Friday, October 11, 2013
Friday, October 4, 2013
क्या बदल जायेगी सूरत बेवजह चीत्कार से ?
सूरत बदलनी है तो बदलो वोट के हथियार से ।।
बाहर निकालो आस्तीनों में छिपे जो अब तलक ।
साँप कभी पालतू बनते नहीं पुचकार से ॥
बिक जाते हो रंग - बिरंगे कागजों और पानी में ।
अनजान हो तकदीर के निर्माण के अधिकार से ॥
मैं किसी दल के किसी नेता का सम्बन्धी नहीं ।
जागरूक करना चाहता हूँ लेखनी की धार से ॥
फिर से फेंके जायेंगे टुकड़े लुभाने के लिये ।
अभी - अभी पता चला है आज के अखबार से ॥
रहनुमा जो भी चुनो , होशोहवास में चुनो ।
बहस करते हो बहुत मामूली दुकानदार से ॥ ~ प्रवेश ~
सूरत बदलनी है तो बदलो वोट के हथियार से ।।
बाहर निकालो आस्तीनों में छिपे जो अब तलक ।
साँप कभी पालतू बनते नहीं पुचकार से ॥
बिक जाते हो रंग - बिरंगे कागजों और पानी में ।
अनजान हो तकदीर के निर्माण के अधिकार से ॥
मैं किसी दल के किसी नेता का सम्बन्धी नहीं ।
जागरूक करना चाहता हूँ लेखनी की धार से ॥
फिर से फेंके जायेंगे टुकड़े लुभाने के लिये ।
अभी - अभी पता चला है आज के अखबार से ॥
रहनुमा जो भी चुनो , होशोहवास में चुनो ।
बहस करते हो बहुत मामूली दुकानदार से ॥ ~ प्रवेश ~
सिर तुम्हारा - अक्ल तुम्हारी
सिर तुम्हारा
अक्ल तुम्हारी
मंदिर तुम्हारा
भगवान तुम्हारा
मस्जिद तुम्हारी
खुदा तुम्हारा
मगर अफ़सोस !!!
फिर भी सब कुछ
माइक - माला वालों के पास
गिरवी रखे बैठे हो । ~ प्रवेश ~
Monday, September 2, 2013
स्वतंत्र मतदाता
कौन बनेगा प्रधानमंत्री !
मुझे फर्क नहीं पड़ता |
राजनीति विश्लेषकों के
कभी तर्क नहीं पढ़ता |
किसी भी दल का नेता आये
लेकर हाथ में पर्चा |
बड़े गौर से सुनता हूँ
अपने उत्थान की चर्चा |
हर दल की रैली में
खूब लगाता नारे |
बुरा नहीं कहता हूँ किसी को
एक से दल हैं सारे |
कोई कम्बल, कोई बैसाखी
कोई बाँटे रजाई |
कोई आँखों का शिविर लगाये
मुफ्त मिले दवाई |
कोई पव्वा, कोई बोतल
कोई बाँटे नोट |
जिसका तोहफा सबसे महँगा
उसी का मेरा वोट |
नियत समय पर सदा
मतदान केंद्र पहुँच जाता हूँ |
प्रधानमंत्री चुनने वाला
मैं स्वतंत्र मतदाता हूँ | ~ प्रवेश ~
मुझे फर्क नहीं पड़ता |
राजनीति विश्लेषकों के
कभी तर्क नहीं पढ़ता |
किसी भी दल का नेता आये
लेकर हाथ में पर्चा |
बड़े गौर से सुनता हूँ
अपने उत्थान की चर्चा |
हर दल की रैली में
खूब लगाता नारे |
बुरा नहीं कहता हूँ किसी को
एक से दल हैं सारे |
कोई कम्बल, कोई बैसाखी
कोई बाँटे रजाई |
कोई आँखों का शिविर लगाये
मुफ्त मिले दवाई |
कोई पव्वा, कोई बोतल
कोई बाँटे नोट |
जिसका तोहफा सबसे महँगा
उसी का मेरा वोट |
नियत समय पर सदा
मतदान केंद्र पहुँच जाता हूँ |
प्रधानमंत्री चुनने वाला
मैं स्वतंत्र मतदाता हूँ | ~ प्रवेश ~
Saturday, August 31, 2013
