Thursday, May 10, 2012
Friday, May 4, 2012
रोटी के जुगाड़ में
रोटी के जुगाड़ में
मिट्टी जो कभी आई थी , बहकर के बाढ़ में ,
सौदा उसी का तय हुआ , रोटी के जुगाड़ में ।
पुरखों ने अपनी जान से ज्यादा जिसे चाहा ,
कौड़ियों के भाव बिक गयी , बेबसी की आड़ में ।
ख्वाब तो मेरे भी थे , शीशे के महल के ,
अब झोंपड़ी जर्जर पड़ी , निरे उजाड़ में ।
सोचता हूँ चुनाव लड़कर , घोटाला बड़ा करूँ ,
फिर ऐश से बसर हो , बैठे तिहाड़ में ।
प्रवेश
Saturday, April 28, 2012
Tuesday, April 24, 2012
अनपढ़ माँ ?
अनपढ़ माँ ?
उसे मालूम है
कि विद्यालय कहाँ है
मगर बता नहीं सकती
कि किस दिशा में है ।
कभी वास्ता ही नहीं पड़ा,
मुझे छोड़ने जाती थी
मुख्य द्वार तक
और वहीँ से लौट आती थी ।
वो नहीं पढ़ सकती थी
मेरी अंकतालिका के अंक ,
दैनन्दिनी में लिखे निर्देश ,
चौराहे पर लगा साइनबोर्ड ,
टी. वी. स्क्रीन पर चलते समाचार ।
मगर वो पढ़ लेती है
मेरे माथे की शिकन,
मेरे चेहरे के भाव ,
मेरे ह्रदय के उदगार ,
मेरे मन की हर बात ।
अंगूठा लगाती है
अपने नाम की जगह
दस्तखत के लिये
मेरी अनपढ़ माँ ।
क्या वाकई अनपढ़ ?
प्रवेश
Monday, April 23, 2012
इससे पहले कि दम निकले
इससे पहले कि दम निकले
इससे पहले कि दम निकले ,
नेकी की ओर कदम निकले ।
कोशिश करो , दे पाओ ख़ुशी ,
जिंदगी से सबकी गम निकले ।
मैं ना रहे , अहम् ना रहे ,
अगर निकले तो हम निकले ।
वादे तो बदनाम हैं टूटने के लिये ,
कभी ना टूटे वो कसम निकले ।
बसंत भी सदा नहीं रहता ,
सदाबहारी का वहम निकले ।
गर्दिशों में भी जोश कम ना हो ,
चोट पड़े तो लहू गरम निकले ।
फकीर ही नहीं , दाता भी बन ,
ज्यादा ना सही तो कम निकले ।
खुदा नहीं तू , खिलौना भर है ,
दिलोदिमाग से ये भरम निकले ।
प्रवेश
Monday, April 16, 2012
रचनाधर्मिता
रचनाधर्मिता
पाठक
मशक्कत करे
भौंहें सिकोड़े
पसीना बहाये
समझने के लिये
किसी रचना का भाव
या
खुद -ब - खुद
सपष्ट होता चला जाय
जैसे गिर जाती है
पीली पड़ चुकी पत्ती
स्वतः ही डाल से ,
पानी दौड़ पड़ता है
ढलान की ओर ।
कौन सी रचना
खरी उतरती है
रचनाधर्मिता पर !!!
प्रवेश
पाठक
मशक्कत करे
भौंहें सिकोड़े
पसीना बहाये
समझने के लिये
किसी रचना का भाव
या
खुद -ब - खुद
सपष्ट होता चला जाय
जैसे गिर जाती है
पीली पड़ चुकी पत्ती
स्वतः ही डाल से ,
पानी दौड़ पड़ता है
ढलान की ओर ।
कौन सी रचना
खरी उतरती है
रचनाधर्मिता पर !!!
