Thursday, November 10, 2011

जनता जागी है |


 जनता जागी है |

छोडो तख़्त - ओ- ताज को 

अब सोती जनता जागी है |

ये नहीं तुम्हारी दासी है ,

आजादी की अनुरागी है |


गोरों ने छोड़ दिया भारत ,

बस इसे आजादी मत समझो |

कालों ने कब्ज़ा जमा लिया ,

ये बात बड़ी दुर्भागी है |


जनता ने बिठाया गद्दी पर ,

तुम  सर्वेसर्वा बन बैठे |

ये भूल गए कि जनता भी ,

तुम लोगों की सहभागी है |


तुम तो महलों में बैठे हो ,

तुम्हें  ठण्ड की खबर नहीं |

अकड़ती देहों से पूछो ,

कि कितनी सर्दी लागी है |


कुर्सी के मद में चूर हो ,

घोड़े बेचकर सोये हो |

नींद की कीमत उनसे पूछो ,

जिनकी निंदिया भागी है |



लजीज खाना खाते हैं ,

तुम्हारे घर के कुत्ते भी |

रोटी क्या ? नहीं जानते हैं ,

जिनके पेट में अगन लागी है |


धब्बे से दिखने लगे हैं ,

तुम्हारे सफ़ेद कुर्तों पर |

अब पहचान होने लगी है ,

कितनों की  खादी दागी है |


छोडो तख़्त - ओ- ताज को 

अब सोती जनता जागी है |


                                       "प्रवेश "

Monday, November 7, 2011

जोर नहीं !


जोर नहीं !


अनजाने हम भी एक गुनाह कर बैठे |

जो दिल की कसक को आह कर बैठे ||


वो तो दोस्ती के काबिल भी  न निकले |

और हम उन्हें हमराह कर बैठे ||


कभी चलते थे वो मेरे नक्श -ए- कदम पर  |

आज वो हमें ही गुमराह कर बैठे ||


उन्हें सँवारने में हमने उम्र गुजार दी |

वो जिंदगी हमारी तबाह कर बैठे ||


हमारा ही जोर न चला कमबख्त दिल पर |

जो मोहब्बत उन्हें बेपनाह कर बैठे ||

                                                                         
अनजाने हम भी एक गुनाह कर बैठे |

जो दिल की कसक को आह कर बैठे ||


                                           "प्रवेश "

Friday, October 21, 2011

फख्र फर्क का !


फख्र फर्क का !

कभी सोचता हूँ कि
फर्क करूँ
खुद में और 
उन जानवरों में 
जो मेहनत करते हैं 
दिन - रात 
केवल अपने 
और अपनों के 
पेट की खातिर |

मैंने देखा है 
चिड़िया को 
दूर तक जाते हुये
और दाना चुगकर 
अपने चूजों के 
मुँह में डालते हुये |

मैंने भटकते देखा है
कुतिया को भी 
रोटी और हड्डी की खोज में 
अपने पिल्लों के लिये |

बिल्ली को चूहे पर 
झपट्टा मारते देखा है 
और फिर ले जाते हुये 
चूहे को बच्चों के पास |

शेर के छोड़े हुये 
गोश्त के टुकड़ों पर 
टूट पड़ते देखा है 
लोमड़ियों और लकड़बग्घों  को |

और जब तुलना की है 
अपनी श्रेष्ठता की ,
तो कुछ अलग नहीं पाया 
इन जानवरों से  |

सुबह - सुबह निकलता हूँ 
मजदूरी करने और 
खाना जुटाने 
परिवार की खातिर ,
और शाम तक 
चार आधे पेटों के लिये 
इंतजाम कर पाता हूँ |

कभी अपने और 
अपनों के सिवाय 
कुछ सूझा ही नहीं ,
कुछ भी न कर सका 
जिससे साबित  कर सकूं 
अपनी श्रेष्ठता को 
और इंसान होने पर 
फख्र कर सकूं | 

                              "प्रवेश "

Tuesday, October 18, 2011

खाना कम करो बाबू


खाना कम करो बाबू 

जरा रखो तोंद पर काबू 
जनाजा भारी होगा |
जरा खाना कम करो बाबू 
बड़ा हितकारी होगा |

कई पेट हैं भूखे 
कई थालियाँ खाली,
कोई रात दिन मेहनत करके भी 
बस खाये गाली |

कुछ ख्याल करो इनका भी 
ये कदम उपकारी होगा |
जरा खाना कम करो बाबू 
बड़ा हितकारी होगा |

छत नहीं सर पर इनके 
ना तन पर जामा ,
कृष्ण नहीं इनका कोई 
बेकृष्ण सुदामा |

कुछ दर्द खाओ ,
आंसू पियो , गुणकारी होगा |
जरा खाना कम करो बाबू 
बड़ा हितकारी होगा |

जरा रखो तोंद पर काबू 
जनाजा भारी होगा |


                                          "प्रवेश "

