Saturday, March 30, 2013

गाँव से चला जब शहर की तरफ

गाँव से चला जब शहर की तरफ ।
मुड़ - मुड़ देखता रहा घर की तरफ ।।

रुँधा गला पिता का , माँ की नाम आँखें ।
मुझे खींच रही थी मेरे घर की तरफ ।।

जब तक गाड़ी नजर से ओझल न हो गयी ।
बहन हाथ हिलाती रही डगर की तरफ ।।

एक पुरानी सी जो तस्वीर लेकर चला था ।
टाँग दी दीवार पर सर की तरफ ।।

तुझे याद रहा मैं , तुझे भूल गया मैं ।
मैं बढ़ रहा हूँ किस अनजान सफ़र की तरफ ।।
                                            " प्रवेश "

Thursday, March 28, 2013

हैरान ना हों

अचम्भित ना होवें ,
यदि
आपको काट ले कभी
या पीछा करे
आपकी गाड़ी का
बड़े दाँतों और
लम्बी जीभ वाला
कोई भेड़ का पिल्ला ,
या
कहीं रास्ते में
मिल जाय कोई
झुण्ड से बिछड़ा हुआ
कुतिया का मेमना,
तो कतई भी
हैरान ना हों ,
क्योंकि
ये कोई बड़ी बात नहीं
इस रासायनिक युग में ।
                         " प्रवेश "

Friday, March 22, 2013

बदजबान

एक काले धागे में 
पिरोये हुये 
चंद छोटे काले दानों 
और बालों को पाटती हुई 
लकीर में काढी गयी 
एक रंग की रंगोली के बदले, 
चुपचाप और स्तब्ध 
सारी जिंदगी 
मेहनत -  मजदूरी करके ,
अपना पेट काटकर ,
पेट भरती रही 
उसकी अय्याशियों का ।
आज मुँह खोला 
और जमाने ने उसको 
बदजबान कह दिया ।
                        " प्रवेश "




Wednesday, March 20, 2013

जिंदगी जो मुझे देती है, सब गवारा है!

धूप है, छाँव है या दर्द का अँधियारा है ।
जिंदगी जो भी मुझे देती है सब गवारा है ।

मुझे लहरों से नहीं है शिकायत कोई ,
साहिल भी मुझे देखो बहुत ही प्यारा है ।

जिंदगी जो भी बनाया है मुजस्सम तूने ,
मैंने खुद को हर एक अक्श में उतारा है ।

बेवफा निकलेगी तू , मैं जानता हूँ ,
वफ़ा जब तक न आ जाये , तेरा सहारा है ।

तेरा - मेरा दोनों का है , ख़ाक वजूद इक - दूजे बिन ,
सागर और हवा के जैसा ये सम्बन्ध हमारा है ।


                                                     " प्रवेश "
आभार

Wednesday, March 6, 2013

कौन - कब - कहाँ - कुछ कह रहा है !

कौन - कब - कहाँ - कुछ कह रहा है !

कौन - कब - कहाँ - कुछ कह रहा है !

ह्रदय में कुछ भूसे सा जल रहा है ,
कोई फूल को पैरों तले कुचल रहा है ,
कोई तटस्थ हो देख रहा है शालीन होकर ,
कोई भींचकर मुट्ठी खुशियाँ मसल रहा है ।
कोई आँसुओं से तन -मन भिगोकर 
मौन है , स्तम्भित खड़ा सब सह रहा है ।

किसी को दल की, किसी को पद की चिंता,
राष्ट्र दूजा , सबसे पहले कद की चिंता ,
जात ऊपर , इंसानियत औंधे पड़ी है ,
किसी को मंदिर और मस्जिद की चिंता ।
प्रेम का जो घर बना था नदी तीरे 
द्वेष की प्रचंड बाढ़ से ढह रहा है ।

बदहाल है भूपुत्र , बेबस तप रहा है ,
धूप - बारिश - लू के थपेड़े खप रहा है ,
आस से नजरें गड़ाये है वो जिस पर 
वो तो बस वादों की माला जप रहा है ।
धूप में निकला नहीं, क्या खबर उसको 
कैसे स्वेद से मिलकर लहू भी बह रहा है ।

कौन - कब - कहाँ - कुछ कह रहा है !
                                                    " प्रवेश "

Saturday, March 2, 2013

काम प्यारा है

सूँघे भी ना
सूखी घास को
मगर घुटने टेक दे
जुआ देखकर
और धौंस जमाये
अधखिले सींगों की,
तो नहीं पालता
कोई भी किसान
ऐसे धरती के बोझ को,
और खुशामद नहीं करता
बिना दूध वाली
नखराली गाय की ,
दूध देने वाली
गाय को ही
लात मारने का हक है ।
                          " प्रवेश "

