मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Thursday, March 24, 2011

बछिया की फ़िक्र

बछिया की फ़िक्र 

नयी ख़ुशी घर आने को थी ,
गाय दोबारा ब्याने को थी ,
सबने बछड़े की आस लगाई ,
इस बार भी बछिया ही आई |

सबको ही बछिया की फ़िक्र ,
कैसे निजात मिले ये जिक्र ,
इसकी कीमत कौन लगायेगा ,
कोई मुफ्त भी न ले जायेगा |

जब बछिया बड़ी हो जायेगी ,
और घर से बाहर जायेगी ,
छूटे सांड गली में फिरते ,
कैसे लाज बचायेगी |

अगर मिल गयी आँख किसी से ,
और जुड़ गयी काँख किसी से ,
खुद तो ये बदनाम होगी ,
घर की इज्जत नीलाम होगी |

घर वालों को कौन बताये ,
कैसे कोई उन्हें समझाये,
गायें ही बछड़े जनती हैं ,
बछिया ही गायें बनती हैं |

                                             "प्रवेश"

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