Monday, March 26, 2012

आईना करे सवाल


आईना करे सवाल



आईना करे सवाल , क्या करूँ 

पूछे मेरा हाल,  क्या करूँ ।


झूठ बोलना सीखा ही नहीं 

सच कहूँ तो मचे बवाल , क्या करूँ ।


झुर्रियों की वजह पूछता है 

गहराती सालों - साल , क्या करूँ ।


ठहर - ठहर चलने लगा हूँ 

सुस्त पड़ गयी चाल , क्या करूँ ।


जवानी के नुस्खे पढने लगा हूँ 

कहीं हो न जाये कमाल , क्या करूँ ।


आईना करे सवाल क्या करूँ !!!



                                  प्रवेश 

Wednesday, March 21, 2012

अब गाँव चलूँ


अब गाँव चलूँ 


शहर सुहाता नहीं , अब गाँव चलूँ ,

धुआँ सहा जाता नहीं , अब गाँव चलूँ ।


सीधे - सुल्टे पैर हैं भूतों के यहाँ ,

ये तबका खौफ तो खाता नहीं , अब गाँव चलूँ ।


कभी देखा ना जो , दिखते हैं अब ऐसे मंजर ,

नजारा कोई भाता नहीं , अब गाँव चलूँ ।


बहुत भीड़ है सड़कों पे , सूना है शहर ,

सुकून दिल कहीं पाता नहीं , अब गाँव चलूँ ।


ज़माने के साथ बदलो , बच्चे कहते हैं ,

मैं खुद को बदल पाता नहीं , अब गाँव चलूँ ।


                                           प्रवेश 

Monday, March 19, 2012

"तुम्हारे नाम से "


"तुम्हारे नाम से " 



आधी छुट्टी में

मेरे बस्ते से 

चित्रकला की कॉपी निकालकर

तुमने उसके आखिरी पन्ने पर 

बनाया था जो गुलाबी पान का पत्ता 

ऐसा लग रहा था 

जैसे बिना पत्तियों की शलजम 

रख दी हो

अधकटी मूल जड़ के साथ  ।

मैं हँसा था और

मजाक बनाया था

तुम्हारी चित्रकारी का,

पूछने पर तुमने बताया था 

कि दिल है तुम्हारा ।

मुझे संदेह हुआ था 

तुम्हारी बात पर नहीं 

विज्ञान की किताब पर ,

इकाई छः 

'श्वसन तंत्र ' ।

गोश्त के एक टुकड़े के समान 

मानव  ह्रदय का चित्र था 

अनेक भागों के साथ ।

तुम्हारा दिल तो एकदम अलग ,

न आलिंद न निलय 

बस एक दिल ही था 

सम्पूर्ण 

बिना किसी भाग के ।

मेरा सवाल 

"आखिर ये काम कैसे करता है ?

ये कैसे धड़कता है ?"

और तुम्हारा वो जवाब 

जो मुझे निष्प्रश्न सा कर गया 

"तुम्हारे नाम से " 

मुझे याद है आज भी ।


                                प्रवेश 

Friday, March 16, 2012

दोस्ती करोगे ?


दोस्ती करोगे ?


नाटा कद 

चपटी नाक 

धँसी हुई आँखें 

उलझे केश 

विशाल दन्त 

चीथड़ों में लिपटा 

एक खुरदरा जिस्म

फटे कपड़ो से 

बाहर झाँकते 

नये पुराने जख्म ,

जैसे जख्मों की 

चलती - फिरती 

प्रदर्शनी हो ।

दुनिया जहाँन  की 

तमाम बदसूरती 

तमाम खामियाँ ।

बस एक ही खूबी 

सीने में एक सोने का दिल ।

क्या आप दोस्ती करोगे ?



                         प्रवेश 

Monday, February 27, 2012

कहाँ मिलेंगी किताबें ?


कहाँ मिलेंगी किताबें ?


जो भी लिखा है 

उससे संतुष्ट नहीं हूँ मैं 

उत्कृष्ट कृति का आना 

बाकी है अभी ।


मगर एक विचार आया 

जितना लिखा है 

एक किताब छपवा दूँ 

अपने नाम के साथ ।


जोड़ -तोड़ कर 

इंतजाम किया 

धनराशि और प्रकाशक का 

किताब के लिये ।


एक बिजली सी कौंधी 

मस्तिष्क में 

एक प्रश्न आया 

तकनीक के इस युग में 

जब कंप्यूटर और अंतर्जाल 

फ़ैल रहा है 

अमरबेल की तरह ,

लैपटॉप पहुँच चुका है 

हमारी रजाई में ,

यहाँ तक कि 

पाखाने में भी ,

तो आने वाले समय में 

कहाँ मिलेंगी किताबें ?


