Tuesday, February 3, 2015

अख़बार पढ़ रहा हूँ

एक लड़के का स्टाइल लड़की को भा रहा है
लड़का खास किस्म का पान मसाला खा रहा है ।
थोड़ी आगे जाकर राशिफल लिखा है
दोस्तों के हाथों मेरा क़त्ल लिखा है ।
बड़ा सा विज्ञापन है, बाल लम्बे - लम्बे हैं
देखने वालों को खूब ही अचम्भे हैं ।
वैवाहिकी में छपे डेढ़ सौ कुँआरे हैं
सर्वगुण सम्पन्न सारे  के सारे हैं ।
मौत सबको आती है, हल्की सी दस्तक है
आज आठ लोगों की तीये की बैठक है ।
एक चित्र केशी है, एक चित्र टकला  है
तेल बहुत सस्ता है, कुछ न कुछ तो घपला है ।
बेरोजगार लोगों का एक अलग पन्ना है
काम खूब करना है, दाम थोड़ा मिलना है ।
गोलियाँ छपी हैं , मर्दानगी बढ़ाने को
दूध कैसे लायेंगे , गोलियों को खाने को !
कहीं एक कोने में बलात्कार की खबर है
दो ही लाइनों में भ्रष्टाचार की खबर है ।
कहीं किसी छक्के पे कोटि - कोटि वारे हैं
कहीं बुलंद सितारों के गर्दिश में सितारे हैं ।
आप ये न सोचें कि यूं ही गढ़ रहा हूँ ।
सच कह रहा हूँ, अख़बार पढ़ रहा हूँ । ~ प्रवेश ~

Tuesday, December 30, 2014

नववर्ष मंगलमय हो

पूरब से उग आयेगा
फिर पश्चिम में छिप जायेगा
साँझ ढलेगी फिर वैसे
चंदा नभ में छा जायेगा
फिर ओस गगन से धीरे - धीरे
धरती पर उतरती है
ये भी वैसे ही गुजरेगी
जैसे हर रात गुजरती है,
भूखा, भूखा सो जायेगा
ठण्डा - ठण्डा पानी पीकर
बिन चादर के ठिठुरेगा
मर - मरकर और जी - जीकर,
चंदा - सूरज की साजिश से
फिर इक बार सुबह होगी
फिर हताश आशाओं की
नये दिन से सुलह होगी,
बेरोजगार फिर सड़कों पर
काम तलाशेगा दिन भर
घर से जैसा निकला था
वैसे ही शाम लौटेगा घर,
नया साल बस बदलेगा
कुछ इश्तहार अख़बारों पर
नए कैलेंडर लटकेंगे
घर - दफ्तर की दीवारों पर,
वही पिछला उपदेश सुनो
नित नवकर्म में तन्मय हो
सभी मित्रों - अमित्रों का
नववर्ष मंगलमय हो । ~ प्रवेश ~

Wednesday, December 24, 2014

कुहरा छाया हुआ सा है

समझकर चाँद सूरज को
मन भरमाया हुआ सा है ।
आँखों से शुरू होकर
कुहरा छाया हुआ सा है ।

नमी है, गीला - गीला है
खड़े पेड़ों के घेरे में,
शबनम ने इन्हें शब भर
नहलाया हुआ सा है ।

दुबक ख़ामोश बैठे हैं
परिंदे भी घरौंदों में,
सख्तमिज़ाज बाप लौटकर
घर आया हुआ सा है ।

झीने - झीने से परदे से
बचाकर आँख झाँके है,
ये सूरज भी दुल्हनिया सा
शरमाया हुआ सा है ।

जो पीते हैं गरम पानी
पहनते हैं गरम कपड़े,
ये जाड़ा भी उनसे कोई
शह पाया हुआ सा है ।

नन्हे इस्कूली बच्चों से
घर से निकले मजूरों से,
सरहद पर रहते वीरों से
घबराया हुआ सा है । ~ प्रवेश 

