पर मेरी जमींदारी हुई ।
                                   " प्रवेश "

Friday, April 12, 2013

त्रिवेणी - एक प्रयास

एक झलक देखा था कभी
आज भी याद है वो सूरत जो अपनी सी लगी
सफ़ेद कमीज पर पक्के रंग की रगड़ की तरह ।। 1

जंगल में आग लगी है बहार आने पर
पेड़ों ने नयी कोपलें पहनी हैं मगर
खिजां में गिराये हुए पत्ते अभी सड़े ही नहीं ।। 2

फिकर न कर कि सर पे चाँदी है
नूर चेहरे पे बरक़रार है या ना
किसको फुर्सत है , खुद को छोड़ तेरी बात करे ।। 3

जल्दबाजी ना करो
थोड़ी सी हवा लगने दो
रिश्ते भी गर्म हैं , चूल्हे से अभी उतरे हैं ।। 4

एक चिता फिर तैयार है
वो आटा गूँधकर बैठे हैं
सियासत जमीर मार देती है | | 5

उड़ के जाने किधर से आया था
मेरी छत पर बरस गया कुछ पल
कभी भटके हुये खुशी दे जाते हैं | | 6

दूर जिस ठौर तक जाती है नज़र
रेत ही रेत बिछी है देखो
इसी जगह पर समंदर था कभी ॥ 7

सब अपनी जगह सही हैं मगर
जगह बदलते ही कुछ भी सही नहीं रहता
पेट में भूख , ख़्वाब आँखों में रहे ॥ 8

बड़ी गर्मी चढ़ी है सूरज को
साल भरपूर जवानी पर है
उम्र ढलते ही कंपकपायेगा ॥ 9

न पंखा , न कूलर , न ए सी को आराम है
बिजली जाते ही जैसे प्राण सूख जाते हैं
फुटपाथ पर है थोड़ी सी गर्मी बढ़ी हुई ॥ 10

मौत उठा ले जाती है चील बनकर
हर बार साँप बनकर नये बिल में घुस जाती है
रूह वाकई बड़ी ढीठ , बड़ी जिद्दी है ॥ 11

लम्हे थामे थे बारिशों के लिये
बारिशें आयीं और लौट गयी
तुम न आये तो फिर बरसने लगा ॥ 12

जिंदगी खेल धूप - छाओं का
मेरे हिस्से में धूप ही आयी
तुम पे छाया रहा हमेशा ही ॥ 13

तुझको पाने, कँटीली राहों पर
नंगे पैरों सफ़र किया मीलों ,
घर को लौटा तो हाथ खाली थे ॥ 14

आसमां पर है , हवा का संग है
कल तलक पैरों तले धूल हुआ करता था ,
तुम भी संगत बदल के देखो तो ॥ 15

तजुरबों की एक किताब है जिंदगी
हर पन्ने पर एक तजुरबा लिखा है
महज पन्ने उलटने से दिन नहीं उलटते || 16

वक़्त रहते सही रास्ता मिल जाये
तबाही , खुशहाली में बदल जाये
पानी और जवानी का आना शुभ हुआ || 17

चतुर योद्धा है मौत 
लड़ती रहती है जिंदगी 
आखिर मौत जीत जाती है ॥ 18 


चाँद छोटा सा बड़ा प्यारा था 
चाँद बढ़कर ही दागदार हुआ 
बचपन जवानी से कहीं बेहतर है ॥ 19 


चाँद छोटा सा बड़ा प्यारा था 
चाँद बढ़कर ही दागदार हुआ 
बेदाग होकर बढ़ना भी आसान नहीं ॥ 20 


बदल - बदल जगह मुंडेरों पर 
जगता रहा है चाँद शब भर 

न जाने चोर है या चौकीदार ! 21!
                                               " प्रवेश "




Tuesday, April 9, 2013

पानी से खफा सफरी क्यों है !

ये अफरा - तफरी क्यों है !
पानी से खफा सफरी क्यों है !!

कहने और दिखाने को गाँव बहुत प्यारा है ।
ये मिजाज मगर शहरी क्यों है !!

आजादी की रिटायरमेंट की उम्र गयी ।
ये ख़ुशी अब भी सुनहरी क्यों है !!

जनता चीखती है और खामोश हो जाती है ।
ये सरकार निरी बहरी क्यों है !!

दो - दो कदम तो दोनों ही चले थे ।
ये खाई मगर इतनी गहरी क्यों है !!

