Friday, December 2, 2011

जरा संभल के !


जरा संभल के !

ऐ भोली - भाली चींटियों !

जरा संभल के,

यूं बेधड़क

पार न किया करो 

इस रास्ते को,

बरामदे में भी 

एक किनारा पकड़ लो

अपने आने - जाने के लिये |

माना कि

तुम्हारा भी हक है 

बेरोक - टोक 

सीना ताने 

इस रास्ते पर चलने का ,

मगर तनिक खयाल रखो 

अपने छोटे कद का 

और कतई न भूलो 

इस बात को कि 

यहाँ हर कोई 

नजरें झुकाकर नहीं चलता,

हर एक की नजर

जमीन पर नहीं है |

                                     "प्रवेश "

Monday, November 28, 2011

गर्व या ग्लानि !


गर्व या ग्लानि !


ये ईंट

जिस पर दिया जलाकर 

दबा दी गयी है , 

जमीन की सतह से 

दो गज नीचे ,

जिस पर बनना है 

तुम्हारे सपनों का महल |


इसे ग्लानि हो 

इस बात की 

कि जब चर्चा हो 

आपके आशियाने की,

और इसकी खूबसूरती की ,

इसकी बनावट की ,

तब इसका

कोई जिक्र न होगा ,

इसके बलिदान को 

कोई याद नहीं करेगा |


या 

गर्व महसूस करे 

कि कल

जो आलीशान इमारत 

तैंयार होगी इसकी पीठ पर,

जिसकी सुन्दरता की कहानी 

इतिहास रचेगी ,

उसके चिरंजीवी होने का 

श्रेय इसी ईंट को मिलेगा |

                                    "प्रवेश "

Friday, November 25, 2011

उसे तो बस लिखना है |


उसे तो बस लिखना है |

बिजली के झूलते तारो पर 

तपती लू के अंगारों पर 

नदिया के बहते धारों पर 

उसे तो बस लिखना है |


पराजित या विजेता पर 

अच्छे या बुरे नेता पर 

मानवता के प्रणेता पर 

उसे तो बस लिखना है |


जनता के उठते हाथों पर 

जनता पर पड़ती लातों पर

सरकारी चुपड़ी बातों पर 

उसे तो बस लिखना है |


संसद के संवादों पर 

झूठे सरकारी वादों पर 

गुणों पर और अपवादों पर 

उसे तो बस लिखना है |


पेड़ों से लटकते झूलों पर 

कागज़ पर जमती धूलों पर 

आगे - पीछे की भूलों पर 

उसे तो बस लिखना है |


कुदरत के अद्भुत रंगों पर 

भूखे प्यासों और नंगों पर

पल - पल होते दंगों पर 

उसे तो बस लिखना है |


दीवानों की चाहत पर 

वफ़ा पर और बगावत पर 

टूटे और दिल आहत पर 

उसे तो बस लिखना है |


प्रेमीजन की बातों पर 

धवल चाँदनी रातों पर

खुशियों पर , सौगातों पर 

उसे तो बस लिखना है |


उस पर किसी का जोर नहीं 

उसकी सोच का कोई छोर नहीं 

वो पक्ष - विपक्ष की ओर नहीं 

वो कवि है , रिश्वतखोर नहीं

उसे तो बस लिखना है |


                                "प्रवेश "

Wednesday, November 16, 2011

काश ! कि बचपन लौट के आता |


काश ! कि बचपन लौट के आता |


काश ! कि बचपन लौट के आता |

मैं फिर से बच्चा बन जाता |

काश कि बचपन लौट के आता |


कोई मुझको डांट लगाता ,

तो झट बाबा को बतलाता |

बाबा डांट लगाते जब तो ,

माँ के आँचल में छिप जाता |


मैं बस मेरे मन की करता ,

वश तो किसी का  चल नहीं पाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |


खेलता अपने ही साये से ,

तरह - तरह के नक्श बनाता |

कभी कूदता , कभी उछलता ,

हँसता कभी , कभी रूठ भी जाता |


कभी कृष्ण तो कभी सुदामा ,

और कभी राधा बन जाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |


राग - द्वेष न पास  फटकता,

दंभ - कपट न मन में होता |

ईर्ष्या - छल का ज्ञान न होता ,

न पापी भाव जहन में होता |


बच्चों में भगवान  सुना  है  ,

और मैं भी भगवन बन जाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |


सब अपने , अपने ही होते ,

कोई भी तब गैर न होता |

सारे मन के मीत ही होते ,

और किसी से बैर न होता |



केवल प्रेम की भाषा होती ,

नफरत क्या है , जान न पाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |

                                             

