मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, September 14, 2012

रोने लगी हिंदी

रोने लगी हिंदी 

जागने लगे लोग , सोने लगी हिंदी ।
अंग्रेजी के जंगल में खोने लगी हिंदी ।।

अद्यतन दिखने की होड़ मचने लगी जब से ।
अपने घर में परायी होने लगी हिंदी ।।

हिंदी नहीं जानते तो नाक ऊँची होती है ।
जाने किस जनम का पाप ढ़ोने लगी हिंदी ।।

कभी माँ का दर्जा था , इज्जत से पूजी जाती थी ।
अब शराबी की लुगाई सी रोने लगी हिंदी ।।

सितम्बर आया तो मिली बिछड़े हुये अपनों से ।
फिर से हसींन सपने संजोने लगी हिंदी ।।

दादी के जन्मदिन सा हिंदी दिवस आया ।
जज्बातों के बवंडर में खोने लगी हिंदी ।।

अपने घर में परायी होने लगी हिंदी ।
अंग्रेजी के जंगल में खोने लगी हिंदी ।।
                                                                  "प्रवेश "

3 comments:

  1. हिन्दीदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!
    आपका इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (15-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. आभार मान्यवर शास्त्री जी..आपको भी हिंदी दिवस की हार्दिक बधाइयाँ |

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  3. मित्र अच्छा प्रयास .......सुन्दर ,बधाईयाँ जी .....

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