Saturday, October 24, 2015

तय है

बकरियों का रेवड़ जा रहा है
कसाई - बाड़े की तरफ
काली - सफ़ेद
भूरी - चितकबरी
सींग वाली
बिना सींग की
बाँझ - गाभन - दुधारू
बूढी - जवान
सुन्दर मेमने
बकरे भी हैं
दाढ़ी वाले
बिना दाढ़ी के
किसी पर छपा है
कोई पवित्र निशान
समय हाँक रहा है
कसाई बनकर ,
यहाँ सभी कटेंगे
बिना लाड़ - प्यार के
बिना भेदभाव के
सबके गले रेते जायेंगे ।
बकरे नहीं भूले हैं
दाढ़ी और सींगों की धौंस जमाना
जबकि जानते हैं
तय है जान जाना । ~ प्रवेश ~

Thursday, September 17, 2015

आओ मिलकर गाली दें

नल की टोंटी हुई ख़राब
पानी जाये बेकार
इस बरबादी के लिये
जिम्मेदार सरकार ।

आओ मिलकर गाली दें ।

कूड़ा फेंकें सड़क पर
बड़े - बड़े होशियार
फिर चिल्लायें लग गया
कूड़े का अंबार ।

आओ मिलकर गाली दें ।

शीश-कवच पहना नहीं
आ गये टाँके चार
सिर फट जाने के लिये
जिम्मेदार सरकार ।

आओ मिलकर गाली दें ।

दाएँ - बाएँ देखकर
सड़क नहीं की पार
अनचाहा एक हादसा
कर गयी मोटरकार ।

आओ मिलकर गाली दें ।

जल्दी - जल्दी के लिये
घूस खिलाते यार
काम निकलते ही कहें
हो गया भ्रष्टाचार ।

आओ मिलकर गाली दें ।

घात लगाये बैठे हैं
कुत्ते - गिद्ध - सियार
घर से जिनको नहीं मिले
कभी भले संस्कार ।

आओ मिलकर गाली दें । ~ प्रवेश ~ 

Tuesday, August 18, 2015

इंसान बना देता है

हमें हमेशा लगता है
कच - कच करने से
बिगड़ जाती है बात
और पानी फेरना भी
इशारा इसी ओर करता है
लेकिन
वो छिड़कता है पानी भी
और करता है कच  - कच
देखते ही देखते
अमानुष को इंसान बना देता  है । ~ प्रवेश ~ 

Wednesday, June 24, 2015

भूख को पेट-निकाला !

मैं देखना चाहता हूँ
वह दिन जब
भूख उदर की
दर - दर भटके
उसे खाली न मिले
कोई भी पेट,
जो मिले कहीं
तो व्यवस्था हो
ताकि तुरंत दिया जा सके
भूख को पेट-निकाला !
आप ये न समझें
कि मैं अमर होना चाहता हूँ,
यह आशावादिता है !! ~ प्रवेश~

पहाड़

गर्मियों में बहुत भाते हैं पहाड़ |
छुट्टी बिताने लोग आते हैं पहाड़ ||
चमड़ी सुखाती है जब गर्मी शहर की
भूले - बिसरे याद आते हैं पहाड़ ||
देखो कितना बड़ा दिल है इनका
गैरों को भी गले से लगाते हैं पहाड़ ||
चैन - सुकून मुफ्त ही देते हैं
एहसान नहीं जताते हैं पहाड़ ||
मेहमान से लौट जाते हैं फिर से
साल भर के लिए भूल जाते हैं पहाड़ || ~ प्रवेश ~

Wednesday, April 29, 2015

मानवता और प्रलय

जब भी कोई मुल्क
आपदा की चपेट में आता है,
मानवता का सबसे पावन 
रूप सामने आता है । 
छोटी - छोटी बातों पर जो 
आँख दिखाता बड़ी - बड़ी, 
तोड़ के सीमा का बंधन, 
पड़ौसी का धर्म निभाता  है । 

मानवता है गुण प्राकृतिक, 
और प्रलय भी प्राकृतिक है । 
प्रलय के जग जाने से 
मानवता जगना स्वाभाविक है । 
ह्रदय और मस्तिष्क परस्पर 
सामंजस्य बिठा लेते हैं, 
मानव का ऐसा चरित्र 
सच्चरित्र है और  नैतिक है । 

मानवता और प्रलय दोनों 
जाति - धर्म को नहीं मानते ,
दोनों ही नक़्शे पर खींची 
रेखाओं को नहीं जानते । 
फिर भी रेखाओं के ऊपर 
रेखाएँ खींचे जाते हैं 
मानवता सो जाती है और 
अब के मानव नहीं मानते । ~ प्रवेश 

Friday, March 27, 2015

तुकबंदी जरूरी है ।

ये ना समझें मजबूरी है,
तुकबंदी जरूरी है ।
आ से आ तुक मिले न मिले
ई से ई भी भले न मिले
किन्तु मिले तुक भावों का
मिले तुक अनुभावों का ।
बात बेतुकी कौन सराहे
कोई सुनना तक न चाहे,
कभी किसी को कहो बेतुका
उसी समय हो धक्का मुक्का । 
तुक मिले ही रचना पूरी है,
तुकबंदी जरूरी है । ~ प्रवेश ~

Tuesday, March 17, 2015

बहती कविता

आइये रचें
बहती हुई कविता
जो आकार ले ले उसी बर्तन का
जिसमें भरना चाहो आप ।
साथ ही बचें
अति बौद्धिकता और अतिवादिता से |
भीगने दो कम्बल, बरसने दो पानी ,
पेड़ों से मछलियों को उतार दो
पानी में आग नहीं लगी है । ~ प्रवेश ~

