जिसे ऐतराज था
कि उसे दीपावली पर न कहा जाय
हैप्पी दिवाली,
जो सुनना चाहता था
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ ,
आज मिला तो बोला
आजकल बच्चे
उसे गुड मॉर्निंग विश नहीं करते। ~ प्रवेश ~
वर्तमान परिस्थितियों से सम्बंधित रचनाएँ
जिसे ऐतराज था
कि उसे दीपावली पर न कहा जाय
हैप्पी दिवाली,
जो सुनना चाहता था
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ ,
आज मिला तो बोला
आजकल बच्चे
उसे गुड मॉर्निंग विश नहीं करते। ~ प्रवेश ~
हे मानव ! मैं हूँ प्रकृति
तू भूल गया मेरी प्रवृत्ति
तुझे कुछ याद दिला दूँ मैं
तेरा स्थान बता दूँ मैं।
तू पर्वत - जंगल काट - काट
बनाने चला सड़कें सपाट
नदी के मुहाने मोड़ चला
तू स्वयं विनाश की ओर चला।
कर दी पारिस्थितिकी छिन्न - भिन्न
तू ही उत्तम, सब और निम्न !
तेरी स्वार्थ-नीति सर्वत्र बही
आखिर ! कितना सहेगी मही !!
तूने बहुविधि बहु पाठ पढ़े
समतल में ऊँचे भवन गढ़े
खेतों में सघन नगर उपजे
बरसें तो मेघ किधर बरसें ?
तू आगे बढ़ किन्तु ये स्मरण रहे
जिस क्षण तक रवि में किरण रहे
मैं पलटवार कर सकती हूँ
पुनः निज स्वरूप धर सकती हूँ।
जहाँ जंगल थे, जंगल फिर होंगे
न रुका, अमंगल फिर होंगे
जहाँ बहती थी नदी, बहेगी वहीं
तेरी दासी नहीं रहेगी मही। ~ प्रवेश ~
बड़े आए हैं
मदर्स डे वाले
तुझे फुरसत न हो
तो कोई बात नहीं
जब वो करे तो
उसका फोन उठा ले
तू पैंसे भेजकर
फर्ज़ अदा समझता है
कभी पूछ ले- माँ
कैसे हैं पाँव के छाले
तुझे छुट्टी नहीं मिलती
कि तू उसके पास जाकर रह
अपने घर में जगह बना
उसे पास बुला ले
बड़े आए हैं
मदर्स डे वाले
~प्रवेश~
तब
जबकि डॉक्टर भी दे चुके हों जवाब
और तुमने होश न खोया हो,
खुद से करना एक सवाल
कि यदि डॉक्टर बदल दे जवाब
तो तुम खुद को कितना बदलोगे !!
~ प्रवेश ~
हर माता - पिता चाहते हैं
उनकी संतान आगे निकले
हर दौड़ में उनसे,
सिवाय एक दौड़ के
दुनिया छोड़ने की दौड़ !! ~ प्रवेश ~
धर यमराज भेष, फैली है देस - बिदेस, कोरोना के रूप में मुसीबत बड़ी आयी है।
विषम समय - काल, थमी है जीवन की चाल, आज मानवता की परीक्षा की घड़ी आयी है।
आत्मनियंत्रण - संयम - सावधानी को परखने मनुज पे दुःखों की झड़ी आयी है।
जैसे बीता अच्छा कल, बीत जायेगा ये पल, मानव जाति कई विपदाओं से लड़ी आयी है।
जंगलों को काट के शहर बसाने के बाद, प्राणवायु के लिए तरसता है आदमी।
त्याग दिये गाँव, त्यागी पीपल की छाँव, किवाड़ बंद घरों में अब बसता है आदमी।
वाणी से विषधर बन, उठा के जहरीला फ़न, आदमी को आदमी संग डँसता है आदमी।
घूमे पगलाया सा, बौराया मारा - मारा फिरे, लाशों के अम्बार पर हँसता है आदमी।
जाग रे मनुज जाग, फिर से जगेंगे भाग, रख अपने आस - पास प्रकृति को संवार कर।
करता है जितना तू निज संतति से नेह, पेड़ - पौंधों से भी प्यारे उतना ही प्यार कर।
जितना कमाया यहाँ, उतना चुकाना भी है, लालच में पड़कर न साँसों का व्यापार कर।
अब भी समय है, तू चाहे तो संभल जा, या चुपचाप अपनी बारी का इंतजार कर। ~ प्रवेश ~