मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, October 5, 2012

तुम आये

तुम आये

कोई करिश्मा मेरे हमसफ़र हो गया ।
तुम आये, मकान मेरा घर हो गया ।।

खामोश हो गया है चीखता सन्नाटा ।
उसे तुम्हारी मौजूदगी  का डर हो गया ।।

तन्हां रहती थीं महफ़िलें तुम बिन ।
खुशनुमा  फिर से दर - ब - दर हो गया ।।

बुत भी करने लगे हैं गुफ्तगू सी ।
जाने ऐसा क्या असर हो गया ।।

हांसिये पर आ गया दौर - ए - गुमनामी ।
मेरी पहचान का सारा शहर हो गया ।।

                                                           "प्रवेश "

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