Saturday, April 4, 2026

सेवानिवृत्ति

सेवानिवृत्ति के बाद बदल जाती है दिनचर्या

समर्पित सेवक समय लेते हैं ढलने में

सरलता से नहीं जाता सेवा का भाव।

सेवा में रहते हुए जो रहते हैं सेवानिवृत्त 

सेवा चाहते हैं सेवानिवृत्ति के बाद

चाहकर भी नहीं आता सेवा का भाव। ~प्रवेश~

Wednesday, January 14, 2026

गुड मॉर्निंग

जिसे ऐतराज था 

कि उसे दीपावली पर न कहा जाय 

हैप्पी दिवाली,

जो सुनना चाहता था 

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ ,

आज मिला तो बोला 

आजकल बच्चे 

उसे गुड मॉर्निंग विश नहीं करते। ~ प्रवेश ~  

Sunday, August 10, 2025

हे मानव ! मैं हूँ प्रकृति

हे मानव ! मैं हूँ प्रकृति 

तू भूल गया मेरी प्रवृत्ति 

तुझे कुछ याद दिला दूँ मैं 

तेरा स्थान बता दूँ मैं। 

तू पर्वत - जंगल काट - काट 

बनाने चला सड़कें सपाट 

नदी के मुहाने मोड़ चला 

तू स्वयं विनाश की ओर चला। 

कर दी पारिस्थितिकी छिन्न - भिन्न 

तू ही उत्तम, सब और निम्न !

तेरी स्वार्थ-नीति सर्वत्र बही 

आखिर ! कितना सहेगी मही !!

तूने बहुविधि बहु पाठ पढ़े 

समतल में ऊँचे भवन गढ़े 

खेतों में सघन नगर उपजे 

बरसें तो मेघ किधर बरसें ?

तू आगे बढ़ किन्तु ये स्मरण रहे 

जिस क्षण तक रवि में किरण रहे 

मैं पलटवार कर सकती हूँ 

पुनः निज स्वरूप धर सकती हूँ। 

जहाँ जंगल थे, जंगल फिर होंगे

न रुका, अमंगल फिर होंगे 

जहाँ बहती थी नदी, बहेगी वहीं 

तेरी दासी नहीं रहेगी मही। ~ प्रवेश ~ 



Sunday, May 12, 2024

बड़े आए हैं मदर्स डे वाले

 बड़े आए हैं 

मदर्स डे वाले


तुझे फुरसत न हो 

तो कोई बात नहीं 

जब वो करे तो

उसका फोन उठा ले


तू पैंसे भेजकर 

फर्ज़ अदा समझता है

कभी पूछ ले- माँ

कैसे हैं पाँव के छाले


तुझे छुट्टी नहीं मिलती

कि तू उसके पास जाकर रह

अपने घर में जगह बना

उसे पास बुला ले


बड़े आए हैं 

मदर्स डे वाले 

~प्रवेश~

Tuesday, April 23, 2024

बदलाव

 तब 

जबकि डॉक्टर भी दे चुके हों जवाब 

और तुमने होश न खोया हो, 

खुद से करना एक सवाल 

कि यदि डॉक्टर बदल दे जवाब 

तो तुम खुद को कितना बदलोगे !!

~ प्रवेश ~ 

Wednesday, October 5, 2022

छोटी सी कविता - साँझ ढले

साँझ हुई 
मेहमान आये,
भेज दिया बेटा   
मुर्गा लाने को। 
परन्तु भेज न सके उसको 
क्यारी से धनिया लाने,
क्योंकि 
साँझ ढले 
पौंधों को छेड़ा नहीं करते। ~ प्रवेश ~ 

छोटी सी कविता - दौड़

हर माता - पिता चाहते हैं 

उनकी संतान  आगे निकले 

हर दौड़ में उनसे, 

सिवाय एक दौड़ के 

दुनिया छोड़ने की दौड़ !! ~ प्रवेश  ~   


Friday, July 15, 2022

जीवन ने दोनों सिखलाया
रोना भी - मुस्काना भी
बाधाओं से लड़ते जाना
हँस - हँस ग़म पी जाना भी ।

