मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Wednesday, November 16, 2011

काश ! कि बचपन लौट के आता |


काश ! कि बचपन लौट के आता |


काश ! कि बचपन लौट के आता |

मैं फिर से बच्चा बन जाता |

काश कि बचपन लौट के आता |


कोई मुझको डांट लगाता ,

तो झट बाबा को बतलाता |

बाबा डांट लगाते जब तो ,

माँ के आँचल में छिप जाता |


मैं बस मेरे मन की करता ,

वश तो किसी का  चल नहीं पाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |


खेलता अपने ही साये से ,

तरह - तरह के नक्श बनाता |

कभी कूदता , कभी उछलता ,

हँसता कभी , कभी रूठ भी जाता |


कभी कृष्ण तो कभी सुदामा ,

और कभी राधा बन जाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |


राग - द्वेष न पास  फटकता,

दंभ - कपट न मन में होता |

ईर्ष्या - छल का ज्ञान न होता ,

न पापी भाव जहन में होता |


बच्चों में भगवान  सुना  है  ,

और मैं भी भगवन बन जाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |


सब अपने , अपने ही होते ,

कोई भी तब गैर न होता |

सारे मन के मीत ही होते ,

और किसी से बैर न होता |



केवल प्रेम की भाषा होती ,

नफरत क्या है , जान न पाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |

                                             

                                                        "प्रवेश "

2 comments:

  1. bahut khubsurat rachna , kash!ki bachpan lout ke aata pravesh bisht jee...bahut mithi yadein judi hain aapki kavita se...

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  2. Fir se wo bachpan jino ko g krta hai

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