मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, June 8, 2018

हर कोई शेर है, हर कोई बादशाह
हर कोई हर किसी को डरा चाहिए

शक़्ल असली छिपाते रहे उम्र भर
चेहरे पर एक और चेहरा चाहिए

दिन भटकते - भटकते निकल जाता है
सांझ ढलते ही इक आसरा चाहिए

सोचने वाले तो सोचते रह गए
इश्क़ करने को तो बावरा चाहिए

आजकल  की मोहब्बत खिलौनों सी है
एक टूटा नहीं के दूसरा चाहिए

आदमी को भरोसा किसी पर नहीं
हर जगह पर इसे कैमरा चाहिए ~ प्रवेश ~ 

Wednesday, February 7, 2018

पुता हुआ काँच

ज़न्नत में फरिश्तों ने
आईना टँगा दिया
अल्लाह ने देखा।
स्वर्ग में देवदूतों ने
दरपन टँगा दिया
भगवान ने देखा।
दोनों को चेहरा दिखा
एक - दूसरे का।
दरअसल दोनों ही
पुता हुआ काँच है। ~ प्रवेश ~

Monday, January 29, 2018

समर्थक

ये जो कट्टर समर्थक हैं
पक्ष और विपक्ष के
जो उतारू हैं
मरने - मारने पर
लड़ने वाले उन दो मेंडों की तरह हैं
जिनमें से जीतने वाला
देवता को चढे़गा
और हारने वाले की दावत
पूरा गाँव खायेगा । ~ प्रवेश ~

Monday, January 1, 2018

छपा कौन ?

ओ हो हो
छप चुके महाशय जी
कैसे हैं आप
कैसी हैं आपकी किताबें
कुछ बिकीं भी या
सब बाँटनी ही पड़ी
उपहार-स्वरूप !!
आपने कहा था ना
हमारा लिखा
कोई छापेगा नहीं
बस यूं ही काटते - चिपकाते रहेंगे
फेसबुक से ब्लॉग
ब्लॉग से वाट्सऐप
वाट्सऐप से फिर फेसबुक पर।
मगर सुनिये जनाब
आपको लिख के देते हैं
पूरे होश-ओ-हवास में,
जिस दिन धूल खा रही होंगी
आपकी किताबें
या जिस दिन खायी जा रही होंगी
उनमें जलेबी - पकौड़ियाँ
उस दिन भी चोरी हो रहा होगा
हमारा लिखा
फेसबुक से ब्लॉग
ब्लॉग से वाट्सऐप
वाट्सऐप से फिर फेसबुक पर,
लोग फिर से छप रहे होंगे
किताबें बाँटने के लिए
हमारा लिखा अपने नाम करके।
पर जरा सोचो
छपा कौन ? ~ प्रवेश ~

Sunday, November 19, 2017

गण्डक भिड़ गए हाथी से
जोशीले - करामाती से
भौं - भौं करते, कूं कां करते
गुस्सा होते, गाली बकते
बिगड़ैले उत्पाती से
गण्डक भिड़ गए हाथी से

हाथी तो मतवाला है
उसका अंदाज निराला है
कान नहीं देता भौं- भौं पर
वाकिफ़ गण्डक की जाति से
गण्डक भिड़ गए हाथी से

गण्डक गंदा काम करें
हाथी को बदनाम करें
हाथी राजा को परवाह नहीं
गण्डक की बकबाती से
गण्डक भिड़ गए हाथी से। ~ प्रवेश ~

Monday, November 13, 2017

पहाड़ों की आस

कुछ उम्मीद बँधी है पहाड़ों को
अपनों के लौट आने की
जो मुँह फेर गये थे
शहर की चकाचौंध से खिंचकर
क्योंकि अब धुंध से धुँधली पड़ रही है
शहर की चमक।
भवनों और वाहनों के जंगल में
हर साँस भारी होती जा रही है
ज़ान के लाले पड़ने को हैं
ज़हर घुला है दोनों में
हवा और राजअनीति
हर शख्स पर भारी है
हर श्वाँस पर भारी है।
बड़े भोले हैं पहाड़
नहीं जानते कि जो छोड़ चुके हैं
मरकर भी नहीं लौटेंगे
ताजी हवा, शीतल पानी
गुनगुनी धूप और मीठी बोली से इतर
पेट भरने को लगती है दो वक्त की रोटी
पहाड़ी भात भी खाते हैं
जो पहाड़ नहीं दे पायेंगे
शहर दे रहे हैं
ऐसा सोचते हैं शहरी पहाड़ी।
भला !! क्यों लौटेंगे !! ~ प्रवेश ~

Tuesday, August 15, 2017

सीखा है

सच बोलना अपने घर से सीखा है।
झूठ मैंने तेरे शहर से सीखा है।

मैं समझता था गोलियों से मरते हैं लोग
ये हुनर मैंने तेरी नज़र से सीखा है।

कौन उंगली पकड़कर सिखाता है उम्र भर
बहुत कुछ मैंने इधर - उधर से सीखा है।

वक़्त तबीयत से तराशेगा एक दिन
चोट खाना बुत बने पत्थर से सीखा है।

झुकना कभी कहीं मेरी तालीम में न था
ज़माने ये मैंने तेरे डर से सीखा है। ~ प्रवेश ~

Friday, August 11, 2017

लिख दूँ

तुम कहो मैं किस्सा तुम्हारी ज़बानी लिख दूँ।
दो बात कहूँ और सारी कहानी लिख दूँ।

सारा शहर सुबह से खड़ा है कतार में।
आग ही लग जाये जो पानी लिख दूँ।

दो दिन अगर जो ज़िन्दगी के चैन से गुजरें।
तो नाम तेरे चार दिन की जवानी लिख दूँ।

तू साथ हो तो हर दिन खूबसूरत हो।
तू साथ हो तो हर शाम सुहानी लिख दूँ। ~ प्रवेश ~

Wednesday, August 9, 2017

भेड़िये आ गए हैं

सँभालो बेटियाँ कि भेड़िये आ गए हैं।
नोंच डालेंगे बोटियाँ कि भेड़िये आ गए हैं।

कितनी लम्बी हो कुर्ती, कितना लम्बा हो दुपट्टा
कितना लम्बा घूंघट हो, बताने भेड़िये आ गए हैं।

कब जाना है दफ़्तर, कब आना है वापस
कब निकलना है घर से, बताने भेड़िये आ गए हैं।

कितनी उठानी है नज़र, कितनी झुकानी है नज़र
कितनी मिलानी है नज़र, बताने भेड़िये आ गए हैं।

क्यों डरेंगीं बेटियाँ अगर भेड़िये आ गए हैं
डटकर लड़ेंगीं बेटियाँ अगर भेड़िये आ गए हैं। ~ प्रवेश ~

Sunday, August 6, 2017

दिलों की दूरियाँ मोहब्बत से पाट आऊँ।
चुटकी भर इश्क सबको बाँट आऊँ।

तुम्हारे साथ फिर से शाम को घूमने निकलूं।
तुम्हारे साथ उसी ठेले पर चाट खाऊँ।

मैं चाहता हूँ फिर कोई ग़लती हो मुझसे ।
मैं चाहता हूँ फिर माँ की डाँट खाऊँ। ~ प्रवेश ~