Monday, July 18, 2011

नाम - बदनाम

नाम - बदनाम 

रेत के घर की तरह 
अभिमान भी ढह जाना है |
बुरा हो या भला 
बस नाम ही रह जाना है |

सौ बरस जी कर भी गर 
किसी को ख़ुशी न दे पाइये |
तब बोझ बनकर ही जिये ,
साँस रोकिये , मर जाइये |

दो घडी ही जिंदगी में ,
काम आयें  किसी के |
वस्तुतः साकार होंगे ,
मायने जिंदगी के |

भला कर सकते नहीं तो ,
बुरा भी क्यों कीजिये |
सर्वांग होते हुये भी ,
अपंग समझ लीजिये |

नाम हों , गुमनाम हों ,
बदनाम होइये नहीं |
आने वाली पीढ़ी को 
गम में डुबोइए नहीं |

धूल - मिट्टी से बना तन ,
धूल में मिल जाना है |
यश और अपयश ही 
दुनिया में रह जाना है |

                                       "प्रवेश "

Wednesday, July 13, 2011

ला दो ढूँढकर

ला दो ढूँढकर 


कुछ अमन के पल सुहाने ,
चैन ला दो ढूँढकर |

बेख़ौफ़ होकर सो सकूं, 
वो रैन ला दो ढूँढकर |

अपनापन जिनमे दिखे ,
दो नैन ला दो ढूँढकर |

मचले हमें मिलने को ,
दिल बेचैन ला दो ढूँढकर |

                                                         "प्रवेश "

Saturday, July 9, 2011

छत पर

छत पर 

आज मौसम बड़ा सुहाना है छत पर |

कुछ देर में उन्हें भी आना है छत पर |


भाँप ले कोई गर बेचैनी मन की |

तो समझे कोई दीवाना है छत पर | 


यूँ तो आहाते में काफी जगह है |

कपडे सुखाना , बहाना है छत पर |


जूड़ा खुलेगा और झटकेंगी जुल्फें |

काली घटा को भी छाना है छत पर |


पलक न झपकने की प्रतियोगिता है |

निगाहों में सारा ज़माना है छत पर |


सरगम सी घुल रही है हवा में |

आती - जाती साँसों का तराना है छत पर |


दोनों की पलकें झपकी हैं संग - संग |

जीतना किसे है , हार जाना है छत पर |


अच्छा जी अब उतरते हैं छत से |

कल इसी वक़्त वापस आना है छत पर |

                                                          "प्रवेश "

Tuesday, July 5, 2011

विलुप्ति के कगार पर

विलुप्ति के कगार पर 

किसी को खुशियाँ दे जाता ,
किसी को गम दे जाता था |
उसके आने की राह में हर कोई ,
पलक - पांवड़े बिछाता था |

कोई खिड़की , चौबारे से ,
कोई देखती उसे झरोखे से |
कोई मन मसोसकर रह जाती ,
उसके आने के धोखे से |

खाट पर बैठे बूढ़े बाबा ,
हुक्का गुडगुडाते थे |
उसके आने की खबर से ,
नंगे पाँव , दौड़कर आते थे |

गिल्ली - डंडा , दौड़ , कबड्डी ,
बच्चे छोड़ चले आते |
प्रश्नों की बौछार होती ,
फिर खेलने लग जाते |

चमड़े का थैला लटकाये ,
हर घर तक वो जाता था |
चिट्ठी , धनादेश , तार की 
ऊंची आवाज लगाता था |

तकनीक का ग्रहण लगा ,
पाती , धनादेश , तार पर |
आज यह प्रजाति खड़ी है ,
विलुप्ति के कगार पर |



                                       "प्रवेश " 

Monday, June 27, 2011

सियासी गलियारे

सियासी गलियारे 

बड़ी चहल - पहल है यहाँ ,
बड़े दिलकश नज़ारे हैं ,
ये सियासी गलियारे हैं |

यहाँ कोई दुश्मन नहीं ,
पर दोस्तों का खौफ है |
दुश्मनों से दोस्ती 
पुराना सियासी शौक है |