और भी कई काम हैं मुझे
ऑफिस जाना
काम करना
घर लौटना
बाजार जाना
राशन लाना
सब्जी लाना
फिर घर जाकर
पानी भरना
दूध लाना
खाना बनाना
किताबें भी पढता हूँ मैं
खाना खाना
और सो जाना
दुनियाभर के और भी
कई काम हैं मुझे
तुझे याद करने के सिवाय ,
इसलिये
अब तुझे
भूलना ही छोड़ दिया ।
" प्रवेश "
काम करना
घर लौटना
बाजार जाना
राशन लाना
सब्जी लाना
फिर घर जाकर
पानी भरना
दूध लाना
खाना बनाना
किताबें भी पढता हूँ मैं
खाना खाना
और सो जाना
दुनियाभर के और भी
कई काम हैं मुझे
तुझे याद करने के सिवाय ,
इसलिये
अब तुझे
भूलना ही छोड़ दिया ।
" प्रवेश "
Saturday, August 24, 2013
बेशक रहो शालीन, पर हुंकार भी रखो ।
लबों पर हँसी , कमर में कटार भी रखो ॥
इंसान हो तो प्यार से पुचकारना भला ।
हैवान हो तो जेहन में दुत्कार भी रखो ॥
बनना - सँवरना , रूप पर इतराना कब तलक ।
कोमलता रखो पर चेहरा रौबदार भी रखो ॥
अंजाम जो भी हो, अस्मत से बड़ा नहीं ।
अब तो लड़ाई आर की या पार की रखो ॥ ~ प्रवेश ~
लबों पर हँसी , कमर में कटार भी रखो ॥
इंसान हो तो प्यार से पुचकारना भला ।
हैवान हो तो जेहन में दुत्कार भी रखो ॥
बनना - सँवरना , रूप पर इतराना कब तलक ।
कोमलता रखो पर चेहरा रौबदार भी रखो ॥
अंजाम जो भी हो, अस्मत से बड़ा नहीं ।
अब तो लड़ाई आर की या पार की रखो ॥ ~ प्रवेश ~
Friday, August 16, 2013
भीमिया की लुगाई
आजाद है भीमिया की लुगाई
उसे आजादी है
अपने घर में खुलकर हँसने की
अपना मुखड़ा दिखाने की
घुटनों तक घूंघट नहीं करना उसे |
उसे आजादी है
भीमिया को गलत बात पर टोकने की
नसीहत देने की
अपनी राय रखने की,
वो बस भीमिया की लुगाई नहीं
खुद का अस्तित्व रखने वाली
एक औरत भी है |
उसे आजादी है
रास्ता पूछने वाले को रास्ता बताने की
चाहे वो मर्द हो या औरत
उस पर बंदिश नहीं है
अजनबी से बात करने की |
वो खुश है अपनी आजादी से
उसे फख्र है
भीमिया की लुगाई होने पर,
मजदूर है भीमिया
और अनपढ़ भी || " प्रवेश "
उसे आजादी है
अपने घर में खुलकर हँसने की
अपना मुखड़ा दिखाने की
घुटनों तक घूंघट नहीं करना उसे |
उसे आजादी है
भीमिया को गलत बात पर टोकने की
नसीहत देने की
अपनी राय रखने की,
वो बस भीमिया की लुगाई नहीं
खुद का अस्तित्व रखने वाली
एक औरत भी है |
उसे आजादी है
रास्ता पूछने वाले को रास्ता बताने की
चाहे वो मर्द हो या औरत
उस पर बंदिश नहीं है
अजनबी से बात करने की |
वो खुश है अपनी आजादी से
उसे फख्र है
भीमिया की लुगाई होने पर,
मजदूर है भीमिया
और अनपढ़ भी || " प्रवेश "
Monday, August 12, 2013
क्यों इस तरह से बवाल कीजिये
क्यों इस तरह से बवाल कीजिये
अब खुद ही अपनी कोई ढाल कीजिये ।
बेटे तो तुम्हारे पालने तक ही थे
अम्मा ! अब खुद अपनी देखभाल कीजिये ।
आता नहीं अगर कोई जवाब उधर से
तो फिर क्यों सवाल पे सवाल कीजिये !
