Wednesday, December 11, 2013

रेलगाड़ी का जनरल डिब्बा (भाग - 1 )

पूरी तरह विरामावस्था में
नहीं आयी है रेल
और शुरू हो गयी है
चढ़ने वालों की रेलमपेल |

जल्दी में नहीं हैं
उतरने वाले,
उन्हें खयाल है अपने पैरों का
प्रेम है अपने दाँतों से
चढ़ने वाले जोश में हैं
बेखबर हैं इन सब बातों से |

रुक गयी है रेल
रुक गया है जनरल कोच
इस कोच के दरवाजे पर
बड़ी अजीब है सोच |

चढ़ने - उतरने वालों का
हो गया है सामना
अन्दर जाकर सीट मिले
चढ़ने वालों की कामना |

भाई मेरे ! जब अन्दर वाली
भीड़ बाहर आ जायेगी
पाँव रखने लायक जगह तो
ख़ुद - ब - ख़ुद हो जायेगी |
                                         ~ प्रवेश ~

Wednesday, November 20, 2013

परछाई एक मिथ्या है

रात में
मैं सड़क पर चल रहा हूँ |
रास्ता दिखाने के लिये
नियत दूरी पर
पीली रोशनी उगलते
बिजली के खम्भे गड़े हैं |
रोशनी के पास
और रोशनी से दूर
जाता हुआ हर कदम
मेरा कद बदल रहा है |
परछाई एक मिथ्या है
एक भ्रम है
और प्रतीक है अज्ञान का,
जो बढ़ती जाती है
प्रकाश पुंज से दूर होने पर
और समाप्त हो जाती है
अगले खम्भे के नीचे |
आप परछाई मिटाने के लिये
बिजली गुल करने का
सुझाव भी दे सकते हैं |
आप तो आप हैं |
मैं दूरी समाप्त करना चाहूँगा
बिजली के खंभों के बीच की | ~ प्रवेश ~

Friday, November 1, 2013

कौन सा अंधियारा मिटा रहे हो ?

माटी के दीपक जलाये जा रहे हो |
कौन सा अंधियारा मिटा रहे हो ?
रात काली ही रहेगी हर अमावस |
एक भ्रम सदियों से पाले जा रहे हो |

मन के दीपों को भी रौशन कर चलो अब |
अपने भीतर के भी तम को हर चलो अब |
आत्मा की शुद्धि भी हो लक्ष्य जिसका
डगर पर आशा भरे डग भर चलो अब | ~ प्रवेश ~

Monday, October 21, 2013

करवाचौथ का व्रत

दिन भर की भूखी - प्यासी पत्नी

पति के इंतज़ार में

बाट जोहती 

कि कब आये

और व्रत तोड़ दे |

पति लौटा है बदहवाश


नशे में धुत्त 


पार्टी मनाकर


अपने लफंडर दोस्तों के साथ


और लात - घूँसों से


तोड़ दिया है व्रत,


करवाचौथ का व्रत | ~
प्रवेश ~

Friday, October 11, 2013

Friday, October 4, 2013

क्या बदल जायेगी सूरत बेवजह चीत्कार से ?
सूरत बदलनी है तो बदलो वोट के हथियार से ।।

बाहर निकालो आस्तीनों में छिपे जो अब तलक ।
साँप कभी पालतू बनते नहीं पुचकार से ॥

बिक जाते हो रंग - बिरंगे कागजों और पानी में ।
अनजान हो तकदीर के निर्माण के अधिकार से ॥

मैं किसी दल के किसी नेता का सम्बन्धी नहीं ।
जागरूक करना चाहता हूँ लेखनी की धार से ॥

फिर से फेंके जायेंगे टुकड़े लुभाने के लिये ।
अभी - अभी पता चला है आज के अखबार से ॥

रहनुमा जो भी चुनो , होशोहवास में चुनो ।
बहस करते हो बहुत मामूली दुकानदार से ॥ ~ प्रवेश ~ 