जुबाँ पर मीठे बोल हैं ,
मगर दिल में अंगारे हैं ,
ये सियासी गलियारे हैं |

छूना चाहो गगन तो 
ऊंचाइयों की हद नहीं |
नीचे गिरना चाहो तो 
गड्ढों की भी सरहद नहीं |

अभी बुलंद, अगले ही पल 
यहाँ गर्दिश में सितारे हैं |
ये सियासी गलियारे हैं |

यहाँ कोई जुर्म कभी ,
होता नहीं संगीन है |
घर का ही कानून है ,
तो शाम भी रंगीन है |

जनता पे लाठी तोड़ें जो ,
इस मुहल्ले के प्यारे हैं |
ये सियासी गलियारे हैं |

एक बार इन गलियों में 
जो भी प्रवेश कर जाता है |
या राज दिलों पे करता है ,
या दिल से उतर जाता है |

कितने ही बिठाये गद्दी पर,
जाने कितने उतारे हैं |
ये सियासी गलियारे हैं |


                                    "प्रवेश "

Wednesday, June 22, 2011

एक मोल की दुकान

एक मोल की दुकान

 कभी देखी है 

एक मोल की दुकान !

यहाँ एक ही भाव मिलता है 

हर एक सामान |


हर ग्राहक के लिए 

एक ही भाव ,

भेद - भाव नहीं ,

सब एक समान |


लेकिन देखा है मैंने 

यहाँ नियम बदलते ,

पल - पल हर घडी ,

इंसान दर इंसान |


ग्राहक दर ग्राहक 

 बदलता व्यवहार ,

किसी को दुत्कार 

तो किसी को सम्मान  |


चेहरा बदलते ही 

भाव भी बदलते ,

लेकिन बाहर लिखा है ,

एक मोल की दुकान |


लोकतंत्र की तुलना दुकान से की गयी है |

                              "प्रवेश "


Monday, June 20, 2011

लाल पाणी कि बोतल

लाल पाणी कि बोतल 

लाल पाणी कि बोतला सलाम तकैं |
राती ब्याव सबै कुनी फाम तकैं |

गणेश पूजा में लै तेरी मांग है गे ,
तेरी जरूरत आब हर आंग है गे ,
तू दगड़ी छै तो नि लागुन ग़म मकैं |
लाल पाणी कि बोतला सलाम तकैं |

म्यर गौं क नन -  ठुल सब तयार यार छीं ,
आब तो सैनी लै त्यारै तरफदार छीं , 
तू ना तो पसंद नि ऑन क्वे काम मकैं |
लाल पाणी कि बोतला सलाम तकैं |

हर बखत आब  त्यारै विचार कुनू ,
त्यर बिना हर घडी बीमार रहुनू ,
तू छै तो नि ऑन जर - जुकाम मकैं |
लाल पाणी कि बोतला सलाम तकैं |

ब्याव जब लेबरी कबर घर में आनू ,
सच बतूं , कसम से भौते थाकि जानू ,
त्यर द्वी घूँट दी दिनी  ऐराम मकैं |
लाल पाणी कि बोतला सलाम तकैं |

जब बै गौं - गौं में तेरी चर्चा है गे ,
तू लै खूब रंग बदलन भै गे ,
त्यर बकाई रंगोंक लै औनी नाम मकैं |
रंगीली - चंगिली  कि बोतला सलाम तकैं |

                                                         " प्रवेश"