प्रवेश
Thursday, April 12, 2012
मोहतरमा दफ्तर जाने लगी हैं
मोहतरमा दफ्तर जाने लगी हैं
मोहतरमा दफ्तर जाने लगी हैं ,
घर खर्चे में हाथ बँटाने लगी हैं ।
मेरा बटुआ टटोलना बंद हुआ ,
अब तो खुद ही नोट दिखाने लगी हैं ।
चेहरे से घूँघट का परदा हटा है ,
अब चाँद सी नजर आने लगी हैं ।
मेरे हाथ की चपाती पसंद नहीं उनको ,
चपाती का आटा गुंधवाने लगी हैं ।
कपड़े धोना भी आता नहीं मुझको ,
शुरुआत में साबुन ही लगवाने लगी हैं ।
सुबह वाली बिस्तर की चाय बंद हो गयी ,
कोहनी मारकर हमको जगाने लगी हैं ।
घरेलू कामों का ढब कहाँ मुझको ,
अब डाँट डपटकर सिखाने लगी हैं ।
प्रवेश
Wednesday, March 28, 2012
Monday, March 26, 2012
आईना करे सवाल
आईना करे सवाल
आईना करे सवाल , क्या करूँ
पूछे मेरा हाल, क्या करूँ ।
झूठ बोलना सीखा ही नहीं
सच कहूँ तो मचे बवाल , क्या करूँ ।
झुर्रियों की वजह पूछता है
गहराती सालों - साल , क्या करूँ ।
ठहर - ठहर चलने लगा हूँ
सुस्त पड़ गयी चाल , क्या करूँ ।
जवानी के नुस्खे पढने लगा हूँ
कहीं हो न जाये कमाल , क्या करूँ ।
आईना करे सवाल क्या करूँ !!!
प्रवेश
Wednesday, March 21, 2012
अब गाँव चलूँ
अब गाँव चलूँ
शहर सुहाता नहीं , अब गाँव चलूँ ,
धुआँ सहा जाता नहीं , अब गाँव चलूँ ।
सीधे - सुल्टे पैर हैं भूतों के यहाँ ,
ये तबका खौफ तो खाता नहीं , अब गाँव चलूँ ।
कभी देखा ना जो , दिखते हैं अब ऐसे मंजर ,
नजारा कोई भाता नहीं , अब गाँव चलूँ ।
बहुत भीड़ है सड़कों पे , सूना है शहर ,
सुकून दिल कहीं पाता नहीं , अब गाँव चलूँ ।
ज़माने के साथ बदलो , बच्चे कहते हैं ,
मैं खुद को बदल पाता नहीं , अब गाँव चलूँ ।
प्रवेश
Monday, March 19, 2012
"तुम्हारे नाम से "
"तुम्हारे नाम से "
आधी छुट्टी में
मेरे बस्ते से
चित्रकला की कॉपी निकालकर
तुमने उसके आखिरी पन्ने पर
बनाया था जो गुलाबी पान का पत्ता
ऐसा लग रहा था
जैसे बिना पत्तियों की शलजम
रख दी हो
अधकटी मूल जड़ के साथ ।
मैं हँसा था और
मजाक बनाया था
तुम्हारी चित्रकारी का,
पूछने पर तुमने बताया था
कि दिल है तुम्हारा ।
मुझे संदेह हुआ था
तुम्हारी बात पर नहीं
विज्ञान की किताब पर ,
इकाई छः
'श्वसन तंत्र ' ।
गोश्त के एक टुकड़े के समान
मानव ह्रदय का चित्र था
अनेक भागों के साथ ।
तुम्हारा दिल तो एकदम अलग ,
न आलिंद न निलय
बस एक दिल ही था
सम्पूर्ण
बिना किसी भाग के ।
मेरा सवाल
"आखिर ये काम कैसे करता है ?
ये कैसे धड़कता है ?"
और तुम्हारा वो जवाब
जो मुझे निष्प्रश्न सा कर गया
"तुम्हारे नाम से "
मुझे याद है आज भी ।
प्रवेश
Friday, March 16, 2012
दोस्ती करोगे ?
दोस्ती करोगे ?
नाटा कद
चपटी नाक
धँसी हुई आँखें
उलझे केश
विशाल दन्त
चीथड़ों में लिपटा
एक खुरदरा जिस्म
फटे कपड़ो से
बाहर झाँकते
नये पुराने जख्म ,
जैसे जख्मों की
चलती - फिरती
प्रदर्शनी हो ।
दुनिया जहाँन की
तमाम बदसूरती
तमाम खामियाँ ।
बस एक ही खूबी
सीने में एक सोने का दिल ।
क्या आप दोस्ती करोगे ?
प्रवेश
Wednesday, March 14, 2012
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