Tuesday, March 1, 2011

अगर आसमां में

अगर आसमां में

अगर आसमां में मैखाने होते ,
हर पाइप के नीचे पैमाने होते |

बादल भी मय लेकर बरसते ,
तरसते न मय के दीवाने होते |

सरकार भी भला क्या कर लेती ?
न पुलिस को देने हर्जाने होते |

मुफ्त ही घर में मुहैया हो जाती ,
न ठेके के चक्कर लगाने होते |

मूड बनाते कभी भी, कहीं भी ,
बनाने न सौ - सौ बहाने होते |

मोहतरमा से जूझते क्यों भला ,
पीते शान से , सीना ताने होते |

मय भी पानी की सूरत में होती ,
शराब बचाओ अभियान चलाने होते |

                                                      "प्रवेश "

Wednesday, February 23, 2011

भाव बढ़ गया मेरा भी

भाव बढ़ गया मेरा भी

मत मांगते थे ,
मेरी गली से गुजरते थे ,
पर मेरे घर के आगे,
कभी नहीं ठहरते थे |

वो जानते थे मतदाता 
सूची में नहीं नाम मेरा ,
क्यों नमन मुझको करें ,
क्यों करें कोई काम मेरा |

जब मिलते तो ऐसे मिलते ,
जैसे जानते नहीं कौन हूँ मैं ,
बीच जयकारा के उनके ,
क्यों अकेला मौन हूँ मैं !

संशोधित हुई सारणी ,
नाम चढ़ गया मेरा भी ,
मैं रहा तो वही "प्रवेश",
पर भाव बढ़ गया मेरा भी  |
                                               "प्रवेश" 

Tuesday, February 22, 2011

गुजारिश

गुजारिश 


जो हमने किया वो गजब तो नहीं ,
खतावार हैं बेअदब तो नहीं |

होंगे तेरे चाहने वाले लाखों ,
मगर हम जैसे वो सब तो नहीं |

झुंझला गई मेरी गुस्ताखी से ,
इंसां हैं दोनों , रब तो नहीं |

गुजारिश है माफ़ी की तुझसे खता की ,
तुझे कोई शिकवा अब तो नहीं |
        
गुजारिश मंजूर       
शिकवा भी तुमसे तुम ही से गिला है ,
ये दर्द -ए - जिगर भी तुम ही से मिला है |

तरफदार हैं हम तुम्हारी खता के ,
अपनी तरफ भी यही सिलसिला है |

बंद पलकों में भी खयाल आपका है,
खुली आँखों में ख्वाबों का काफिला है |

समझ पाओ न अब भी जज्बात मेरे ,
तो समझो आपका कोई पेंच हिला है |
                               "प्रवेश"

Friday, February 18, 2011

तारीफ उनकी

तारीफ उनकी 

उनकी इस शिकायत को 
दूर करना चाहता हूँ ,
"तारीफ नहीं करते आप"
तारीफ करना चाहता हूँ |

आज ठाना है शिकायत 
दूर कर दूंगा सभी ,
महबूब फिर कोई शिकायत 
कर न पायेगा कभी |

कुछ कहूं , तो क्या कहूं ?
झूठ कह सकता नहीं ,
सच कहूं , महबूब मेरा 
सच को सह सकता नहीं |

धर्मसंकट आ पड़ा है ,
वर्ज्य हैं दोनों सत्य - असत्य ,
झूठ कहूं तो पाप लगे ,
महबूब खफा हो बोल के सत्य |

कोई मदद करो मेरी ,
कोई सुझाव उपयुक्त दो ,
धर्मसंकट में फंसा ,
ये मित्र आपका मुक्त हो |
                                          "प्रवेश"

Thursday, February 17, 2011

राजनीति से दूर नेता

राजनीति से दूर नेता

नेता जी के मुख से छूटा
जो विवादास्पद बयान ,
कोई दोष नहीं उनका 
रपट जाती है जबान |

क्या हुआ कुछ बोल दिया ,
क्यों आप हैं इतने परेशान ?
मत तूल दो इन बातों को इतना ,
आखिर ये  भी हैं इंसान |

इनकी  भी ख्वाहिश है ,
ये  भी नेता बनें महान ,
अच्छा बोलने की कोशिश में ,
कभी फिसल जाती है जबान |

ये  वो नहीं जो सत्ता में ,
पद के मद में मगरूर हैं ,
गुड़ से मक्खी की तरह ,
नेता जी  राजनीति से दूर हैं |
                                                              " प्रवेश "

Thursday, February 10, 2011

गधों को हांके कौन ?



ये जो चने का खेत है,
इसके हैं मालिक पचास |
चने के पौंधे छोटे हैं , 
पौंधों से बड़ी हो गयी घास |

एक का हो , तो खैर खबर ले ,
किसकी पचास में जिम्मेदारी ?
कौन भला ये घास उखाड़े ,
कौन करे अब घेरा - बाड़ी ?

गधे घुस गए बेधड़क ,
साफ़ कर गए पूरा खेत |
घास बची न चने बचे ,
बची रह गयी सूखी रेत |

निकम्मे मालिक हों पचास ,
तो उस खेत में झांके कौन ?
कौन करे रखवाली इसकी ,
इन गधों को हांके कौन ?

