Monday, July 30, 2012

स्कूलों की भरमार


स्कूलों की भरमार

मेरे शहर में स्कूलों की भरमार है ।

पनवाड़ी की दुकान सी 

दो इस गली में , दो उस गली में 

एक सड़क के इस पार है 

एक सड़क के उस पार है ।

अजी गजब हो गया 

स्कूलों की भरमार है ।

शायद आपके शहर में भी हो ।

बारहवीं पास करो 

और मास्टर बन जाओ 

मगर नौकरी की  एक शर्त है 

घर - घर जाओ 

बच्चे लाओ ।

एडमिशन कराओ 

और नौकरी पर आ जाओ ।

जून की छुट्टियों में 

फेरीवालों की तरह घूमते हैं 

अपने स्कूल की खूबियाँ बताते हैं 

जैसे अचार बेचने वाला 

खूबियाँ बताता है 

अलग - अलग तरह के अचार की

अलग - अलग खूबियाँ  ।

ऑफर दिये जाते हैं 

आम के अचार के साथ 

करोंदे का अचार मुफ्त ,

दो बच्चों को भेजेंगे तो 

एक की आधी फीस लगेगी ।

अब आप ही बताइये 

ऑफर ठुकराये थोड़े ही जाते हैं ।          "प्रवेश "

                                     

Saturday, July 21, 2012

नौकरी की तलाश

नौकरी की तलाश

डिग्रियां हैं बड़ी - बड़ी, काबिलियत भी पास है ।
कमी नहीं किसी चीज की, एक नौकरी की तलाश है ।।

थक गया विज्ञापन पढ़ , साक्षात्कार दे थक गया ।
माँ फिर भी हिम्मत बँधाती है, जिन्दा उसी से आस है ।।

ईमान गर गिरवी रखूँ , तो पद कई खाली पड़े ।
बेईमान एक चलती हुई , इज्जतदार लाश है ।।

रोटी बनानी आती है , मक्खन लगाना नहीं आता ।
मक्खन लगाना जिन्हें आता , जिंदगी उनकी झकास है ।।

                                                                             "प्रवेश "

Wednesday, July 18, 2012

किरायेदार हैं


किरायेदार हैं


कौन आया है सदा रहने को यहाँ 

किरायेदार हैं , एक दिन चले जायेंगे ।


न लाये थे कुछ , न ले जायेंगे कुछ 

जब जायेंगे तो हाथ मले जायेंगे ।


बुरे भी नहीं रहेंगे सदा 

बुरे जायेंगे और भले जायेंगे ।


जायेंगे बुरे तो हँसेगी दुनिया 

भलों के पीछे काफिले जायेंगे ।


भले काम ही याद रखती है दुनिया 

बुरे काम पैरों तले जायेंगे ।


इंसानियत को जो करते हैं रौशन 

वो चराग आँधियों में जले जायेंगे ।


                                "  प्रवेश "


Monday, July 16, 2012

निशानेबाज

निशानेबाज 


बड़े कमाल के निशानेबाज हो 
एक ही बार में मार गिराया
चूजों से वादा करके आये पंछी को ।

तुम्हें भूख नजर आती है
केवल अपने बच्चों की ।

एक वक़्त के खाने के लिये 
तुमने एक ही पंछी नहीं मारा,
अनजाने ही सही
तुमने एक परिवार तबाह कर डाला ।

दम तोड़ देंगे एक - एक कर
माँ की बाट जोहते सभी चूजे ।

तुम नहीं देख सकते हो
भूख से बिलखते बच्चे ।

बहुत प्यार है तुम्हें बच्चों से ,
केवल अपने बच्चों से ।


                             "प्रवेश"


Friday, July 6, 2012

हाय पसीना

हाय पसीना

हाय पसीना - हाय पसीना ,
गर्मी में मुश्किल हुआ जीना ।
हाय पसीना - हाय पसीना।

कूलर के आगे भी पसीना
पंखे के नीचे भी पसीना
ए. सी. की तैसी हो जाये
बिन साबुन  नहलाय पसीना ।
हाय पसीना - हाय पसीना।

बिजली के जाने से पसीना
बिजली के आने से पसीना
पेड़ के नीचे खुली हवा में
तर - तर - तर - तर आय पसीना ।
हाय पसीना - हाय पसीना।

मानसून जी जल्दी आओ
बरखा रानी को संग लाओ
तुम आओगे तो शायद ही
कुछ दिन छुट्टी जाय पसीना।
हाय पसीना - हाय पसीना


                                       "प्रवेश "

Tuesday, July 3, 2012

छपना चाहते हो !