रूह तो उड़ने को तैंयार है हरदम ।
पुतले में साँस आखिर ठहरी क्यों है !!
                                    " प्रवेश "

Saturday, April 6, 2013

रफ़्तार का नशा

नशा
केवल शराब , चरस ,
गांजा , अफीम
या मोहब्बत का ही नहीं होता ।
अभी - अभी
रफ़्तार के नशे में
जो कीचड़ उछालकर गया है
मेरी तरफ ,
मेरी साईकिल की सीट
उसकी कार से ऊंची है ।
                          " प्रवेश "

Saturday, March 30, 2013

गाँव से चला जब शहर की तरफ

गाँव से चला जब शहर की तरफ ।
मुड़ - मुड़ देखता रहा घर की तरफ ।।

रुँधा गला पिता का , माँ की नाम आँखें ।
मुझे खींच रही थी मेरे घर की तरफ ।।

जब तक गाड़ी नजर से ओझल न हो गयी ।
बहन हाथ हिलाती रही डगर की तरफ ।।

एक पुरानी सी जो तस्वीर लेकर चला था ।
टाँग दी दीवार पर सर की तरफ ।।

तुझे याद रहा मैं , तुझे भूल गया मैं ।
मैं बढ़ रहा हूँ किस अनजान सफ़र की तरफ ।।
                                            " प्रवेश "

Thursday, March 28, 2013

हैरान ना हों

अचम्भित ना होवें ,
यदि
आपको काट ले कभी
या पीछा करे
आपकी गाड़ी का
बड़े दाँतों और
लम्बी जीभ वाला
कोई भेड़ का पिल्ला ,
या
कहीं रास्ते में
मिल जाय कोई
झुण्ड से बिछड़ा हुआ
कुतिया का मेमना,
तो कतई भी
हैरान ना हों ,
क्योंकि
ये कोई बड़ी बात नहीं
इस रासायनिक युग में ।
                         " प्रवेश "

Friday, March 22, 2013

बदजबान

एक काले धागे में 
पिरोये हुये 
चंद छोटे काले दानों 
और बालों को पाटती हुई 
लकीर में काढी गयी 
एक रंग की रंगोली के बदले, 
चुपचाप और स्तब्ध 
सारी जिंदगी 
मेहनत -  मजदूरी करके ,
अपना पेट काटकर ,
पेट भरती रही 
उसकी अय्याशियों का ।
आज मुँह खोला 
और जमाने ने उसको 
बदजबान कह दिया ।
                        " प्रवेश "




Wednesday, March 20, 2013

जिंदगी जो मुझे देती है, सब गवारा है!

धूप है, छाँव है या दर्द का अँधियारा है ।
जिंदगी जो भी मुझे देती है सब गवारा है ।

मुझे लहरों से नहीं है शिकायत कोई ,
साहिल भी मुझे देखो बहुत ही प्यारा है ।

जिंदगी जो भी बनाया है मुजस्सम तूने ,
मैंने खुद को हर एक अक्श में उतारा है ।

बेवफा निकलेगी तू , मैं जानता हूँ ,
वफ़ा जब तक न आ जाये , तेरा सहारा है ।

तेरा - मेरा दोनों का है , ख़ाक वजूद इक - दूजे बिन ,
सागर और हवा के जैसा ये सम्बन्ध हमारा है ।


                                                     " प्रवेश "
आभार

Wednesday, March 6, 2013

कौन - कब - कहाँ - कुछ कह रहा है !

कौन - कब - कहाँ - कुछ कह रहा है !

कौन - कब - कहाँ - कुछ कह रहा है !

ह्रदय में कुछ भूसे सा जल रहा है ,
कोई फूल को पैरों तले कुचल रहा है ,
कोई तटस्थ हो देख रहा है शालीन होकर ,
कोई भींचकर मुट्ठी खुशियाँ मसल रहा है ।
कोई आँसुओं से तन -मन भिगोकर 
मौन है , स्तम्भित खड़ा सब सह रहा है ।

किसी को दल की, किसी को पद की चिंता,
राष्ट्र दूजा , सबसे पहले कद की चिंता ,
जात ऊपर , इंसानियत औंधे पड़ी है ,
किसी को मंदिर और मस्जिद की चिंता ।
प्रेम का जो घर बना था नदी तीरे 
द्वेष की प्रचंड बाढ़ से ढह रहा है ।

बदहाल है भूपुत्र , बेबस तप रहा है ,
धूप - बारिश - लू के थपेड़े खप रहा है ,
आस से नजरें गड़ाये है वो जिस पर 
वो तो बस वादों की माला जप रहा है ।
धूप में निकला नहीं, क्या खबर उसको 
कैसे स्वेद से मिलकर लहू भी बह रहा है ।

कौन - कब - कहाँ - कुछ कह रहा है !
                                                    " प्रवेश "