चने का खेत = प्रजातंत्र 
चने के पौंधे = जनता
मालिक = नेता  
घास = अराजक तत्व 
गधे = भ्रष्ट नेता 

                                                      "प्रवेश "

Wednesday, February 2, 2011

बुक बनाम फेसबुक



फेसबुक की लत से ग्रस्त  छात्र की व्यथा |


जब से मैं फेसबुक पर आया ,
बुक से फेस कभी मिल नहीं पाया |

लगीं कोर्स में कितनी किताबें ,
भूल गया फेसबुक पर आके |

नाम पता नहीं मास्टर जी का,
बिन फेसबुक दिन लगे है फीका |

फेसबुक खा गया बुक की गरिमा ,
ऐसी है फेसबुक की महिमा |

                                                                          "प्रवेश"

Thursday, January 27, 2011

पतझड़

पतझड़

ढीली पड़ना पत्ती पर
टहनी की पकड़ का ,
है संकेत आगमन का
पतझड़ का |

ऐसी कोई वजह न थी,
पत्ती टहनी को छोड़ सके
तेज हवा के झोंके भी ,
मजबूत पकड़ न तोड़ सके |

पत्ती का टहनी से बिछोड
वक़्त है इसका जिम्मेदार,
कौन बच सका है भला
जब वक़्त ने किया जमकर वार |

आपस में टकराने से ही
हो गए पत्ते टहनी से दूर,
कमजोर पकड़ और टकराना,
फिर टूटना... दुनिया का दस्तूर |
                                                                         प्रवेश

Tuesday, January 25, 2011

विशेष भारत

विशेष भारत 

मेरे भारत का ही गुणगान करे  सारा जहाँ,
सिवा इसके वो चैन और वो आराम कहाँ!

हर तरफ शांति और शांति बस शांति रहे,
सारी दुनिया को मिले ऐसा ही पैगाम यहाँ |
मेरे भारत ......................... आराम कहाँ !

हर धर्म और हर मजहब की क़द्र करते हैं ,
हर इंसान को मिले प्यार और सम्मान यहाँ |
 मेरे भारत ......................... आराम कहाँ !

मिलजुल के करें काम यहाँ लोग सभी ,
नामुमकिन नहीं प्यारे कोई भी काम यहाँ |
मेरे भारत ......................... आराम कहाँ !

हर सीने में है फौलाद ही फौलाद भरा ,
दुश्मन की हर एक चाल हो नाकाम यहाँ |
मेरे भारत ......................... आराम कहाँ !
                                                                    प्रवेश

Thursday, January 20, 2011

जब से होश संभाला यारो

जब से होश संभाला यारो

जब से होश संभाला यारो ,
बस यही देखा भाला यारो |
सच्चे को दबते देखा और 
झूठे का बोलबाला यारो |
मक्कारी को फलते देखा ,
मेहनत का दिवाला यारो |
दिन में अँधियारा देखा और ,
दीपक तले उजाला यारो |
कुत्ता खाये बिस्कुट, आदमी 
तरसे देख निवाला यारो |
घर - घर संसद बनती देखी ,
नेता हर घर वाला यारो |
गोदाम में राशन सड़ते देखा ,
राशन की दुकान पे ताला यारो |
कंकड़ पत्थर दाल में देखा ,
लीद मिला मसाला यारो |
जब से होश संभाला यारो ,
बस यही देखा भाला यारो |
                                                              प्रवेश 

Wednesday, January 19, 2011

महंगाई

महंगाई 


फैली महंगाई 
रक्तबीज सी,
बढ़ गई कीमत
हर एक चीज की |

देखो हालत 
पशोपेश की,
क्या दशा 
हो गई देश की ?

जिसको देखो 
परेशान लगे,
बाप, बेटे का 
मेहमान लगे |

ऐसे बनें 
अस्पताल,
करें दूर 
ये बीमारी गन्दी |

ऐसी सुविधाएँ 
हों मुहाल,
हो महंगाई की
नसबंदी |
                                          प्रवेश 

Friday, January 14, 2011

सोचो ! अगर गोल न होता ?

गोल

सूरज सदा उगा रह जाता,
चाँद कभी वापस न आता,
सोचो ! अगर गोल न होता ?
 
एक कभी दस बन नहीं पाता,
एक में भला क्या -क्या आता?

तबला न होता, ताल न होती,
बन्दूक में भी नाल न होती,

पानी के लिए नल न होता,
और हर घर में जल न होता,

स्पेन फुटबौल में हार ही जाता,
इंग्लैंड हौकी में पार न पाता,

सड़क न होती, पटरी न होती,
बरसात के लिए छतरी न होती,

खाने को न थाली होती,
होती भी तो खाली होती,

तब कोई विमान न होता,
गाड़ी का अभिमान न होता,

न तो सिगरेट, बीडी होती,
फ्लौपी और न सीडी होती,

घडी की घूमती सुई न होती,
शाम से सुबह हुई न होती,

टीवी की केबल न होती,
टेनिस की टेबल न होती,

क्रिकेट, वोलीबाल न होता,
फिक्सिंग का  बवाल न होता,

बिना आँख के किसको दिखता?
बिना कलम के मैं क्या लिखता?

सारा जग वीरान होता,
आज कहाँ इंसान होता?
सोचो ! अगर गोल न होता ?
                  
                                                                                                                           प्रवेश

Friday, January 7, 2011

नैनो का संदेशा


नैनो  का संदेशा

मियां - बीवी
बच्चे दो ,
केवल अब
हर घर में हो |
रुपये रोड़ा
न अटकाए ,
सस्ती सुलभ
यात्रा पाए |
महंगाई और
जन विस्फोट ,
भविष्य का
अंदेशा है |
सीमित और
खुशहाल परिवार,
नैनो  का संदेशा है |
                                                                प्रवेश