मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Wednesday, January 2, 2013

जून में जनवरी की फरियाद करता है ।

जून में जनवरी की फरियाद करता है ।
वही शख्स जनवरी में जून को याद करता है ।।

ठिठुरता है कम्बल , ठिठुरती है रजाई भी ।
अंगीठी काँपती है , लकड़ियाँ बरबाद करता है ।।

कुहरा वहम में डाले है , महताब  के आफ़ताब !
सूरज को नमन भी दोपहर के बाद करता है ।।

कुछ निकल पड़े हैं काँपती देह को लेकर ।
पापी पेट है , हर मौसम से दो - दो हाथ करता है ।।

बड़े पैंसे वाले हैं, उन्हें सर्दी नहीं लगती ।
कहते हैं जमाना बेवजह बकवास करता है ।।

                                                    " प्रवेश "

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