मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Tuesday, July 11, 2017

चुप रह, बोल मत

चुप रह, बोल मत
जुबाँ अपनी खोल मत

होनी को झेल ले
बात ज्यादा तोल मत

कमा, खा, ऐंश कर
जेबें टटोल मत

ऊँचा  सोच, नीचा सोच
ज़हर मगर घोल मत

सीधी कह, सच्ची कह
बातें कर गोल मत

या फिर

चुप रह बोल मत
जुबाँ अपनी खोल मत। ~ प्रवेश ~

2 comments:

  1. छोटी बहर की लाजवाब ग़ज़ल ... तीखे से शेर जो चुभते हैं ... लाजवाब ...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (13-07-2017) को "पाप पुराने धोता चल" (चर्चा अंक-2665) (चर्चा अंक-2664) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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