कल का अखबार

कल का अख़बार 

कल सुबह 
साईकिल की टोकरी में बैठकर 
इस घर तक आया था ,
सबसे पहले मुझे 
दादीजी ने देखा और 
दादाजी को बताया |
दादाजी ने बड़े प्यार से 
मेरा दीदार किया |
कभी मंद- मंद मुस्काए ,
कभी भौंहे चढ़ा ली |
धीरे -धीरे  मुझे 
हर सदस्य ढूँढने लगा |
किसी ने ' समाज '
किसी ने ' परिवार '
किसी ने 'खेल '
तो किसी ने 'शेयर '
एक - एक कर सभी पन्ने 
अलग कर दिए |
धीरे - धीरे सब अपने 
काम में व्यस्त होने लगे ,
जो जहाँ था उसने 
वहीँ पन्ने छोड़ दिये |
शाम होते - होते 
मेरी अहमियत 
समाप्त हो चुकी थी |
आज सुबह मेरे 
सभी पन्ने समेटे गये ,
और ' कल का अख़बार '
कहकर डाल दिया रद्दी में |
कल मेरी कीमत 
तीन रुपये थी ,
आज प्रति किलो तीन रुपये के 
ढेर में पड़ा हूँ |
कभी हाथों - हाथ लिया ,
कभी गोद में बिठाया ,
कभी सीने से लगाया ,
कभी चूमा भी मुझे कल तक ,
लेकिन आज ... आज मैं बेकार हूँ |
जी हाँ.. मैं कल का अख़बार हूँ |

                                               "प्रवेश "

Wednesday, June 15, 2011

भौत कुछ बदली गो |

भौत कुछ बदली गो 

भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |

टीने कि छत तोड़ी बे 
इस्कूलम लेन्टर है गो ,
दस तकौक इस्कूल 
आब इंटर है गो |
ननूं कें दिक्कत नि छौ
आब इस्कूल जाण में ,
भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |

बट घटूंक पाणि 
आब भ्यार है गो ,
दूर आब यूँ बटुक 
कच्यार है गो |
सीमेंटक बट बणे हाली  
खड़ंज उखाड़ बे ,
भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |

बिन पियै डंगरी  
आसन में नि जान ,
दी पैग लगाई बिना 
आंग द्य्यप्त ले नि आन |
जाणी क्या - क्या बकि दिनी 
अखाण बखाण में ,
भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |

टी. वी. देखी बिना 
टैम पासै नि हुन ,
बिन टी. वी. देखियै 
भैंस दूध ले नि दयून |
ना जुमुई, ना भीमू ,
आब पघरूंछ टी. वी. लगाण में 
भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |

आठ बोरी ग्यौनूं जगम 
चारै हनी ,
कुछ बानर , कुछ सुंगर 
कुछ छुटी गोर खानी |
के मेहनत ले कम है गे 
और पाणि ले नि छौ गाण में 
भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |


                                    "प्रवेश"





Tuesday, June 14, 2011

उल्लंघन

उल्लंघन 

कभी अनशन , कभी सत्याग्रह , कभी आन्दोलन करना पड़ता है ,
मेरे देश में एक कानून बनाने के लिये |
तोड़ दिया जाता है , झाड़ू की सींक सा ,
रिश्वत से पैंसा कमाने के लिये |
हर वाहन में यात्रियों की संख्या को लेकर ,
प्रावधान है दुर्घटना से बचने के लिये |
कल ही रिश्वत लेते - देते देखा ,
पुलिस से बच निकलने के लिये |
दस की जगह में पन्द्रह को लेकर ,
राजमार्ग पर चली जा रही थी गाड़ी |
पुलिस ने रोका , चालक से पूछा ,
इतनी सवारी कैसे भर दी अनाड़ी?
कायदा कहता है , जुर्माना लगाओ ,
पाँच सवारी उतारो , टालने को हादसा |
लेकिन सवारी उतारी ना कोई ,
चुपचाप थाम लिया एक नोट पचास का |
क्या जरूरत है ऐसे में ,
नियम - प्रावधान की !
जहाँ पचास रुपये कीमत हो ,
पन्द्रह की जान की |


                                      "प्रवेश" 

Saturday, May 28, 2011

काश !

काश !


