मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Monday, July 18, 2011

नाम - बदनाम

नाम - बदनाम 

रेत के घर की तरह 
अभिमान भी ढह जाना है |
बुरा हो या भला 
बस नाम ही रह जाना है |

सौ बरस जी कर भी गर 
किसी को ख़ुशी न दे पाइये |
तब बोझ बनकर ही जिये ,
साँस रोकिये , मर जाइये |

दो घडी ही जिंदगी में ,
काम आयें  किसी के |
वस्तुतः साकार होंगे ,
मायने जिंदगी के |

भला कर सकते नहीं तो ,
बुरा भी क्यों कीजिये |
सर्वांग होते हुये भी ,
अपंग समझ लीजिये |

नाम हों , गुमनाम हों ,
बदनाम होइये नहीं |
आने वाली पीढ़ी को 
गम में डुबोइए नहीं |

धूल - मिट्टी से बना तन ,
धूल में मिल जाना है |
यश और अपयश ही 
दुनिया में रह जाना है |

                                       "प्रवेश "

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