मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, September 9, 2011

मौसम का मिजाज !


मौसम का मिजाज !

कभी देखा है बदलते हुये मौसम का मिजाज !

नहीं अगर , तो कभी मेरे शहर में आइये |



इस तरह शाम ढले लुढ़कते हैं लोग ,

जैसे टेबल के कोने पे रखा , हिल जाये गिलास |



रोज ही लोग हलाल होते हैं बकरों की तरह ,

कौन रखता है भला इतनी लाशों का हिसाब |



बेआबरू होती हैं बेटियाँ , केले की तरह ,

जिस्म बिकते हैं सरेआम , कौड़ियों के हिसाब |


कभी देखा है बदलते हुये मौसमका मिजाज !!

                                                              "प्रवेश "

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