Tuesday, October 11, 2011

ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह जी को श्रद्धांजलि 

तुम जीतकर जग चले गये |
तुम जिधर चले पग चले गये |
तुम जीतकर जग चले गये |

तुम मौन हुये तो कलरव शून्य
डाल छोड़ खग चले गये |
तुम जीतकर जग चले गये |

तुम्हारी बीमारी का गम ही क्या कम था
जो छेड़ दुखती रग  चले गये |
तुम जीतकर जग चले गये |

अपनी सुर और स्वर गंगा से
पावन कर जग चले गये |
तुम जीतकर जग चले गये |

तुम गये तो यूँ सब ठगे रह गये ,
सारे जग को ठग चले गये |
तुम जीतकर जग चले गये |


                                          "प्रवेश "

Saturday, October 8, 2011

पेड़ों की कटाई - भविष्य से खिलवाड़

पेड़ों की कटाई - भविष्य से खिलवाड़ 

काँधे पर कुल्हाड़ी
और आरा सजाये
कहाँ चल दिए !
पेड़ काटने या भविष्य !
आने वाली पीढ़ी की
अल्पायु का इंतजाम करने !
शौक से जाइये
मगर कल
शिकायत न करना
कि " गर्मी लम्बी खिंच गयी ,
मौसम ही नहीं बदला ,
जाने बरसात कब होगी !"
फिर नहीं मिलेंगे
उछलते - कूदते मृगशावक ,
आराम फरमाती शेरनी ,
पेड़ों से झूलते बन्दर
और जलक्रीड़ा करते गजराज |
तब चलाते रहना
इन्हें बचाने के अभियान पे अभियान |
ज़रा तो सोचो कि
जिसका घर उजाड़ दिया ,
उसे कहाँ पनाह दोगे |
इन्हें कंकरीट का जंगल
कतई नहीं भाता |
अगर इतना ही जरूरी है काटना ,
तो बहुत कुछ है काटने को |
जाँत - पात और वैमनस्य की
भावना को काटो |
उत्तरी और दक्षिणी
दुर्भावना को काटो,
और समूल काट डालो
रूढवादिता की उस खरपतवार को
जो पनपने नहीं देती
नयी सोच को , नयी पौंध को |
मगर पेड़ काटना ही
तुम्हें बखूबी  आता है |


                                         "प्रवेश "

Wednesday, October 5, 2011

संकर पीढ़ी

संकर पीढ़ी 

ना ही अंग्रेजी जानें ये 
और ना हिंदी ही आती |
इनके मुख से निकलने में 
दोनों भाषाएँ लजाती |

हिंदी में अंग्रेजी डालें 
अंग्रेजी में हिंदी |
इसीलिए भाषा के विषय में 
आती इनकी बिंदी |

शर्म नहीं महसूस करो 
यदि अंग्रेजी का ज्ञान नहीं |
चुल्लू भर पानी में डूब मरो 
यदि हिंदी पर अभिमान नहीं |

भले अनेक भाषाएँ सीखो 
किन्तु अधूरा ज्ञान न हो |
तुम्हारी नादानी से किसी 
भाषा का अपमान न हो |

कैसे साहित्य , समाज चढ़ेगा 
विकास की नयी सीढ़ी |
संकर साहित्य , समाज रचेगी 
आज की संकर पीढ़ी  |


                                   "प्रवेश "

Thursday, September 29, 2011

पश्चिमी हवायें

पश्चिमी हवायें 

डूबते हुये सूरज की 
बीमार, ललाम किरणों से 
आंशिक पीतिमा लिये 
उत्तर - पश्चिम से उठते हुये 
श्याम - पीत बादलों से 
एक उम्मीद सी जगी थी 
कि सरकते - सरकते 
ये घिर आयेंगे 
मेरे बंजर खेत के ऊपर 
और बरसायेंगे
नवीन जलधार 
ताकि उग सके 
एक नयी पौंध और 
तैयार हो स्वस्थ फसल |
लेकिन पश्चिम से ही आती हुई 
बेलगाम और अल्हड़ हवायें 
जिन्हें ना बहने की तहजीब 
ना ठहरने का तरीका 
या यूं कहें कि 
अमर्यादित हवायें 
उड़ा ले गयी 
मेरी उम्मीदों को |
उन रसभरी घटाओं संग 
खेत की सतह की 
मिट्टी भी उड़ चली |
निर्लज्ज हवाओं से 
मेरी उम्मीद हार गयी |



                               
पाश्चात्यता का प्रभाव उजागर करने का प्रयास किया गया है |

                                                                

                                             "प्रवेश "

Monday, September 26, 2011

क्या मैं जानता हूँ तुम्हे !


क्या मैं जानता हूँ तुम्हे !