बड़ी तकलीफ होती है 
आज जब बेटा मुझसे 
दो दूनी पूछता है और 
मैं अपनी उँगली उसकी 
माँ की तरफ कर देता हूँ |
कभी दस रुपये के सामन के 
बीस भी दे आता हूँ |
बड़ी तकलीफ होती है 
जब कलाई पर घडी होते हुए भी 
दूसरों से समय पूछना पड़ता है |
लोगों के नाम के साथ - साथ 
मोबाइल में मैंने उनकी 
तस्वीर भी लगवा रखी है |
एक बटन दबाकर मुझे 
गाना चलाना तो आता है ,
पर जो गाना बजता है 
वही सुनना पड़ता है ,
क्योंकि मुझे गाना बदलना नहीं आता |
ठेकेदार मजदूरी के 
जो भी रुपये देता है ,
चुपचाप थाम लेता हूँ ,
अगर गिन पाता तो 
मजदूरी क्यों करता |
कभी समय निकालकर जब 
दुकान पर बैठता हूँ ,
तो मेरा बेटा भी साथ जाता है ,
मैं पंक्चर निकालता  हूँ और 
वो हिसाब लगाता है |
मुझे याद है जब पिताजी 
मुझे स्कूल छोड़ने जाते थे ,
मेरी तख्ती और दावात 
खुद ही ले जाते थे ,
पर गिल्ली - डंडा, 
गेंद - बल्ले के सिवाय कुछ 
सूझे तो स्कूल में रुकें |
पिताजी ने प्रलोभन भी दिया 
और डांट भी लगाई,
लेकिन मैं स्कूल की ओर
पीठ करके सोता था |
आज जब सर्वांग होते हुए भी 
खुद को लाचार पाता हूँ ,
तब सोचता हूँ 
काश ! मैंने पढ़ लिया होता |

                                           "प्रवेश"

Sunday, May 22, 2011

लकीरें

लकीरें



किस्मत का फैसला करती हैं 
हाथों की लकीरें 
और बदकिस्मती भी तय 
ये लकीरें ही करती हैं |

दो हाथों की लकीरें 
एक तक़दीर से खेलती हैं ,
कभी संवार देती हैं उसे 
तो कभी बिगड़ देती हैं |
मगर दिलों में खिंची लकीरें 
दरारें बन जाती हैं ,
और चौड़ी होकर दरारें 
बन जाती हैं खाईयाँ |
खाई के दो हिस्से अगर 
कोशिश भी करें मिलने की ,
और बड़ी खाईयाँ 
बन जाती हैं नाकामी में |
और जब लकीरें खींचती हैं 
दो मुल्कों के बीच
तो बदकिस्मती शुरू 
हो जाती है आवाम की |
लकवा मार जाता है 
दोनों ही मुल्कों को ,
होंठ कहते नहीं , कान सुनते नहीं ,
आँखों के सामने भी धुंधलका सा होता है |
बातें होतो हैं तो 
सिर्फ तोपों और बंदूकों से ,
जिसमे झुलसकर दम 
तोड़ देती है इंसानियत |
मगर खिंची हुई लकीर को 
मिटाता नहीं कोई ,
एक बड़ी लकीर खींच देता है ,
पहली को छोटी करने को |

                                      "प्रवेश " 

Wednesday, May 18, 2011

परमानेंट स्टाफ

परमानेंट स्टाफ 

क ने ख से कहा एक दिन ,
क्यों देर से आते आप हैं ?
ख ने कहा नादान हो तुम ,
हम परमानेंट स्टाफ हैं |

देर से आना , जल्दी जाना ,
शान हमारी बढती है ,
इससे परमानेंट होने की 
पहचान हमारी बढती है |

हम एक दिन काम पे न भी आयें ,
सात खून हमारे माफ़ हैं ,
तुम दैनिक मजदूरी वाले ,
हम परमानेंट स्टाफ हैं |

एक साल में नहीं कमा 
पाते हो मजदूरी से जितना ,
एक महीने में ही मजे से 
पाते हैं हम वेतन उतना |

ये पिछले पुण्य हमारे हैं ,
पिछले ही तुम्हारे पाप हैं ,
इसीलिये तुम दैनिक हो ,
हम परमानेंट स्टाफ हैं |

सुनकर ख की बात ,
क ने चुप्पी साध ली ,
चुपचाप लग गया काम में ,
शिकायत की गठरी बाँध ली |

मजदूरी से बच्चे पालेगा,
 छः बच्चों का बाप है ,
इनका भला क्या जाता है ,
ये तो परमानेंट स्टाफ है |

                                       "प्रवेश"