इससे पहले कि जंग खा जाये
तलवार का सही इस्तेमाल कीजिये ।
हौंसला न कीजिये जवानी की तरह
तनिक उमर का भी तो खयाल कीजिये ।
" प्रवेश "
भारी होती हैं बेटियाँ
बहुत भारी होती हैं बेटियाँ
बेटा गोद में होता है
कभी कंधे पर भी
सिर पर भी चढ़ जाता है
और बेटी को --
अगर नसीबों वाली है तो,
चलना होता है
उँगली पकड़कर,
गोद में नहीं उठाना है उसे
क्योंकि भारी होती हैं बेटियाँ ।
नौकरी ढूँढ रहा है बेटा
कोशिश तो कर ही रहा है
और कोशिशों में बिता चुका है
पैंतीस बसंत,
फिर भी बोझ नहीं है बेटा ,
बीस की हो गयी है बेटी
उसकी उम्र में
माँ बन गयी थी माँ -- दो बच्चों की,
कोई रिश्ता नहीं आया अब तक
और गली में उसकी उम्र की
कोई है भी तो नहीं,
बोझ बन गयी है बेटी ।
बहुत भारी होती हैं बेटियाँ !! " प्रवेश "
बेटा गोद में होता है
कभी कंधे पर भी
सिर पर भी चढ़ जाता है
और बेटी को --
अगर नसीबों वाली है तो,
चलना होता है
उँगली पकड़कर,
गोद में नहीं उठाना है उसे
क्योंकि भारी होती हैं बेटियाँ ।
नौकरी ढूँढ रहा है बेटा
कोशिश तो कर ही रहा है
और कोशिशों में बिता चुका है
पैंतीस बसंत,
फिर भी बोझ नहीं है बेटा ,
बीस की हो गयी है बेटी
उसकी उम्र में
माँ बन गयी थी माँ -- दो बच्चों की,
कोई रिश्ता नहीं आया अब तक
और गली में उसकी उम्र की
कोई है भी तो नहीं,
बोझ बन गयी है बेटी ।
बहुत भारी होती हैं बेटियाँ !! " प्रवेश "
कोशिशें
कोशिशें
अक्सर कामयाब हो जाती होंगी ,
लेकिन कोशिश करने वाले
कामयाब हो ही जाने की
कोशिश नहीं करते ।
कहीं ना कहीं
नाकामयाबी के लिये
जगह छोड़ देते हैं
कोशिश करने वाले
और सफाई देने के लिये
गुंजाइश भी,
"कोशिश तो की थी "।
जो कामयाबी को निशाना बनाते हैं
उन्हें पक्षी , पेड़, पत्ते, सहचर
और आसमान नहीं दिखाई देता,
उन्हें दिखाई देती है
तो केवल पक्षी की आँख ।
साधक द्वारा
साधन से
साध्य की प्राप्ति । ~ प्रवेश ~
अक्सर कामयाब हो जाती होंगी ,
लेकिन कोशिश करने वाले
कामयाब हो ही जाने की
कोशिश नहीं करते ।
कहीं ना कहीं
नाकामयाबी के लिये
जगह छोड़ देते हैं
कोशिश करने वाले
और सफाई देने के लिये
गुंजाइश भी,
"कोशिश तो की थी "।
जो कामयाबी को निशाना बनाते हैं
उन्हें पक्षी , पेड़, पत्ते, सहचर
और आसमान नहीं दिखाई देता,
उन्हें दिखाई देती है
तो केवल पक्षी की आँख ।
साधक द्वारा
साधन से
साध्य की प्राप्ति । ~ प्रवेश ~
Tuesday, July 23, 2013
आज नहीं घर में दाना
सुन रे पंछी - तू कल आना
आज नहीं घर में दाना ।
खाली चावल की थाली है
गेहूँ का पीपा खाली है ।
मैंने भी नहीं खाया खाना
आज नहीं घर में दाना ।
हाँ , मैं ही अन्न उगाता हूँ
दुनिया को खिलाता हूँ ।
मैं भूमिपुत्र, सबने माना
पर आज नहीं घर में दाना ।
मैं हूँ किसान, मेरे खेत नहीं
मिट्टी भी नहीं और रेत नहीं ।
मैं बिना हृदय का दीवाना
