मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Thursday, December 16, 2010

भरोसे का आदमी

भरोसे का आदमी 
कभी राह चलते 
बन जाते हैं रिश्ते 
कभी रिश्ते निभाते 
 जुदा हो जाती हैं राहें 
कभी हमराह 
बन जाते हैं हमदर्द 
कभी हमदर्द भी 
बेगाने हो जाते हैं 
निभाते हैं साथ 
कुछ आखिरी दम तक 
कुछ दम तोड़ देते हैं 
बीच राह में 
खैर ! इस दुनिया में 
लोगो का 
मिलना बिछड़ना 
है लाजमी 
इस मेल और 
बिछोड में 
आसां नहीं मिलना 
भरोसे का आदमी |
                                       प्रवेश 

1 comment:

  1. Good One parvesh Babu.. kya baat hai jo bhi likhte ho ek dum sach likhte ho.

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