बच्चों की पढाई के कमरे में 

किसी मेज पर या कुर्सी पर ,

किसी अलमारी की दराज में ,

या बैठक कमरे में सोफे पर ,

घर के सामने 

बगीचे में रखी बेंच पर 

या हरी - हरी घास पर !

शायद इनमे से कहीं नहीं !

तो फिर कहाँ मिलेंगी ?


एक जगह जहन में आयी है 

निचली मंजिल में अंतिम छोर पर 

वो छोटी सी कोठरी ,

जहाँ दादी की खाट लगी है 

और एक लाल बल्ब जलता है

अँधेरा चीरने को ।

वहीँ कहीं दाल के पीपे के ऊपर 

पड़ी मिलेंगी कुछ 

और कुछ कोने में खड़े 

बोरे में बंद ,

कुछ पसरी होंगी 

दादी की खाट के नीचे ।

भला और कहाँ मिलेंगी किताबें ?


प्रवेश 

Thursday, February 23, 2012

थोड़ी कड़वाहट


थोड़ी कड़वाहट


स्वर्ण रजत हीरे जड़ित, मखमल सेज सहेजि।

चिरनिद्रा के वास्ते वही काठ की सेजि ।। १ 


नाना प्रसाधन भये , जे रखि रूप निखारि ।

ऐसे ना साधन भये , जे चित्त देइ सुधारि ।। २ 


प्रवेश दुनिया बावली , छूकर मृत नहात ।

अरु जीवित को करि मृत , बड़े चाव से खात ।। ३


सम्बन्ध सकल सवारथी, तकैं काल की राह ।

निकरि आवै शुभ काज तो , करैं टाल की चाह ।। ४


मन पावन नाही किया , वस्त्र गेंहुएं ओढ़ ।

कृत्रिम खाल चढ़ाय ली , असल खाल में कोढ़ ।। ५ 


प्रजा बात करे हक़ की, याद दिलाते लीक ।

राजा चाहे जो करे , सब कानूनन ठीक ।। ६


मात - पिता का मशवरा , समझ न लीजै डाँट । 

ज्यों सुन्दर उद्यान में , बहुत जरूरी  छाँट ।। ७ 


पौंध लगाईं एक ना, जीवनपुर के गाँव ।

आयि दुपहरी जेठ की, कह कित पावै छाँव ? ८


फँसती जाती पंक में , सुरनद करे विलाप ।

नर - नर की खातिर खाई , खोदै अपने आप ।। ९


जलत-जलत वन जल बिना, शाख -पात जल जात ।

भूमि तले जड़ ना जलै, जल मिलि पुनि नव पात ।। १० 


तू - तू करता जो चला, पहुँचा तेरे पास ।

जो मैं - मैं करता चला, खायी गल की फाँस ।। ११


अर्थ - अर्थ का फेर है , अर्थ सगे सब खैर ।

अर्थ सगे आनन्द है , अर्थ सगे ही बैर ।। १२ 


संगत बड़ी कमाल की , असर न  खाली देत ।

एक तोता भजे राम को , दूजा गाली देत ।। १३


कल - कल में कल गया , कल - कल में आज ।

कल में ही कल जायेगा , कल में तख़्त -ओ- ताज ।। १४


जो जी ना हारे कभी, जीना हार पहिराय ।

जीना ऊपर ले चले , जीना नीचे लाय ।।  १५


टुकड़े - टुकड़े करि कथा , कविता लई बनाय |

देखि आप की दुर्दशा , कविता नीर बहाय || 16

हिन्दी - हिन्दी सब कहें , इक पखवाड़े धूम |

शेष साल हिन्दी रहे , अपनों से महरूम ||  17


दे हरि दे हरि जग कहे , हरि की चौखट छाड़ि |

हरि देहरि जो जात है , हरि दे छप्पर फाड़ि || 18


शुद्ध लिखी जो वर्तनी , उच्चारण में जान |

भाव मिले जो चाहिये , रचना को सम्मान || 19

चला नाक के सीध में, पहुँचा हरि के द्वार ।

दाहिन - बाहिन जो चला, माया के बाजार ।। 20

असी बरस की जिंदगी , एक ही पल की मौत ।

दोनों का रिश्ता अहो , ज्यों घरवाली - सौत ।। 21

दीमक बरगद खा गयी , लौह खा गयी जंग ।

ईर्ष्या मन को खा गयी , चिन्ता नयी उमंग ।। 22

नहीं समझ तो ना चले , उपदेशों से काम ।

ज्यों गंजों की दौड़ में , कंघी मिले इनाम ।। 23

राह भले ही हो कठिन , चले चलो चुपचाप ।

मंजिल चूमेगी कदम , शिखर छुओगे आप ।। 24

लक्ष्य रहे निगाह में , मन में हो उल्लास ।

जो चले वो पहुँच गये , ठहरे हुये निराश ।। 25

हरी - हरी दो दिन मिले , नयी गाय को घास ।