आज नहीं घर में दाना ।
हाथ नहीं फैलाता हूँ
भीख माँग नहीं खाता हूँ ।
मुझे आत्महन्ता ही कहलाना
आज नहीं घर में दाना ।
" प्रवेश "
आज नहीं घर में दाना ।
खाली चावल की थाली है
गेहूँ का पीपा खाली है ।
मैंने भी नहीं खाया खाना
आज नहीं घर में दाना ।
हाँ , मैं ही अन्न उगाता हूँ
दुनिया को खिलाता हूँ ।
मैं भूमिपुत्र, सबने माना
पर आज नहीं घर में दाना ।
मैं हूँ किसान, मेरे खेत नहीं
मिट्टी भी नहीं और रेत नहीं ।
मैं बिना हृदय का दीवाना
आज नहीं घर में दाना ।
हाथ नहीं फैलाता हूँ
भीख माँग नहीं खाता हूँ ।
मुझे आत्महन्ता ही कहलाना
आज नहीं घर में दाना ।
" प्रवेश "
Monday, July 8, 2013
मोक्ष नहीं है कुर्सी
भूल कर रहे हो
कुर्सी को मोक्ष समझ रहे हो ।
मोक्ष नहीं है कुर्सी ,
एक दोराहा है ।
एक रास्ता स्वर्ग को
और दूसरा नरक को जाता है ।
एक पुण्य की ओर
और दूसरा पाप की ओर ले जाता है ।
तुम कुर्सी पर विराजमान हो ,
फैसला तुम्हारा ,
नरक को प्रस्थान या स्वर्ग को ?
कुर्सी ने तुम्हें जो शक्ति दी है
उससे तुम चाहो तो
आशीर्वाद और दुआएँ अर्जित कर लो
और चाहो तो श्राप और पाप ।
(सुना है कि कर्मों का फल
इसी जन्म में भुगतना होता है ,
फिर भी - कल किसने देखा !!)
" प्रवेश "
कुर्सी को मोक्ष समझ रहे हो ।
मोक्ष नहीं है कुर्सी ,
एक दोराहा है ।
एक रास्ता स्वर्ग को
और दूसरा नरक को जाता है ।
एक पुण्य की ओर
और दूसरा पाप की ओर ले जाता है ।
तुम कुर्सी पर विराजमान हो ,
फैसला तुम्हारा ,
नरक को प्रस्थान या स्वर्ग को ?
कुर्सी ने तुम्हें जो शक्ति दी है
उससे तुम चाहो तो
आशीर्वाद और दुआएँ अर्जित कर लो
और चाहो तो श्राप और पाप ।
(सुना है कि कर्मों का फल
इसी जन्म में भुगतना होता है ,
फिर भी - कल किसने देखा !!)
" प्रवेश "
Tuesday, July 2, 2013
दिल में कुछ अरमान बचाकर रख लो ।
दिल में कुछ अरमान बचाकर रख लो ।
मुट्ठी में तूफ़ान बचाकर रख लो ॥
भूख कहीं सब चावल- चावल ना कर दे ।
दो - एक मुट्ठी धान बचाकर रख लो ॥
माना कि आसानी से बिक जाता है ।
थोड़ा सा ईमान बचाकर रख लो ॥
मुझसे मत पूछो महफूज कहाँ होगी ।
रख पाओ तो जान बचाकर रख लो ॥
दर्द दूसरे का भी तो महसूस करो ।
पुतले में इंसान बचाकर रख लो ॥
छोड़ो दकियानूस दलीलें मजहब की ।
प्यारे ! हिन्दुस्तान बचाकर रख लो ॥
" प्रवेश "
मुट्ठी में तूफ़ान बचाकर रख लो ॥
भूख कहीं सब चावल- चावल ना कर दे ।
दो - एक मुट्ठी धान बचाकर रख लो ॥
माना कि आसानी से बिक जाता है ।
थोड़ा सा ईमान बचाकर रख लो ॥
मुझसे मत पूछो महफूज कहाँ होगी ।
रख पाओ तो जान बचाकर रख लो ॥
दर्द दूसरे का भी तो महसूस करो ।
पुतले में इंसान बचाकर रख लो ॥
छोड़ो दकियानूस दलीलें मजहब की ।
प्यारे ! हिन्दुस्तान बचाकर रख लो ॥
" प्रवेश "
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