मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, November 30, 2012

पेट की आग

पेट की आग 
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खाली पेट
किसी चिता से कम नहीं ।
इस चिता से निकली लपटें
झुलसा देती हैं ह्रदय  को ,
और
काला  धुआँ
सीधा पहुँचता है
मस्तिष्क में ।
भावनाएँ मर जाती हैं
ह्रदय झुलसने से ,
मस्तिष्क बंद कर देता है
सोचने का काम ।
फिर
सर्पिणी निगल जाती है
अपने ही बच्चों को ,
शेर घास खाने लगता है,
गाय बीनने लगती है
कचरे के ढेर से
प्लास्टिक की थैलियाँ
और
इन्सान उठा लेता है
कटोरा या हथियार ।
आखिर
शांत करना होता है
हर चिता को
और
पेट की आग को भी
बुझाना जरूरी है ।
                             " प्रवेश "

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