जीवन ने दोनों सिखलाया 
अपना भी - पराया भी 
मोह के बंधन तोड़ के उड़ना 
घेर के लाये माया भी। 

जीवन ने ये भी सिखलाया 
समय तेरा तो सब तेरे 
तेरा समय गुज़र जाये तो 
साथ न देगा साया भी। ~ प्रवेश ~ 


Tuesday, September 28, 2021

सूर्यदेव का दोष


सड़क जो बनी बरसात के बाद
रही साल भर चकाचक
खूब बटोरी वाहवाही
अगली बारिश आने तक।

अब फिर से बारिश आयी है
अपने संग जाने क्या लायी है
तारकोल से कंकड़ बिछड़ गए
कंकड़ -कंकड़ छितरायी है।

जो सड़क धूप में सही रही
बारिश आने पर टूटी है
ऐसा प्रकृति ने कोप किया
जनता की किस्मत फूटी है।

ठेकेदार - नेता के ऊपर
जनता का अकारण रोष है
सड़क टूटने में सारा
सूर्यदेव का दोष है।

न तपता सूरज तेजी से
न भाप समंदर से उठती
न बादल बनते- वर्षा होती
न बारिश में सड़क लुटती। ~प्रवेश~

Thursday, July 15, 2021

जैसा हूँ वैसा रहने दो

जैसा हूँ वैसा रहने दो।
मुझको मुझ जैसा रहने दो।।  

तुम सा तो मैं हो न सकूंगा।
अपना मशविरा रहने दो।। 

दर्द का सबब भूल न जाऊँ। 
घाव अभी हरा रहने दो।।

असल चेहरे दिख जायेंगे। 
अँधेरा कमरा रहने दो।।

जागेगा तो चीख़ उठेगा। 
सोया है सोया रहने दो।।

खुशियों से हम मर जायेंगे। 
थोड़ा और ज़िन्दा रहने दो।।~ प्रवेश ~ 

Thursday, May 13, 2021

धर यमराज भेष, फैली है देस - बिदेस, कोरोना के रूप में मुसीबत बड़ी आयी है। 

विषम समय - काल, थमी है जीवन की चाल, आज मानवता की परीक्षा की  घड़ी आयी है। 

आत्मनियंत्रण - संयम - सावधानी को परखने मनुज पे दुःखों की झड़ी आयी है। 

जैसे बीता अच्छा कल, बीत जायेगा ये पल, मानव जाति कई विपदाओं से लड़ी आयी है। 


जंगलों को काट के शहर बसाने के बाद, प्राणवायु के लिए तरसता है आदमी। 

त्याग दिये गाँव, त्यागी पीपल की छाँव, किवाड़ बंद घरों में अब बसता है आदमी। 

वाणी से विषधर बन, उठा के जहरीला फ़न, आदमी को आदमी संग डँसता है आदमी। 

घूमे पगलाया सा, बौराया मारा - मारा फिरे, लाशों के अम्बार पर हँसता है आदमी। 


जाग रे मनुज जाग, फिर से जगेंगे भाग, रख अपने आस - पास प्रकृति को संवार कर। 

करता है जितना तू निज संतति से नेह, पेड़ - पौंधों से भी प्यारे उतना ही प्यार कर। 

जितना कमाया यहाँ, उतना चुकाना भी है, लालच में पड़कर न साँसों का व्यापार कर। 

अब भी समय है, तू चाहे तो संभल जा, या चुपचाप अपनी बारी का इंतजार कर।  ~ प्रवेश ~ 




Wednesday, August 26, 2020

ऐ माटी मेरे गाँव की

ऐ माटी मेरे गाँव की 
तू मुझे बुला ले पास तेरे 
करूँ कैसे बयां कि हैं कैसे जुड़े 
तेरे संग अहसास मेरे।  

मेरी उँगली पकड़ मुझे लेकर चल 
मेरे खेतों में खलिहानों में 
जहाँ ठण्डी पवन सौंधी खुशबू 
भर दे मेरी इन साँसों में। 

तूने पाला मुझे तूने प्यार दिया 
इन हाथों को कुछ काम भी दे 
तेरे पास ही रोजी चलती रहे तो 
तेरा बेटा शहर का नाम न ले। 