छपना चाहते हो !

अगर लिखते हो तुम
और छपना जरुरी है ,
तो याद रखो
पहले तपना जरुरी है ।

निश्चय कर लो
कहाँ छपना चाहते हो
कागज़ पर
या दिलों पर !

जहाँ भी छपना चाहो
शर्त एक ही है
जब तपोगे
तब ही छपोगे ।

जो तप गये
वो छप गये
जो तपे नहीं
वही छपे नहीं ।

जब तप जायेगी कलम 
और तुम भी तप जाओगे
तो दोनों जगह
खुद -ब - खुद छप जाओगे ।

                               "प्रवेश "

Friday, June 15, 2012

जिंदगी हूँ


जिंदगी हूँ

जिंदगी हूँ , जिंदगी को क्या लिखोगे !
कभी साहिल कभी समंदर गहरा लिखोगे ।


हार जाओगे तो काली रात शायद, 
जीत जाओगे नया सहरा लिखोगे ।


तुम्हारी मर्जी से गर चलने लगूँ तो 
नई धूप का मुझको कोई  कतरा लिखोगे ।


मुआहिदा करना पड़े मुझसे अगर तो 
दुश्मन -ए -  रौशनी कुहरा लिखोगे ।


बदलते हो रोज मेरे मायने तुम 
आज कुछ , जाने कल क्या - क्या लिखोगे ।


                                                      प्रवेश 

Wednesday, June 13, 2012

नशामुक्त परिवार

नशामुक्त परिवार 

बिगड़े हालातों में कहीं सुधार ढूँढने निकला हूँ ।
मैं गाँव में एक नशामुक्त परिवार ढूँढने निकला हूँ ।।

करे परहेज , ना दे और ना ही ले दहेज़
लड़े बुराई से , ऐसा एक यार ढूँढने निकला हूँ ।

मेरे घर ना माँगे , अपने घर ना पूछे शराब
हो अगर कोई, मैं ऐसा रिश्तेदार ढूँढने निकला हूँ ।

बेख़बर पड़ोसी रहते हैं , प्रेमभाव गायब सा है 
नफरत से सजी दुकानों में, मैं प्यार ढूँढने निकला हूँ ।

है दूर बहुत साहिल मगर , हौंसला भी मैं हारा नहीं
मँझधार में डगमग कश्ती की पतवार ढूँढने निकला हूँ ।

पहले भी मैं ढूँढा किया , जाने तलाश कब ख़त्म हो
इन छोटी - छोटी चीजों को हर बार ढूँढने निकला हूँ ।
मैं गाँव में एक नशामुक्त परिवार ढूँढने निकला हूँ ।


                                                               प्रवेश




Friday, May 4, 2012

रोटी के जुगाड़ में


रोटी के जुगाड़ में 


मिट्टी जो कभी आई थी , बहकर के बाढ़ में ,

सौदा उसी का तय हुआ , रोटी के जुगाड़ में ।


पुरखों ने अपनी जान से ज्यादा जिसे चाहा ,

कौड़ियों के भाव बिक गयी , बेबसी की आड़ में ।


ख्वाब तो मेरे भी थे , शीशे के महल के ,

अब झोंपड़ी जर्जर पड़ी , निरे उजाड़ में ।


सोचता हूँ चुनाव लड़कर , घोटाला बड़ा करूँ ,

फिर ऐश से बसर हो , बैठे तिहाड़ में ।



                                         प्रवेश