एक नाकाम सी कोशिश करता हूँ 
तुम्हें समझने की ,
 जानने की ,
तुम्हें अच्छे से पहचानने की ,
कभी खुद ही
दावा करता हूँ 
कि मैं जान चुका हूँ ,
पहचान चुका हूँ ,
तुम्हें दिल की गहराइयों से |
कुछ नहीं रह गया 
अब जानने - समझने को ,
एक भ्रम सा होता है 
कि मैं तुम्हें पहचान लेता हूँ
तुम्हारी  आहट से ही  ,
तुम्हारा चेहरा पढ़ लेता हूँ |
अगले ही पल 
जाने क्यों
ऐसा लगता है 
कि तुम अन्जान हो
मेरे लिये ,
बस एक मामूली सी 
जान - पहचान है  हमारी |
एक गुजारिश है तुमसे 
दूर कर दो 
मेरी कश्मकश को ,
कि "क्या मैं जानता हूँ तुम्हें  !"

                                          "प्रवेश "

Friday, September 23, 2011

रास्ते का पत्थर

रास्ते का पत्थर 

वो ठोकरें खाता ,
मगर लोग गिर जाते |
किसी के जूते फट जाते ,
कोई अंगूठे पे चोट खाता ,
कोई मुँह के बल गिरता ,
किसी के दाँत गिर जाते |
कोई जो संभल कर चलता 
तो लाँघकर निकल जाता ,
अपनी ही धुन के मतवाले 
अक्सर चोट खा जाते |
कोई इतना नहीं करता 
कि झुककर उठा दे उसको ,
किनारे रख दे ताकि 
और कोई चोट न खाये |
मिटटी - पानी की संगत से 
वो जम चूका है अब वहीं, 
बिन आयास - आलम्ब के 
अब उखड सकता है नहीं |
जाने कितनी पीढियाँ
अभी और ठोकर खायेंगी !
उखाड़ फेंकेंगी उसे 
या लाँघकर ही जायेंगी |
वक़्त रहते रास्ते का 
वो पत्थर हटा दिया जाता ,
क्यों लाँघना होता उसे ,
क्यों बेवजह कोई चोट खाता !

                                                         "प्रवेश "

रूढ़िवादिता को रास्ते का पत्थर कहा गया है |

                                                                     

Saturday, September 17, 2011

ये दुनिया ऐसी ही है !

ये दुनिया ऐसी ही है !

कहीं पर डोली उठती है ,
और कहीं पर उठें जनाजे |
किसी जगह मातम का क्रंदन ,
और कहीं पर बजते बाजे |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कहीं खेल में हुई सियासत ,
कहीं सियासत बन गयी खेल |
उड़ते जहाज का पहिया फटता ,
खड़ी - खड़ी टकराती रेल |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कोई सबको अपना समझे ,
कोई अपनी ही दुनिया में मगन है |
कहीं सुधा प्रेम की बरसे ,
और कहीं ईर्ष्या की अगन है |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कोई कहे देश मेरा है (अधिकार जताना)
कोई खुद को देश का माने (कर्तव्य निर्वाह )
कोई देना न चाहे धेला ,
कोई चला सर्वस्व लुटाने |

ये दुनिया ऐसी ही है !

किसी को मेवों से नफरत है ,
कोई एक गास को तरसे |
चैन किसी को नहीं महल में ,
कोई खुश चतुर्दिक घर से |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कहीं निरा सूखा पड़ा है ,
कहीं कहर बरपाती बाढ़ |
कहीं द्वेष और घृणा ही है ,
और कहीं प्रेम - प्रगाढ़ |

ये दुनिया ऐसी ही है ! 

                                   "प्रवेश "

Wednesday, September 14, 2011

हिंदी का पुट


हिंदी का पुट


आमजन की बोली में , हँसी में ठिठोली में 

दीन की पुकार में , नेता की जयकार में 

हिंदी का पुट है |



गृहस्थी के भोग में , जोगी के जोग में 

बहुत बड़े सोची में , सड़क के मोची में 

हिंदी का पुट है |



अनाड़ी की गाली में , महफ़िल ए कव्वाली में 

बोली में किसान की , शोध में विज्ञान की 

हिंदी का पुट है |



माँ के प्यार में , बाप के दुलार में 

राशन की दुकान में , सपनों की उड़ान में 

हिंदी का पुट है |



अनशन में - आन्दोलन में , घृणा में - सम्मोहन में 

गाड़ी में रेल में , प्रतिस्पर्धा और खेल में 

हिंदी का पुट है |


                                                           "प्रवेश "

Friday, September 9, 2011

मौसम का मिजाज !


मौसम का मिजाज !

कभी देखा है बदलते हुये मौसम का मिजाज !

नहीं अगर , तो कभी मेरे शहर में आइये |



इस तरह शाम ढले लुढ़कते हैं लोग ,

जैसे टेबल के कोने पे रखा , हिल जाये गिलास |



रोज ही लोग हलाल होते हैं बकरों की तरह ,

कौन रखता है भला इतनी लाशों का हिसाब |



बेआबरू होती हैं बेटियाँ , केले की तरह ,

जिस्म बिकते हैं सरेआम , कौड़ियों के हिसाब |


कभी देखा है बदलते हुये मौसमका मिजाज !!

                                                              "प्रवेश "