ये सड़क जो जा रही है
शहर से गाँव
इसे ढोना था विकास
ताकि थकें ना पाँव ।
ये लाती है गाँव से
लुभाकर जवान
छोड़ देती है शहर में
हैरान - परेशान
वहाँ बंजर होते हैं खेत
गाँव वीरान
छूट जाते हैं पीछे
बेबस - असहाय
इसी सड़क को तो लगेगी
बुजुर्गों की हाय
जिन युवाओं को शहर लाकर
छोड़ देती है
गाँव से उनका सम्बन्ध ही
तोड़ देती है
ऐ सड़क !
तुझे है मेरी राय
तुझे नहीं लगेगी हाय
जो तू एक काम कर जाय
जैसे गाँव से जनता लाय
वैसे वापस भी पहुँचाय। ~ प्रवेश ~
सींचा जिसको आठ माह तक
तुमने अपने रक्त से
कितने सपने देखे थे
दोनों कितने आसक्त थे ।
देखा तुमने
इस दुनिया में आशा
भी चोरी हो जाती है
धू-धू जलते हैं सपने
रौशनी खो जाती है।
तुम पकड़कर कोई कोना
सुबक - सुबक रो लेती हो
अपने मन की दबी टीस को
आँसू से धो लेती हो।
हाथ तुम्हारा लिये हाथ में
मैं तुमको समझाता हूँ
मत रो मत रो कहता हूँ
खुद अंदर अश्रु बहाता हूँ।
मैं दिखा नहीं सकता आँसू
वरना तुम फिर से रो दोगी
आँखें मसल- मसलकर
इनकी ज्योत भी खो दोगी।
कभी नहीं जो जन्मा था
क्यों उसकी मृत्यु का शोक करें !
क्यों डूबें हम अन्धकार में
जीवन का आलोक हरें ! ~ प्रवेश ~
Sunday, October 2, 2016
मेरे पास नहीं आयेगा तो किधर जायेगा।
मैं भी हौंसला न दूँगा तो बिखर जायेगा।।
मेरा जो अच्छा वक़्त था मेरा नहीं रहा।
मेरा बुरा वक़्त भी गुज़र जायेगा।।
अपने घर में तो कुत्ता शेर होता है।
उसको आँख दिखा दो तो डर जायेगा।।
वो कतई भरोसे के काबिल नहीं है।
हाथ मिलायेगा मुकर जायेगा।।
कभी होश वालो समझाओ तो शराबी को।
वो मैखाना छोड़कर सीधा घर जायेगा।। ~ प्रवेश ~
बेटा उत्तराखण्ड पुलिस में हवलदार है
शादी के लिए कब से तैंयार है
इसी बात पे हर बार अटक जाती है गाड़ी
दहेज की सूची में शामिल महंगी कार है।
सरकारी स्कूल में पढता था, सस्ती ही पढाई थी
दसवीं कक्षा में दो विषयों में नैया डुबाई थी
हट्टा - कट्टा था, जरा सा दौड़ लेता था
हवलदारी भी उसके जीजा ने दिलाई थी।
उसका बाप कहता है मैंने पैंसा लगाया है
घूस में रुपया पानी सा बहाया है
इसीलिये दहेज में एक कार मांगी है
जिसने जो गँवाया है, इसी मौके से पाया है।
जो अफसरों के मुँह में रुपया ठूँस देते हैं
हवलदारी की खातिर भी मोटी घूस देते हैं
दहेज की तृष्णा कभी मिटती नहीं उनकी
लड़की वालों का सारा लहू चूस लेते हैं।
इनके लिए रिश्ता महज व्यापार है
मेरी ओर से इनका कड़ा प्रतिकार है
इससे अधिक प्रवेश भला क्या कह पायेगा
धिक्कार है ! धिक्कार है ! धिक्कार है !! ~ प्रवेश ~
शब्दों को अब समझ न रही
अच्छे- बुरे की परख न रही
सार्वजनिक मंच क्या मिला
कि भूल गए खुद को ही
न हलन्त न विसर्ग की परवाह
न छोटी - बड़ी मात्रा की फ़िक्र
न मेल - मिलाप का तरीका
न भावों की कद्र
अपना स्वरुप तक तो याद नहीं
फिर भी लज्जाहीन उछल - कूद
नहीं जानते कि इनकी नासमझी
नष्ट कर देती है नवांकुरित कवियों को
लेखकों को गर्भ में ही मार देती है । ~ प्रवेश ~
कहते हो आयेगा जमाना और भी ख़राब
कल की तो छोड़िये आप पहले आज कीजिये।
गाली बिना बोल मुख से ना झरता है एक
छोटे - बड़े का तो थोड़ा सा लिहाज कीजिये।
आज नहीं सुधरे जो कल तो बिगड़ना है
सुधरने का आप खुद से आगाज़ कीजिये।
चरित सुधर जाये बोल जो सुधर गए
फिर जिसके चाहिए दिलों पे राज कीजिये। ~ प्रवेश ~
तेज हवा आती है,
धूल - मिट्टी की भभूत लाती है,
टिन की छतें
बजती हैं थाली सी,
पेड़ नाचते हैं
किसी आत्मा के प्रभाव से,
फिर बादल छिड़कते हैं
कुछ बूँदें गोमूत्र की तरह
और प्रकृति की जागर
पूरी हो जाती है। ~ प्रवेश~