सिर तुम्हारा - अक्ल तुम्हारी

सिर  तुम्हारा
अक्ल तुम्हारी
मंदिर तुम्हारा  
भगवान तुम्हारा 
मस्जिद तुम्हारी 
खुदा तुम्हारा
मगर अफ़सोस !!!
फिर भी सब कुछ 
माइक - माला वालों के पास 
गिरवी रखे बैठे हो ।  ~ प्रवेश ~ 

Monday, September 2, 2013

स्वतंत्र मतदाता

कौन बनेगा प्रधानमंत्री !
मुझे फर्क नहीं पड़ता |
राजनीति विश्लेषकों के
कभी तर्क नहीं पढ़ता |

किसी भी दल का नेता आये
लेकर हाथ में पर्चा |
बड़े गौर से सुनता हूँ
अपने उत्थान की चर्चा |

हर दल की रैली में
खूब लगाता नारे |
बुरा नहीं कहता हूँ किसी को
एक से दल हैं सारे |

कोई कम्बल, कोई बैसाखी
कोई बाँटे रजाई |
कोई आँखों का शिविर लगाये
मुफ्त मिले दवाई |

कोई पव्वा, कोई बोतल
कोई बाँटे नोट |
जिसका तोहफा सबसे महँगा
उसी का मेरा वोट |

नियत समय पर सदा
मतदान केंद्र पहुँच जाता हूँ |
प्रधानमंत्री चुनने वाला
मैं स्वतंत्र मतदाता हूँ | ~ प्रवेश ~

Saturday, August 31, 2013

और भी कई काम हैं मुझे

ऑफिस जाना
काम करना
घर लौटना
बाजार जाना
राशन लाना
सब्जी लाना
फिर घर जाकर
पानी भरना
दूध लाना
खाना बनाना
किताबें भी पढता हूँ मैं
खाना खाना
और सो जाना
दुनियाभर के और भी
कई काम हैं मुझे
तुझे याद करने के सिवाय ,
इसलिये
अब तुझे
भूलना ही छोड़ दिया ।
                     " प्रवेश "

Saturday, August 24, 2013

बेशक रहो शालीन, पर हुंकार भी रखो ।
लबों पर हँसी , कमर में कटार भी रखो ॥

इंसान हो तो प्यार से पुचकारना भला ।
हैवान हो तो जेहन में दुत्कार भी रखो ॥

बनना - सँवरना , रूप पर इतराना कब तलक ।
कोमलता रखो पर चेहरा रौबदार भी रखो ॥

अंजाम जो भी हो, अस्मत से बड़ा नहीं ।
अब तो लड़ाई आर की या पार की रखो ॥ ~ प्रवेश ~




Friday, August 16, 2013

भीमिया की लुगाई

आजाद है भीमिया की लुगाई
उसे आजादी है
अपने घर में खुलकर हँसने की
अपना मुखड़ा दिखाने की
घुटनों तक घूंघट नहीं करना उसे |

उसे आजादी है
भीमिया को गलत बात पर टोकने की
नसीहत देने की
अपनी राय रखने की,
वो बस भीमिया की लुगाई नहीं
खुद का अस्तित्व रखने वाली
एक औरत भी है |

उसे आजादी है
रास्ता पूछने वाले को रास्ता बताने की
चाहे वो मर्द हो या औरत
उस पर बंदिश नहीं है
अजनबी से बात करने की |

वो खुश है अपनी आजादी से
उसे फख्र है
भीमिया की लुगाई होने पर,
मजदूर है भीमिया
और अनपढ़ भी || " प्रवेश "

Monday, August 12, 2013

क्यों इस तरह से बवाल कीजिये

क्यों इस तरह से बवाल कीजिये 
अब खुद ही अपनी कोई ढाल कीजिये ।

बेटे तो  तुम्हारे पालने तक ही थे 
अम्मा ! अब खुद अपनी देखभाल कीजिये । 

आता नहीं अगर कोई जवाब उधर से 
तो फिर क्यों सवाल पे सवाल कीजिये !

इससे पहले कि जंग खा जाये
तलवार का सही इस्तेमाल कीजिये । 

हौंसला न कीजिये जवानी की तरह 
तनिक उमर का भी तो खयाल कीजिये । 
                                             " प्रवेश "