मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Wednesday, June 15, 2011

भौत कुछ बदली गो |

भौत कुछ बदली गो 

भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |

टीने कि छत तोड़ी बे 
इस्कूलम लेन्टर है गो ,
दस तकौक इस्कूल 
आब इंटर है गो |
ननूं कें दिक्कत नि छौ
आब इस्कूल जाण में ,
भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |

बट घटूंक पाणि 
आब भ्यार है गो ,
दूर आब यूँ बटुक 
कच्यार है गो |
सीमेंटक बट बणे हाली  
खड़ंज उखाड़ बे ,
भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |

बिन पियै डंगरी  
आसन में नि जान ,
दी पैग लगाई बिना 
आंग द्य्यप्त ले नि आन |
जाणी क्या - क्या बकि दिनी 
अखाण बखाण में ,
भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |

टी. वी. देखी बिना 
टैम पासै नि हुन ,
बिन टी. वी. देखियै 
भैंस दूध ले नि दयून |
ना जुमुई, ना भीमू ,
आब पघरूंछ टी. वी. लगाण में 
भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |

आठ बोरी ग्यौनूं जगम 
चारै हनी ,
कुछ बानर , कुछ सुंगर 
कुछ छुटी गोर खानी |
के मेहनत ले कम है गे 
और पाणि ले नि छौ गाण में 
भौत कुछ बदली गो 
दाज्यू म्यर पहाड़ में |


                                    "प्रवेश"





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