Tuesday, February 3, 2015

अख़बार पढ़ रहा हूँ

एक लड़के का स्टाइल लड़की को भा रहा है
लड़का खास किस्म का पान मसाला खा रहा है ।
थोड़ी आगे जाकर राशिफल लिखा है
दोस्तों के हाथों मेरा क़त्ल लिखा है ।
बड़ा सा विज्ञापन है, बाल लम्बे - लम्बे हैं
देखने वालों को खूब ही अचम्भे हैं ।
वैवाहिकी में छपे डेढ़ सौ कुँआरे हैं
सर्वगुण सम्पन्न सारे  के सारे हैं ।
मौत सबको आती है, हल्की सी दस्तक है
आज आठ लोगों की तीये की बैठक है ।
एक चित्र केशी है, एक चित्र टकला  है
तेल बहुत सस्ता है, कुछ न कुछ तो घपला है ।
बेरोजगार लोगों का एक अलग पन्ना है
काम खूब करना है, दाम थोड़ा मिलना है ।
गोलियाँ छपी हैं , मर्दानगी बढ़ाने को
दूध कैसे लायेंगे , गोलियों को खाने को !
कहीं एक कोने में बलात्कार की खबर है
दो ही लाइनों में भ्रष्टाचार की खबर है ।
कहीं किसी छक्के पे कोटि - कोटि वारे हैं
कहीं बुलंद सितारों के गर्दिश में सितारे हैं ।
आप ये न सोचें कि यूं ही गढ़ रहा हूँ ।
सच कह रहा हूँ, अख़बार पढ़ रहा हूँ । ~ प्रवेश ~

Tuesday, December 30, 2014

नववर्ष मंगलमय हो

पूरब से उग आयेगा
फिर पश्चिम में छिप जायेगा
साँझ ढलेगी फिर वैसे
चंदा नभ में छा जायेगा
फिर ओस गगन से धीरे - धीरे
धरती पर उतरती है
ये भी वैसे ही गुजरेगी
जैसे हर रात गुजरती है,
भूखा, भूखा सो जायेगा
ठण्डा - ठण्डा पानी पीकर
बिन चादर के ठिठुरेगा
मर - मरकर और जी - जीकर,
चंदा - सूरज की साजिश से
फिर इक बार सुबह होगी
फिर हताश आशाओं की
नये दिन से सुलह होगी,
बेरोजगार फिर सड़कों पर
काम तलाशेगा दिन भर
घर से जैसा निकला था
वैसे ही शाम लौटेगा घर,
नया साल बस बदलेगा
कुछ इश्तहार अख़बारों पर
नए कैलेंडर लटकेंगे
घर - दफ्तर की दीवारों पर,
वही पिछला उपदेश सुनो
नित नवकर्म में तन्मय हो
सभी मित्रों - अमित्रों का
नववर्ष मंगलमय हो । ~ प्रवेश ~

Wednesday, December 24, 2014

कुहरा छाया हुआ सा है

समझकर चाँद सूरज को
मन भरमाया हुआ सा है ।
आँखों से शुरू होकर
कुहरा छाया हुआ सा है ।

नमी है, गीला - गीला है
खड़े पेड़ों के घेरे में,
शबनम ने इन्हें शब भर
नहलाया हुआ सा है ।

दुबक ख़ामोश बैठे हैं
परिंदे भी घरौंदों में,
सख्तमिज़ाज बाप लौटकर
घर आया हुआ सा है ।

झीने - झीने से परदे से
बचाकर आँख झाँके है,
ये सूरज भी दुल्हनिया सा
शरमाया हुआ सा है ।

जो पीते हैं गरम पानी
पहनते हैं गरम कपड़े,
ये जाड़ा भी उनसे कोई
शह पाया हुआ सा है ।

नन्हे इस्कूली बच्चों से
घर से निकले मजूरों से,
सरहद पर रहते वीरों से
घबराया हुआ सा है । ~ प्रवेश 

Friday, December 5, 2014

आओ पढ लो मुझे

आओ पढ लो मुझे
जैसे पढी थी बचपन में
दो एक्कम दो
दो दूनी चार,
और कंठस्थ किया था
अ से अनार
आ से आम,
देखो ... देखो
तुम्हें आज भी याद है,
उसी मस्ती और
बेफिक्री से पढो |
देखो वैसे न रटना
जैसे रटे थे
बीजगणित के सूत्र,
मतलब के लिये पढे
पास हुए और भूल गये | ~ प्रवेश ~

Monday, November 10, 2014

जहाँ पतलून बँधती है , वहीँ कमर नहीं होती ।

जिनकी आँखों पे पट्टी हो,
उनकी सहर नहीं होती ।
चकाचौंध रहती है,
मगर रौशनी भर नहीं होती ॥

बात सलीके की छोड़ो,
बिगड़ी का नाम फैशन है ।
जहाँ पतलून बँधती है ,
वहीँ कमर नहीं होती ॥

बड़े - बूढ़े जो कहते हैं,
वो बात पते की होती है ।
कड़वी ज़रूर होती है
मगर ज़हर नहीं होती ॥

सब खेल पेट का होता है,
हर एक कहानी रोटी की ।
कभी तेरे घर नहीं होती,
कभी मेरे घर नहीं होती ॥

वो भूख मिटाने निकले हैं,
जो केवल मेवे खाते हैं ।
भूखे पिछवाड़े रहते हैं ,
इनको खबर नहीं होती ॥ ~ प्रवेश ~