Friday, December 5, 2014

आओ पढ लो मुझे

आओ पढ लो मुझे
जैसे पढी थी बचपन में
दो एक्कम दो
दो दूनी चार,
और कंठस्थ किया था
अ से अनार
आ से आम,
देखो ... देखो
तुम्हें आज भी याद है,
उसी मस्ती और
बेफिक्री से पढो |
देखो वैसे न रटना
जैसे रटे थे
बीजगणित के सूत्र,
मतलब के लिये पढे
पास हुए और भूल गये | ~ प्रवेश ~

Monday, November 10, 2014

जहाँ पतलून बँधती है , वहीँ कमर नहीं होती ।

जिनकी आँखों पे पट्टी हो,
उनकी सहर नहीं होती ।
चकाचौंध रहती है,
मगर रौशनी भर नहीं होती ॥

बात सलीके की छोड़ो,
बिगड़ी का नाम फैशन है ।
जहाँ पतलून बँधती है ,
वहीँ कमर नहीं होती ॥

बड़े - बूढ़े जो कहते हैं,
वो बात पते की होती है ।
कड़वी ज़रूर होती है
मगर ज़हर नहीं होती ॥

सब खेल पेट का होता है,
हर एक कहानी रोटी की ।
कभी तेरे घर नहीं होती,
कभी मेरे घर नहीं होती ॥

वो भूख मिटाने निकले हैं,
जो केवल मेवे खाते हैं ।
भूखे पिछवाड़े रहते हैं ,
इनको खबर नहीं होती ॥ ~ प्रवेश ~

Saturday, November 8, 2014

वक्त फिर कुछ इस तरह कटने लगा है |

वक्त फिर कुछ इस तरह कटने लगा है |
एक - एक दिन साल सा लगने लगा है ||
आँखों में सपने कई पलने लगे हैं |
दिल भी सौ - सौ ख़्वाब अब बुनने लगा है ||
मैं लगाये पंख जैसे उड़ रहा हूँ |
साथ में सारा जहां उड़ने लगा है ||
अजनबी तू कौन है, नहीं जानता हूँ |
मगर हर रिश्ते से तू जुड़ने लगा है ||
आ सुनूं तेरी, मैं कुछ अपनी सुनाऊँ |
मेरा मैं अब मुझसे ही लड़ने लगा है || ~ प्रवेश ~

Thursday, October 9, 2014

हम मँझधार में अटके हुए लोग

दाहिने हाथ की तरफ बैठे हुए
भाइयो एवं बहनो
हम मँझधार में अटके हुए लोग
समर्थक हैं आपके
कट्टर समर्थक।

हमारा कर्तव्य है
आपके हर कार्य को
उचित सिद्ध करना
आपके हर वक्तव्य को
प्रासंगिक रूप देना ।

आप तो जानते हैं
आपके लिए हम लगा देते हैं
एड़ी - चोटी का जोर
और सम्पूर्ण बुद्धि कौशल,
ये बायीं ओर वाले
हमें अंधभक्त भी कहते हैं ।

और तुम भी सुन लो
बायीं तरफ खड़े लोगो
क्योंकि हम कट्टर समर्थक हैं
दाहिनी तरफ वालों के
तो इसलिए तुम्हारे सही कदम को भी
गलत साबित करने में
हम वही जी - जान लगाते हैं
जो दाहिनी ओर वालों के
गलत को सही करने में लगाते हैं ।

अब गौर से सुनो
आर -पार वालो
हम मँझधार में हैं
क्योंकि तुम लोग
इस्तेमाल करते हो हमें
अपने पाले बदलने के लिए,
तुम्हारी नौका भर बनकर रह जाते हैं हम
मर - खप  तक जाते हैं तुम्हें पार लगाने में । ~ प्रवेश 

Friday, September 19, 2014

हर बूँद कीमती होती है

हर बूँद कीमती होती है
जब खून पसीना होता है

जी - जी कर मरना होता है
मर - मर के जीना होता है

पल - पल मुश्किल से कटता है
दिन एक महीना होता है

आवाज दफ़न हो जाती है
अश्कों को पीना होता है

वो गलत, गलत नहीं होते
तू  सही, सही ना होता है

सोचो तनिक विचार करो
ये भी कोई जीना होता है ! ~ प्रवेश ~

Tuesday, September 16, 2014

बदलाव

बदलाव के बिना
विकास की यात्रा अधूरी है
आगे बढ़ने के लिए
बदलाव जरूरी है
मगर आज भी बड़ी भूख
छोटी आँत में ही बसती है
तारीखें दीवार पर और
सरकार दिल्ली में बदलती है | ~ प्रवेश ~

