तू - तू करता जो चला, पहुँचा तेरे पास ।
जो मैं - मैं करता चला, खायी गल की फाँस ।। ११
अर्थ - अर्थ का फेर है , अर्थ सगे सब खैर ।
अर्थ सगे आनन्द है , अर्थ सगे ही बैर ।। १२
संगत बड़ी कमाल की , असर न खाली देत ।
एक तोता भजे राम को , दूजा गाली देत ।। १३
कल - कल में कल गया , कल - कल में आज ।
कल में ही कल जायेगा , कल में तख़्त -ओ- ताज ।। १४
जो जी ना हारे कभी, जीना हार पहिराय ।
जीना ऊपर ले चले , जीना नीचे लाय ।। १५
टुकड़े - टुकड़े करि कथा , कविता लई बनाय |
देखि आप की दुर्दशा , कविता नीर बहाय || 16
हिन्दी - हिन्दी सब कहें , इक पखवाड़े धूम |
शेष साल हिन्दी रहे , अपनों से महरूम || 17
दे हरि दे हरि जग कहे , हरि की चौखट छाड़ि |
हरि देहरि जो जात है , हरि दे छप्पर फाड़ि || 18
शुद्ध लिखी जो वर्तनी , उच्चारण में जान |
भाव मिले जो चाहिये , रचना को सम्मान || 19
चला नाक के सीध में, पहुँचा हरि के द्वार ।
दाहिन - बाहिन जो चला, माया के बाजार ।। 20
असी बरस की जिंदगी , एक ही पल की मौत ।
दोनों का रिश्ता अहो , ज्यों घरवाली - सौत ।। 21
दीमक बरगद खा गयी , लौह खा गयी जंग ।
ईर्ष्या मन को खा गयी , चिन्ता नयी उमंग ।। 22
नहीं समझ तो ना चले , उपदेशों से काम ।
ज्यों गंजों की दौड़ में , कंघी मिले इनाम ।। 23
राह भले ही हो कठिन , चले चलो चुपचाप ।
मंजिल चूमेगी कदम , शिखर छुओगे आप ।। 24
लक्ष्य रहे निगाह में , मन में हो उल्लास ।
जो चले वो पहुँच गये , ठहरे हुये निराश ।। 25
हरी - हरी दो दिन मिले , नयी गाय को घास ।
तीजे दिन डंडा मिले , चौथे दिन उपवास ।। 26
उमर गयी करते हुये , जमा खर्च की बात ।
जमा किया जिनके लिये , वही मारते लात ।। 27
जैसे आंधी में हवा , लहरों में तूफ़ान ।
जैसे सूरज में चमक , वैसे तन में प्रान ।। 28
मन मलिन मुख चन्द्र सम , अति कुटिल व्यवहार ।
ते ही सुन्दर जगत में , जे मन बसि सुविचार ।। 29
रूप ना देखो मीत का , देखि लियो किरदार ।
बुरी नजर जब भी लगे , काजल देय उतार ।। 30
मैं - मैं करि बकरी मरी , उल्टी छुरी हलाल ।
मैं से ही हो जायगा , बकरी जैसा हाल ।। 31
राजनीति ना है बुरी , बुरे आ पड़े लोग ।
परमारथ को त्यागकर , लक्ष्य हो गया भोग ।। 32
जड़ना हो आरोप तो , हिंदी से शुरुआत ।
और सफाई के बखत , अंग्रेजी में बात ।। 33
दाँत गड़े खट्टा लगे , खाकर आये स्वाद ।
आँवल के लक्षण जैसी , दादी जी की बात ।। 34