                                                        "प्रवेश "

Thursday, November 10, 2011

जनता जागी है |


 जनता जागी है |

छोडो तख़्त - ओ- ताज को 

अब सोती जनता जागी है |

ये नहीं तुम्हारी दासी है ,

आजादी की अनुरागी है |


गोरों ने छोड़ दिया भारत ,

बस इसे आजादी मत समझो |

कालों ने कब्ज़ा जमा लिया ,

ये बात बड़ी दुर्भागी है |


जनता ने बिठाया गद्दी पर ,

तुम  सर्वेसर्वा बन बैठे |

ये भूल गए कि जनता भी ,

तुम लोगों की सहभागी है |


तुम तो महलों में बैठे हो ,

तुम्हें  ठण्ड की खबर नहीं |

अकड़ती देहों से पूछो ,

कि कितनी सर्दी लागी है |


कुर्सी के मद में चूर हो ,

घोड़े बेचकर सोये हो |

नींद की कीमत उनसे पूछो ,

जिनकी निंदिया भागी है |



लजीज खाना खाते हैं ,

तुम्हारे घर के कुत्ते भी |

रोटी क्या ? नहीं जानते हैं ,

जिनके पेट में अगन लागी है |


धब्बे से दिखने लगे हैं ,

तुम्हारे सफ़ेद कुर्तों पर |

अब पहचान होने लगी है ,

कितनों की  खादी दागी है |


छोडो तख़्त - ओ- ताज को 

अब सोती जनता जागी है |


                                       "प्रवेश "

Monday, November 7, 2011

जोर नहीं !


जोर नहीं !


अनजाने हम भी एक गुनाह कर बैठे |

जो दिल की कसक को आह कर बैठे ||


वो तो दोस्ती के काबिल भी  न निकले |

और हम उन्हें हमराह कर बैठे ||


कभी चलते थे वो मेरे नक्श -ए- कदम पर  |

आज वो हमें ही गुमराह कर बैठे ||


उन्हें सँवारने में हमने उम्र गुजार दी |

वो जिंदगी हमारी तबाह कर बैठे ||


हमारा ही जोर न चला कमबख्त दिल पर |

जो मोहब्बत उन्हें बेपनाह कर बैठे ||

                                                                         
अनजाने हम भी एक गुनाह कर बैठे |

जो दिल की कसक को आह कर बैठे ||


                                           "प्रवेश "

Friday, October 21, 2011

फख्र फर्क का !


फख्र फर्क का !

कभी सोचता हूँ कि
फर्क करूँ
खुद में और 
उन जानवरों में 
जो मेहनत करते हैं 
दिन - रात 
केवल अपने 
और अपनों के 
पेट की खातिर |

मैंने देखा है 
चिड़िया को 
दूर तक जाते हुये
और दाना चुगकर 
अपने चूजों के 
मुँह में डालते हुये |

मैंने भटकते देखा है
कुतिया को भी 
रोटी और हड्डी की खोज में 
अपने पिल्लों के लिये |

बिल्ली को चूहे पर 
झपट्टा मारते देखा है 
और फिर ले जाते हुये 
चूहे को बच्चों के पास |

शेर के छोड़े हुये 
गोश्त के टुकड़ों पर 
टूट पड़ते देखा है 
लोमड़ियों और लकड़बग्घों  को |

और जब तुलना की है 
अपनी श्रेष्ठता की ,
तो कुछ अलग नहीं पाया 
इन जानवरों से  |

सुबह - सुबह निकलता हूँ 
मजदूरी करने और 
खाना जुटाने 
परिवार की खातिर ,
और शाम तक 
चार आधे पेटों के लिये 
इंतजाम कर पाता हूँ |

कभी अपने और 
अपनों के सिवाय 
कुछ सूझा ही नहीं ,
कुछ भी न कर सका 
जिससे साबित  कर सकूं 
अपनी श्रेष्ठता को 
और इंसान होने पर 
फख्र कर सकूं | 

                              "प्रवेश "