मुझे तेरी कसम  मेरा प्यार है तू 
ये शहर मुझे नहीं भाता है 
 मैं रहना चाहूँ पास तेरे 
यहाँ दम सा घुटा मेरा जाता है। 

मैं करूँ दुआ वापस लौटूं 
मेरे गॉंव की ओर कदम निकले
जब तक मैं जियूँ तेरे पास जियूं 
तेरी गोद में मेरा दम निकले। ~ प्रवेश ~ 




Thursday, June 4, 2020

एडमिन

आदमी न 

ए डी एम आई आदमी एन न 
अर्थात
आदमी नहीं है एडमिन
अपितु आदमी से अलग
साधारण मनुष्य से
कहीं ऊपर उठ चुका
एक देवांश है एडमिन |
एडमिन एक शक्ति पुंज है
जिसमें निहित हैं
समूह की सभी शक्तियां
समूह के विस्तार की शक्तियां
समूह के संचालन की शक्तियां
शक्तियां समूह को मर्यादित रखने की
और समूह के विघटन की शक्तियां |
सोशल मीडिया ग्रुप रूपी बारात में
दूल्हे का पिता है एडमिन
जिसको सबकी सुननी है
सबकी माननी है
जिसको मनाना है रूठे फूफे को
हर एक को खुश रखना है |
एडमिन चाहे कुछ भी हो
मगर मेंबर्स से बड़ा नहीं है एडमिन
मेंबर्स से ही बना है एडमिन
यदि मेंबर्स नहीं तो क्या है एडमिन !! ~ प्रवेश ~





Saturday, April 25, 2020

घर के बाहर मौत खड़ी है

घर के बाहर मौत खड़ी है
कठिन परीक्षा की ये घड़ी है ।।

पैरों में जो पड़ी है बेड़ी 
हीरे - मोतियों से जड़ी है।।

पेट कहे ये दौर है मुश्किल
सिर को बस नाम की पड़ी है।।

होने को उम्मीद बहुत है
मगर भूख से कहाँ बड़ी है।।

आने वाला घर लौटेगा 
पटरी अभी नहीं उखड़ी है।।

मुझको उस पर ऐतबार है
उसने मुश्किल जंग लड़ी है।। ~प्रवेश~

Tuesday, April 14, 2020

हे अघोषित युद्ध के वीरो तुम्हें प्रणाम है


हे अघोषित युद्ध के वीरो तुम्हें प्रणाम है
जब रुक गया संसार में मानव का मानव से मिलन
तब कर रहे तुम अनवरत निज कर्तव्य का निर्वहन
जब स्वयं के तन को छूने पर भी लग गया हो बंधन
तब कर रहे तुम रुग्ण जन का मुक्त हृदय से आलिंगन
तुम्हारा सेवा भाव निःस्वार्थ है निष्काम है
हे अघोषित युद्ध के वीरो तुम्हें प्रणाम है |

अज्ञात है जब शत्रु तब भी मोह निज का त्यागकर
तुम लड़ रहे मैदान में बिन थके निरन्तर जागकर
साधारण मनुज होता तो कब का चला जाता भागकर
करके कोई झूठा बहाना लम्बी छुट्टी मांगकर
तुम्हें तो कर्तव्य पथ पर बढ़ते जाना अविराम है
हे अघोषित युद्ध के वीरो तुम्हें प्रणाम है |

हम हृदय से ऋणी हैं, हम आप के कृतज्ञ हैं
ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दें, जो आपसे अनभिज्ञ हैं
हे देवों के अंश आप स्वयं ही मर्मज्ञ हैं
कोई माने या न माने राम तो सर्वज्ञ हैं
जगत का कल्याण करने आप सब में राम है
हे अघोषित युद्ध के वीरो तुम्हें प्रणाम है | ~ प्रवेश ~

