मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Sunday, November 19, 2017

गण्डक भिड़ गए हाथी से
जोशीले - करामाती से
भौं - भौं करते, कूं कां करते
गुस्सा होते, गाली बकते
बिगड़ैले उत्पाती से
गण्डक भिड़ गए हाथी से

हाथी तो मतवाला है
उसका अंदाज निराला है
कान नहीं देता भौं- भौं पर
वाकिफ़ गण्डक की जाति से
गण्डक भिड़ गए हाथी से

गण्डक गंदा काम करें
हाथी को बदनाम करें
हाथी राजा को परवाह नहीं
गण्डक की बकबाती से
गण्डक भिड़ गए हाथी से। ~ प्रवेश ~

Monday, November 13, 2017

पहाड़ों की आस

कुछ उम्मीद बँधी है पहाड़ों को
अपनों के लौट आने की
जो मुँह फेर गये थे
शहर की चकाचौंध से खिंचकर
क्योंकि अब धुंध से धुँधली पड़ रही है
शहर की चमक।
भवनों और वाहनों के जंगल में
हर साँस भारी होती जा रही है
ज़ान के लाले पड़ने को हैं
ज़हर घुला है दोनों में
हवा और राजअनीति
हर शख्स पर भारी है
हर श्वाँस पर भारी है।
बड़े भोले हैं पहाड़
नहीं जानते कि जो छोड़ चुके हैं
मरकर भी नहीं लौटेंगे
ताजी हवा, शीतल पानी
गुनगुनी धूप और मीठी बोली से इतर
पेट भरने को लगती है दो वक्त की रोटी
पहाड़ी भात भी खाते हैं
जो पहाड़ नहीं दे पायेंगे
शहर दे रहे हैं
ऐसा सोचते हैं शहरी पहाड़ी।
भला !! क्यों लौटेंगे !! ~ प्रवेश ~

Tuesday, August 15, 2017

सीखा है

सच बोलना अपने घर से सीखा है।
झूठ मैंने तेरे शहर से सीखा है।

मैं समझता था गोलियों से मरते हैं लोग
ये हुनर मैंने तेरी नज़र से सीखा है।

कौन उंगली पकड़कर सिखाता है उम्र भर
बहुत कुछ मैंने इधर - उधर से सीखा है।

वक़्त तबीयत से तराशेगा एक दिन
चोट खाना बुत बने पत्थर से सीखा है।

झुकना कभी कहीं मेरी तालीम में न था
ज़माने ये मैंने तेरे डर से सीखा है। ~ प्रवेश ~

Friday, August 11, 2017

लिख दूँ

तुम कहो मैं किस्सा तुम्हारी ज़बानी लिख दूँ।
दो बात कहूँ और सारी कहानी लिख दूँ।

सारा शहर सुबह से खड़ा है कतार में।
आग ही लग जाये जो पानी लिख दूँ।

दो दिन अगर जो ज़िन्दगी के चैन से गुजरें।
तो नाम तेरे चार दिन की जवानी लिख दूँ।

तू साथ हो तो हर दिन खूबसूरत हो।
तू साथ हो तो हर शाम सुहानी लिख दूँ। ~ प्रवेश ~

Wednesday, August 9, 2017

भेड़िये आ गए हैं

सँभालो बेटियाँ कि भेड़िये आ गए हैं।
नोंच डालेंगे बोटियाँ कि भेड़िये आ गए हैं।

कितनी लम्बी हो कुर्ती, कितना लम्बा हो दुपट्टा
कितना लम्बा घूंघट हो, बताने भेड़िये आ गए हैं।

कब जाना है दफ़्तर, कब आना है वापस
कब निकलना है घर से, बताने भेड़िये आ गए हैं।

कितनी उठानी है नज़र, कितनी झुकानी है नज़र
कितनी मिलानी है नज़र, बताने भेड़िये आ गए हैं।

क्यों डरेंगीं बेटियाँ अगर भेड़िये आ गए हैं
डटकर लड़ेंगीं बेटियाँ अगर भेड़िये आ गए हैं। ~ प्रवेश ~

Sunday, August 6, 2017

दिलों की दूरियाँ मोहब्बत से पाट आऊँ।
चुटकी भर इश्क सबको बाँट आऊँ।

तुम्हारे साथ फिर से शाम को घूमने निकलूं।
तुम्हारे साथ उसी ठेले पर चाट खाऊँ।

मैं चाहता हूँ फिर कोई ग़लती हो मुझसे ।
मैं चाहता हूँ फिर माँ की डाँट खाऊँ। ~ प्रवेश ~

Friday, August 4, 2017

किसी को अपना बनाने में वक़्त लगता है।
इश्क बड़ा मर्ज है, दवा बनाने में वक़्त लगता है।

ज़ान की बाजी है, कोई खेल नहीं है।
मैदान में पैर जमाने में वक़्त लगता है।

मैं आज भी उसके ख़यालों में खोया रहता हूँ।
अच्छी यादों को भुलाने में वक़्त लगता है।

मुझे जल्दी नहीं है क्योंकि जानता हूँ।
रूठे यार को मनाने में वक़्त लगता है। ~ प्रवेश ~

Wednesday, July 19, 2017

गाँव के लोग

शहरी से हो गए हैं गाँव के लोग
खुद ही में खो गए हैं गाँव के लोग।

कभी एक का दर्द सबका दर्द होता था
अब बड़े बेदर्द हो गए हैं गाँव के लोग।

एक गाँव से दस गाँव की ख़बर रखते थे
अपनों से बेख़बर हो गए हैं गाँव के लोग।

किस्से कहानियों में रात कटती थी
टीवी - मोबाइल के हो गए हैं गाँव के लोग।

पलायन जिस तरह सबको बहाकर ला रहा है
इक दिन कहोगे ग़ायब हो गए हैं गाँव के लोग । ~ प्रवेश ~

Monday, July 17, 2017

ये तू मुझसे क्या चाहता है !

ये तू मुझसे क्या चाहता है !
दर्द देकर दवा चाहता है!!

बबूल पर आम नहीं लगते हैं।
दगा के बदले वफ़ा चाहता है!!

पैर अपनों की छाती पे रखकर
बता कौन सा आसमाँ चाहता है!!

भला कह, भला सुन, भला लिख, भला कर।
अपना अग़र तू भला चाहता है।।

कभी आईने से भी बतिया लिया कर।
खुद से कहाँ भागना चाहता है !! ~ प्रवेश ~

Tuesday, July 11, 2017

चुप रह, बोल मत

चुप रह, बोल मत
जुबाँ अपनी खोल मत

होनी को झेल ले
बात ज्यादा तोल मत

कमा, खा, ऐंश कर
जेबें टटोल मत

ऊँचा  सोच, नीचा सोच
ज़हर मगर घोल मत

सीधी कह, सच्ची कह
बातें कर गोल मत

या फिर

चुप रह बोल मत
जुबाँ अपनी खोल मत। ~ प्रवेश ~