तुमने बाँचा है मुझे मुझसे अलग होने पर , कभी मुझे मुझमें ही नहीं पढ़ पाये हो , तुमने इंतजार किया है मेरे छपने का लिखे जाने का , पढ़े - लिखे हो लिखा पढ़ सकते हो वो भी उसी भाषा में जो तुमने पढ़ी है पढ़ने के लिये | मेरी माँ पढ़ लेती है मुझे टेलीफोन पर ही , मेरा मौन भी सही - सही उच्चरित कर लेती है , साक्षरों में शामिल नहीं है फिर भी, लिखा जो नहीं पढ़ पाती | ~ प्रवेश ~
अरी ओ धूप ! इतनी कड़ाके की ठंड से तुझमें अकड़ क्यों नहीं आती ? तू सीधी ही पड़ रही है आज भी जेठ की तरह | थोड़ा बांकपन ला थोड़ी सी टेढ़ी हो जा और मुड़कर पहुँच जा मेरे द़फ्तर के खोमचे में | मैं इतना ताम - झाम लेकर बाहर नहीं बैठ सकता | ~प्रवेश ~
रात में
मैं सड़क पर चल रहा हूँ |
रास्ता दिखाने के लिये
नियत दूरी पर
पीली रोशनी उगलते
बिजली के खम्भे गड़े हैं |
रोशनी के पास
और रोशनी से दूर
जाता हुआ हर कदम
मेरा कद बदल रहा है |
परछाई एक मिथ्या है
एक भ्रम है
और प्रतीक है अज्ञान का,
जो बढ़ती जाती है
प्रकाश पुंज से दूर होने पर
और समाप्त हो जाती है
अगले खम्भे के नीचे |
आप परछाई मिटाने के लिये
बिजली गुल करने का
सुझाव भी दे सकते हैं |
आप तो आप हैं |
मैं दूरी समाप्त करना चाहूँगा
बिजली के खंभों के बीच की | ~ प्रवेश ~
और व्रत तोड़ दे | पति लौटा है बदहवाश नशे में धुत्त पार्टी मनाकर अपने लफंडर दोस्तों के साथ और लात - घूँसों से तोड़ दिया है व्रत, करवाचौथ का व्रत | ~प्रवेश ~
ऑफिस जाना
काम करना
घर लौटना
बाजार जाना
राशन लाना
सब्जी लाना
फिर घर जाकर
पानी भरना
दूध लाना
खाना बनाना
किताबें भी पढता हूँ मैं
खाना खाना
और सो जाना
दुनियाभर के और भी
कई काम हैं मुझे
तुझे याद करने के सिवाय ,
इसलिये
अब तुझे
भूलना ही छोड़ दिया ।
" प्रवेश "