तीजे दिन डंडा मिले , चौथे दिन उपवास ।। 26

उमर गयी करते हुये , जमा खर्च की बात ।

जमा किया जिनके लिये , वही मारते लात ।। 27

जैसे आंधी में हवा , लहरों में तूफ़ान ।

जैसे सूरज में चमक , वैसे तन में प्रान ।। 28

मन मलिन मुख चन्द्र सम , अति कुटिल व्यवहार ।

ते ही सुन्दर जगत में , जे मन बसि सुविचार ।। 29

रूप ना देखो मीत का , देखि लियो किरदार ।

बुरी नजर जब भी लगे , काजल देय उतार ।। 30

मैं - मैं करि बकरी मरी , उल्टी छुरी हलाल ।

मैं से ही हो जायगा , बकरी जैसा हाल ।। 31

राजनीति ना है बुरी , बुरे आ पड़े लोग ।

परमारथ को त्यागकर , लक्ष्य हो गया भोग ।। 32

जड़ना हो आरोप तो , हिंदी से शुरुआत ।

और सफाई के बखत , अंग्रेजी में बात ।। 33

दाँत गड़े खट्टा लगे , खाकर आये स्वाद ।

आँवल के लक्षण जैसी , दादी जी की बात ।। 34

सभी फूल ना फल बनें , सब फल ना आहार ।

सभी बीज ना तरु  बनें , सब तरु ना फलदार ।। 35


लिखते - लिखते लिख दिया , नश्वर यह संसार |

प्रेम अमर है सर्वदा , जीवन का यह सार || 36


पानी तू ही प्रेमिका, पानी तू ही सौत |


पानी से ही जिंदगी, पानी से ही मौत || 37


वक्ता ऐसा चाहिए, खींचे सबका ध्यान |

बड़बोलापन ना रहे, बातों में हो ग्यान || 38


खोलन चाहूं दर्द हो, बंद करूँ तो चैन |

कंप्यूटर के सामने , ज्यादा दुखते नैन || 39


चुप रह जाना है कला, चुप रहना इक रोग |

चुप रह जाने के लिये, करें साधना लोग || 40


सही समय पर नींद ले, सही समय पर जाग |

असमय करते काज जो, रहती भागमभाग || 41


अच्छा लगने के लिये, अच्छा कीजे काम |

अच्छा - अच्छा बोलिये, जग में होगा नाम || 42


महँगा जूता पहनकर, ठक- ठक- ठक- ठक जाहि |

नजर धरा पर ना रही, मुँह की ठोकर खाहि || 43


ठण्डी - ठण्डी है हवा, ठण्डा - ठण्डा घाम |

सोते रहते भास्कर, करते अति विश्राम || 44


सुखदायी रजाई है, पीड़ा देत समीर |

पंछी भी नहीं चाहते, सुबह त्यागना नीड़ || 45


                                                 प्रवेश 

Saturday, February 18, 2012

The show must go on


The show must go on

If I am there

Or not

Doesn't matter,

Matters a lot.


Doesn't matter

For unknown 

Neither entity

Nor clone.

No feeling

No personal touch

Why to matter

In case such.


Matters a lot 

To dearest one,

Had good time

Lot of fun.

To my parents 

And dear friends,

Carry customs 

And trends.


No can fill 

The vacuous space,

At any cost

In any case.

But any weather

Any zone,

The Show must

Go on.

                        Pravesh 

Thursday, February 16, 2012

सास सास ना रही


सास सास ना रही 


सास सास ना रही 

उतनी भी ख़ास ना रही 

वो रौब न रहा 

बहू को खौफ ना रहा |

न जाने क्या बात  हुई 

कैसे कहानी पलट गई 

सास नरम हो गई 

बहू गरम हो गई 

सास का स्तर गिर गया 

या बहू का सर फिर गया !!

सास के बंद ताने 

बहू के शुरू गाने 

सास भी झूमे 

दोनों साथ में घूमें |

सास हुंकार भरती थी

बहू बिल्ली सी डरती थी

अब बहू जोर से बोले 

तो सास मुँह ना खोले |

कैसे कहानी 

एकदम से टर्न हो गयी !

कहीं ऐसा तो नहीं कि 

सास भी मोडर्न हो गयी !!?

                      प्रवेश