Friday, September 5, 2014

किस - किस को नमन करूँ

किस - किस को नमन करूँ
क्यों ना सबको नमन करूँ

माता की उँगली  पकड़कर
धरती पर पग धरना सीखा
और पिता की पकड़ कलाई
स्वछन्द विचरना सीखा

फल की लदी डालियों से
परहित में झुक जाना सीखा
जिस पत्थर ने ठोकर दी
उस पत्थर से रुक जाना सीखा

सागर से सीखा है मैंने
बिना भेद सबको अपनाना
नदियों ने सिखलाया मुझको
सदा निरंतर बहते जाना

चंदा सिखलाता है हम को
सब पर शीतलता बरसाना
सूरज शिक्षा देता  हमको
अंधकार को दूर भगाना

विकट परिस्थिति में खुश रहना
सीखा है मैंने फूलों से
अपनी भूलों से भी सीखा
सीखा औरों की भूलों से

मैं जब पथिक  हो जाता हूँ
सब मार्गदर्शक हो जाते हैं
मैं जब शिष्य बन जाता हूँ
सब तब शिक्षक हो जाते हैं

किस - किस को नमन करूँ
क्यों ना सबको नमन करूँ  । ~ प्रवेश ~ 

Sunday, August 17, 2014

आओ पीठ खुजायें

आओ पीठ खुजायें
आओ पीठ खुजायें
हम सोशल नेटवर्क के बन्दे
ऐसी रस्म निभायें
आओ पीठ खुजायें

तुम मुझको दो लाइक देना
दो मैं तुमको दूँगा
लेन - देन हो खरा- खरा
उधार नहीं रखूँगा
पारदर्शिता अपनायें
आओ पीठ खुजायें -2

तुम मुझको अच्छा कह देना
मैं भी वाह - वाह करूँगा
जितने भी मैं कमेंट करूँ
उतनी ही चाह करूँगा
मिलकर भूख बढ़ायें
आओ पीठ खुजायें -2

तुम जो भी लिख दोगे
कभी न ऊल-जुलूल कहूँगा
मीन-मेख जो ढूँढेगा
उसकी ही भूल कहूँगा
ऐसा सामंजस्य बिठायें
आओ पीठ खुजायें -२

हम सोशल नेटवर्क के बन्दे
ऐसी रस्म निभायें
आओ पीठ खुजायें
आओ पीठ खुजायें | ~ प्रवेश ~

Thursday, July 31, 2014

विकास का बाप

अपना अंजाम सोचकर
काँप उठते हैं पहाड़,

दबी आवाज में
बतियाने लगते हैं
बूढ़े दरख़्त,

डर के मारे
दम तोड़ देती हैं
छोटी - छोटी झाड़ियाँ,

चट्टानों को मिर्गी के
दौरे आने लगते हैं,

झाड़ियों के बीच
मुर्गी इंतजार करती है
चूजों के जल्दी बड़े  होने का,

मन  ही मन
विलाप करते हैं लोग
बीच में आते हैं जिनके
खेत - मकान - दुकान
और रोजी का जरिया ,

जब विकास का बाप
अपनी क्रूर चाल से
बढ़ता है पहाड़ों में
सड़कों के नाम पर
सीना चीरने पहाड़ का
और न्यौता देता है
बाढ़ - भूस्खलन के साथ
पहाड़ों के विनाश को । ~ प्रवेश ~


Friday, June 20, 2014

रचना - रच ना |

तू रच ना
रचेगा तो
ख़त्म हो जाएगी
मौलिकता |
फूटने दे
ज्वालामुखी की तरह,
पानी सा बह जाने दे ,
रचेगा तो
दुनिया फिर कहेगी
रचना - रच ना | ~ प्रवेश ~