Tuesday, October 18, 2011

खाना कम करो बाबू


खाना कम करो बाबू 

जरा रखो तोंद पर काबू 
जनाजा भारी होगा |
जरा खाना कम करो बाबू 
बड़ा हितकारी होगा |

कई पेट हैं भूखे 
कई थालियाँ खाली,
कोई रात दिन मेहनत करके भी 
बस खाये गाली |

कुछ ख्याल करो इनका भी 
ये कदम उपकारी होगा |
जरा खाना कम करो बाबू 
बड़ा हितकारी होगा |

छत नहीं सर पर इनके 
ना तन पर जामा ,
कृष्ण नहीं इनका कोई 
बेकृष्ण सुदामा |

कुछ दर्द खाओ ,
आंसू पियो , गुणकारी होगा |
जरा खाना कम करो बाबू 
बड़ा हितकारी होगा |

जरा रखो तोंद पर काबू 
जनाजा भारी होगा |


                                          "प्रवेश "

Tuesday, October 11, 2011

ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह जी को श्रद्धांजलि 

तुम जीतकर जग चले गये |
तुम जिधर चले पग चले गये |
तुम जीतकर जग चले गये |

तुम मौन हुये तो कलरव शून्य
डाल छोड़ खग चले गये |
तुम जीतकर जग चले गये |

तुम्हारी बीमारी का गम ही क्या कम था
जो छेड़ दुखती रग  चले गये |
तुम जीतकर जग चले गये |

अपनी सुर और स्वर गंगा से
पावन कर जग चले गये |
तुम जीतकर जग चले गये |

तुम गये तो यूँ सब ठगे रह गये ,
सारे जग को ठग चले गये |
तुम जीतकर जग चले गये |


                                          "प्रवेश "

Saturday, October 8, 2011

पेड़ों की कटाई - भविष्य से खिलवाड़

पेड़ों की कटाई - भविष्य से खिलवाड़ 

काँधे पर कुल्हाड़ी
और आरा सजाये
कहाँ चल दिए !
पेड़ काटने या भविष्य !
आने वाली पीढ़ी की
अल्पायु का इंतजाम करने !
शौक से जाइये
मगर कल
शिकायत न करना
कि " गर्मी लम्बी खिंच गयी ,
मौसम ही नहीं बदला ,
जाने बरसात कब होगी !"
फिर नहीं मिलेंगे
उछलते - कूदते मृगशावक ,
आराम फरमाती शेरनी ,
पेड़ों से झूलते बन्दर
और जलक्रीड़ा करते गजराज |
तब चलाते रहना
इन्हें बचाने के अभियान पे अभियान |
ज़रा तो सोचो कि
जिसका घर उजाड़ दिया ,
उसे कहाँ पनाह दोगे |
इन्हें कंकरीट का जंगल
कतई नहीं भाता |
अगर इतना ही जरूरी है काटना ,
तो बहुत कुछ है काटने को |
जाँत - पात और वैमनस्य की
भावना को काटो |
उत्तरी और दक्षिणी
दुर्भावना को काटो,
और समूल काट डालो
रूढवादिता की उस खरपतवार को
जो पनपने नहीं देती
नयी सोच को , नयी पौंध को |
मगर पेड़ काटना ही
तुम्हें बखूबी  आता है |


                                         "प्रवेश "

Wednesday, October 5, 2011

संकर पीढ़ी

संकर पीढ़ी 

ना ही अंग्रेजी जानें ये 
और ना हिंदी ही आती |
इनके मुख से निकलने में 
दोनों भाषाएँ लजाती |

हिंदी में अंग्रेजी डालें 
अंग्रेजी में हिंदी |
इसीलिए भाषा के विषय में 
आती इनकी बिंदी |

शर्म नहीं महसूस करो 
यदि अंग्रेजी का ज्ञान नहीं |
चुल्लू भर पानी में डूब मरो 
यदि हिंदी पर अभिमान नहीं |

भले अनेक भाषाएँ सीखो 
किन्तु अधूरा ज्ञान न हो |
तुम्हारी नादानी से किसी 
भाषा का अपमान न हो |

कैसे साहित्य , समाज चढ़ेगा 
विकास की नयी सीढ़ी |
संकर साहित्य , समाज रचेगी 
आज की संकर पीढ़ी  |


                                   "प्रवेश "