मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Monday, November 28, 2011

गर्व या ग्लानि !


गर्व या ग्लानि !


ये ईंट

जिस पर दिया जलाकर 

दबा दी गयी है , 

जमीन की सतह से 

दो गज नीचे ,

जिस पर बनना है 

तुम्हारे सपनों का महल |


इसे ग्लानि हो 

इस बात की 

कि जब चर्चा हो 

आपके आशियाने की,

और इसकी खूबसूरती की ,

इसकी बनावट की ,

तब इसका

कोई जिक्र न होगा ,

इसके बलिदान को 

कोई याद नहीं करेगा |


या 

गर्व महसूस करे 

कि कल

जो आलीशान इमारत 

तैंयार होगी इसकी पीठ पर,

जिसकी सुन्दरता की कहानी 

इतिहास रचेगी ,

उसके चिरंजीवी होने का 

श्रेय इसी ईंट को मिलेगा |

                                    "प्रवेश "

1 comment:

  1. कहीं पर गर्भ और कहीं पर ग्लानि दोनों का समिश्रण है ..!

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