Wednesday, February 27, 2013

सम्पन्नता की निशानी

एक बेल
जो चढ़ नहीं सकती
बिना सहारे के
बरामदे से छत तक ,
एक बोतल में
जिंदगी गुजार देती है
बिना मिटटी के ,
दरवाजे पर बँधे
विदेशी नस्ल के
कुत्ते के साथ
जिसका मुँह फटा है
कान के पास तक,
आज मात देकर
चार बीघा जमीन में
लहलहाती फसल को
और बाड़े में बँधे
बैलों , गायों और
बकरियों को,
सम्पन्नता की
निशानी बनी बैठी है ।
                         " प्रवेश "



Wednesday, February 20, 2013

कृतघ्न परजीवी

कब तक चिपके रहोगे
भैंस की पीठ पर
जूँ की तरह !
तुम्हारा अस्तित्व है
इस चौपायी सीट पर
धूँ की तरह ।
तुम यहीं उपजते हो
भैंस की पीठ पर ,
यहीं मरते हो
यहीं जीते हो ।
फिर भी ग़जब करते हो
जिसने आसरा दिया
उसी का लहू पीते हो ।
एक भ्रम में हो तुम
कि लहू पीकर यशस्वी हो ,
चिरंजीवी हो ।
अगर सुन सको तो सुनो
तुम दुनिया की नजरों में
महज एक कृतघ्न
परजीवी हो ।
                          " प्रवेश "

Saturday, February 16, 2013

दिखावा क्यों ?

जश्न भी है
और प्रश्न भी ,
कर्ज से दबकर
दिखावा क्यों ?
तथाकथित बिरादरी
और चटोरे समाज की
पर्दा पड़ी आँखों के सामने
अनदेखी नाक बचाने के लिये
ताउम्र का एहसान
और बच्चों के लिये
देनदारी से भरी विरासत
दिखावटी जश्न के बीच
जेहन में रहती तो है ,
फिर दिखावा क्यों ?
                       " प्रवेश "

Saturday, February 9, 2013

छोरा हुआ है

छोरा हुआ है
एक ओर गला फाड़ - फाड़कर
महिलायें मंगल गीत गायेंगी,
और नये मेहमान के आने की
थाली बजाकर
खबर कर दी जायेगी
पूरे गाँव को ।
और दूसरी ओर
बोतलें खुलेंगी
पार्टी होगी
नामकरण तक लगातार ,
और दो बकरे कटेंगे
नामकरण के अगले दिन
पूरा गाँव दावत लेगा ।
ठीक दो साल पहले का
सन्नाटा अब तक याद है
जब मुँह लटकाकर
दादी ने कहा था
"छोरी हुई है ।"
                       " प्रवेश "



Friday, February 8, 2013

धर्म परिवर्तन

सींगों पर धार लगाकर
निकल पड़ी हैं शिकार पर  ,
शुद्ध शाकाहारी बकरियाँ
धर्म परिवर्तन पर उतारू हैं ।
जीवन तो जीवन है
वनस्पति हो या जीव ,
वृद्धि , संवेदना
या वंश प्रसार
दोनों ही तो करते हैं ।
तो बकरियाँ भी
अब मांसाहार करेंगी ,
शेर घास जो खाने लगे हैं ।

                                    " प्रवेश "

तुम जात पूछते हो !

जाने किस मुँह से तुम ये
गिरी हुई बात पूछते हो !
वो कुर्बान हुआ है देश पर ,
तुम जात पूछते हो !

वो लड़ा देश की आन की खातिर ,
भारत के स्वाभिमान के खातिर ,
तुझ जैसे नादान की खातिर ,
इन्सान है,  इन्सान की खातिर |
वो खेल गया है जान पर ,
तुम शह - मात पूछते हो !
वो कुर्बान हुआ है देश पर ,
तुम जात पूछते हो !

बचा गया डूबती लुटिया
रस्ता  देख रही है बिटिया ,
टूटी  - फूटी जर्जर कुटिया ,
बूढ़े बाबा , माता बुढ़िया |
विधवा वधू की आँखों से
बरसात पूछते हो !
वो कुर्बान हुआ है देश पर ,
तुम जात पूछते हो !

सरहद पर मरने वाला
ना हिन्दू - मुस्लिम - सिख - इसाई ,
भारत माँ का बेटा है वह
हर भारतवासी का भाई |
तुम चर्चा में रहने के लिये
घटिया बात पूछते हो !
वो कुर्बान हुआ है देश पर ,
तुम जात पूछते हो !

                    " प्रवेश "











Saturday, February 2, 2013

अफ़सोस ..तुम्हें दिल से हराना नहीं आता

सोचा तुमसे सीखेंगे दिल जीतने का हुनर ।
अफ़सोस ..तुम्हें दिल से हराना नहीं आता ।।

अरे .... तुम खुद को शहंशाह समझते हो ।
सितम ढाना नहीं आता , रहम खाना नहीं आता !!

अपाहिज हो मरेगा शागिर्द तुम्हारा ।
तुम्हें उँगली पकड़कर चलाना नहीं आता ।।

जंगल से आयी है , बेहया है हवा ।
इसे सलीके से पर्दा उठाना नहीं आता ।।
                                         " प्रवेश "