Monday, April 13, 2020

जो डर गया - समझो बच गया

वो जो बच जाएंगे
इस तूफ़ान के गुजर जाने के बाद
इसके किस्से सुनाएंगे
अपनी आने वाली नस्लों को
कि कैसे मिट गए
किसी की ना सुनने वाले
किसी की ना मानने वाले
कैसे टूट गए वो दरख़्त
जो तने रहे अपनी अकड़ में
और तेज़ हवा से जमींदोज हो गए
उनसे पूछेंगे बच्चे
दादा तुम कैसे बचे
तो उनके पास मौका होगा
खुद की तारीफ़ करने का
खुद के गाल बजाने का
जबकि उन्होंने कुछ किया ही नहीं
सिर्फ घर में रहे
डरकर रहे - डटकर रहे
और झूठी साबित कर दी
गब्बर सिंह की बात
अब नया किस्सा होगा
जो डर गया - समझो बच गया | ~ प्रवेश ~

Tuesday, March 31, 2020

मत छोड़ो घर-द्वार

अपने घर में रह रहे, संयम से जो लोग |
उनको लग नहीं पायेगा, कोरोना का रोग ||

सजग रहें सब जन यहाँ, जतन करै सरकार |
जन जमाव न हो सके, मत छोड़ो घर-द्वार ||

हाथ मिला या ना मिला, साबुन से धो हाथ |
एक मीटर तू दूर रह, दे अपनों का साथ ||

रब हो खुदा या यीशु हों, या हों भोलेनाथ |
यह संकट टल जाने दो, दरस करेंगे साथ || ~प्रवेश~

Tuesday, March 17, 2020

मजदूर मिस्त्री

एक दिन देख लिया उसे
एक ठेकेदार ने गारा बनाते हुए
और मजदूर समझ बैठा |
ठेकेदार मुग्ध हुआ
उसकी क़ाबिलियत पर
जिस तरह उसने फावड़ा चलाया
और मिस्त्री ने उसकी तारीफ़ की |
ठेकेदार ने उसे ऑफर दिया
कुछ रुपये बढ़ा के मजदूरी देने का
और वो मान भी गया
इस तरह एक मिस्त्री मजदूर बना
और मजदूर ही रह गया | ~ प्रवेश ~


Monday, January 6, 2020

जनता कभी नहीं देखेगी
उन्हें इज्जत भरी निगाह से

जो पत्थर मारें रखवालों को
देश को गाली देते हैं
जो जनता को पिटवाते हैं
जो दंगों को भड़काते हैं
जो देश में आग लगाते हैं
जो इस घर का तो खाते हैं
मगर गुण पड़ोसी के गाते हैं
भारत माता की जय कहने में
बेशर्मी से शरमाते हैं

उनको भी जो बाँट रहे हैं
इंसानों को जात में ,
बंदूकें जो बाँट रहे हैं
बच्चों को सौगात में ,
मूसलचंद बने फिरें
जो दाल में और भात में ,
माइक - कैमरा देखकर जो
नहीं रहें औकात में |

रोड़े जो अटकाते हैं
राष्ट्रोन्नति की राह में
राष्ट्र प्रथम जो नहीं मानते
पद प्रतिष्ठा की चाह में
आज ही उनको कर देना
चाहूंगा आगाह मैं
कभी नहीं  उठ पाएंगे वो
जनता की निगाह में | ~ प्रवेश ~







Sunday, September 15, 2019

चुपचाप चालान भर ले

तुझे किसने हक़ दिया
तू अपने हक़ की बात कर ले?
जेब में लाईसेंस नहीं है
चुपचाप चालान भर ले।

मौत के कुएं में 
गाड़ी चलाना आसान है
गर सड़क पर आ गया तो
आफ़त में जान है।
हजार जुर्माना है तो
तू आधे का इंतजाम कर ले 
जेब में लाईसेंस नहीं है 
चुपचाप चालान भर ले।

सड़क पर जो दिख रहा है
मत उसे गड्ढा समझ तू
कार्य प्रगति पर है प्यारे
कार्य का हिस्सा समझ तू।
मानकर इसको चुनौती
हिम्मत से पार कर ले
जेब में लाईसेंस नहीं है 
चुपचाप चालान भर ले।

मत समझ चालान 
तेरी हैसियत से ज्यादा भारी
कह रही सरकार
उसको है तुम्हारी जान प्यारी
अपने शुभचिंतक की
बात का तू मान धर ले
जेब में लाईसेंस नहीं है 
चुपचाप चालान भर ले। ~प्रवेश~