मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Tuesday, July 5, 2011

विलुप्ति के कगार पर

विलुप्ति के कगार पर 

किसी को खुशियाँ दे जाता ,
किसी को गम दे जाता था |
उसके आने की राह में हर कोई ,
पलक - पांवड़े बिछाता था |

कोई खिड़की , चौबारे से ,
कोई देखती उसे झरोखे से |
कोई मन मसोसकर रह जाती ,
उसके आने के धोखे से |

खाट पर बैठे बूढ़े बाबा ,
हुक्का गुडगुडाते थे |
उसके आने की खबर से ,
नंगे पाँव , दौड़कर आते थे |

गिल्ली - डंडा , दौड़ , कबड्डी ,
बच्चे छोड़ चले आते |
प्रश्नों की बौछार होती ,
फिर खेलने लग जाते |

चमड़े का थैला लटकाये ,
हर घर तक वो जाता था |
चिट्ठी , धनादेश , तार की 
ऊंची आवाज लगाता था |

तकनीक का ग्रहण लगा ,
पाती , धनादेश , तार पर |
आज यह प्रजाति खड़ी है ,
विलुप्ति के कगार पर |



                                       "प्रवेश " 

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