Tuesday, October 4, 2016

कैसे कह दूँ बस अब मत रो !

सींचा जिसको आठ माह तक
तुमने अपने रक्त से
कितने सपने देखे थे
दोनों कितने आसक्त थे ।
देखा तुमने
इस दुनिया में आशा
भी चोरी हो जाती है
धू-धू जलते हैं सपने
रौशनी खो जाती है।
तुम पकड़कर कोई कोना
सुबक - सुबक रो लेती हो
अपने मन की दबी टीस को
आँसू से धो लेती हो।
हाथ तुम्हारा लिये हाथ में
मैं तुमको समझाता हूँ
मत रो मत रो कहता हूँ
खुद अंदर अश्रु बहाता हूँ।
मैं दिखा नहीं सकता आँसू
वरना तुम फिर से रो दोगी
आँखें मसल- मसलकर
इनकी ज्योत भी खो दोगी।
कभी नहीं जो जन्मा था
क्यों उसकी मृत्यु का शोक करें !
क्यों डूबें हम अन्धकार में
जीवन का आलोक हरें ! ~ प्रवेश ~

Sunday, October 2, 2016

मेरे पास नहीं आयेगा तो किधर जायेगा।
मैं भी हौंसला न दूँगा तो बिखर जायेगा।।

मेरा जो अच्छा वक़्त था मेरा नहीं रहा।
मेरा बुरा वक़्त भी गुज़र जायेगा।।

अपने घर में तो कुत्ता शेर होता है।
उसको आँख दिखा दो तो डर जायेगा।।

वो कतई भरोसे के काबिल नहीं है।
हाथ मिलायेगा मुकर जायेगा।।

कभी होश वालो समझाओ तो शराबी को।
वो मैखाना छोड़कर सीधा घर जायेगा।। ~ प्रवेश ~


Sunday, September 25, 2016

बूँद का प्यासा था, समंदर ढूँढ़ने निकला

बूँद का प्यासा था, समंदर ढूँढ़ने निकला।
अंदर झाँक न पाया, बाहर ढूँढ़ने निकला।

चादर के बराबर जब सिकुड़ पाये न पाँव उसके।
पाँवों से लम्बी चादर ढूँढ़ने निकला।

कर दिया अपनों ने जब अपनों में बेग़ाना।
अपने ही घर में अपना घर ढूँढ़ने निकला।

नेकी भी बनकर बदी जब सामने आई।
हारकर खुदा का दर ढूँढ़ने निकला। ~ प्रवेश ~

धिक्कार है

बेटा उत्तराखण्ड पुलिस में हवलदार है
शादी के लिए कब से तैंयार है
इसी बात पे हर बार अटक जाती है गाड़ी
दहेज की सूची में शामिल महंगी कार है।
सरकारी स्कूल में पढता था, सस्ती ही पढाई थी
दसवीं कक्षा में दो विषयों में नैया डुबाई थी
हट्टा - कट्टा था, जरा सा दौड़ लेता था
हवलदारी भी उसके जीजा ने दिलाई थी।
उसका बाप कहता है मैंने पैंसा लगाया है
घूस में रुपया पानी सा बहाया है
इसीलिये दहेज में एक कार मांगी है
जिसने जो गँवाया है, इसी मौके से पाया है।
जो अफसरों के मुँह में रुपया ठूँस देते हैं
हवलदारी की खातिर भी मोटी घूस देते हैं
दहेज की तृष्णा कभी मिटती नहीं उनकी
लड़की वालों का सारा लहू चूस लेते हैं।
इनके लिए रिश्ता महज व्यापार है
मेरी ओर से इनका कड़ा प्रतिकार है
इससे अधिक प्रवेश भला क्या कह पायेगा
धिक्कार है ! धिक्कार है ! धिक्कार है !! ~ प्रवेश ~

माँ समझती है

मैं बोल न पाऊँ हर वो जुबाँ समझती है।
मेरी फ़र्जी मुस्कान को भी माँ समझती है।

बच्चे भूल जाते हैं जिसे तरक्की की दौड़ में।
माँ उनके हर दुःख - दर्द को अपना समझती है।

बेटा आज जिसको सिर्फ ऐ बुढिया बुलाता है।
वो उसको आज भी कलेजे का टुकड़ा समझती है।

जब नासमझ थे और अब जब समझदार हैं बच्चे ।
माँ तब भी समझती थी, माँ ही अब भी समझती है।

उसको तैश आता है, छोटी सी ख़ता पर भी।
उसके गुनाह भी हों तो माँ बच्चा समझती है। ~ प्रवेश ~

Wednesday, August 17, 2016

शब्द उद्दण्ड हो गए

शब्दों को अब समझ न रही
अच्छे- बुरे की परख न रही
सार्वजनिक मंच क्या मिला
कि भूल गए खुद को ही
न हलन्त न विसर्ग की परवाह
न छोटी - बड़ी मात्रा की फ़िक्र
न मेल - मिलाप का तरीका
न भावों की कद्र
अपना स्वरुप तक तो याद नहीं
फिर भी लज्जाहीन उछल - कूद
नहीं जानते कि इनकी नासमझी
नष्ट कर देती है नवांकुरित कवियों को
लेखकों को गर्भ में ही मार देती है । ~ प्रवेश ~




Sunday, July 17, 2016

सुधार

कहते हो आयेगा जमाना और भी ख़राब
कल की तो छोड़िये आप पहले आज कीजिये।
गाली बिना बोल मुख से ना झरता है एक
छोटे - बड़े का तो थोड़ा सा लिहाज कीजिये।
आज नहीं सुधरे जो कल तो बिगड़ना है
सुधरने का आप खुद से आगाज़ कीजिये।
चरित सुधर जाये बोल जो सुधर गए
फिर जिसके चाहिए दिलों पे राज कीजिये। ~ प्रवेश ~

Sunday, June 12, 2016

प्रकृति की जागर

तेज हवा आती है,
धूल - मिट्टी की भभूत लाती है,
टिन की छतें
बजती हैं थाली सी,
पेड़ नाचते हैं
किसी आत्मा के प्रभाव से,
फिर बादल छिड़कते हैं
कुछ बूँदें गोमूत्र की तरह
और प्रकृति की जागर
पूरी हो जाती है। ~ प्रवेश~

Tuesday, March 1, 2016

मायका और ससुराल

कल कविता बस में मिली
उल्लास के साथ
मायके से आ रही थी
ससुराल को जा रही थी
हँसते - बतियाते
अन्ताक्षरी  खेलते
बेझिझक - बेपरवाह
एक - दूजे को रिझाते ।
जैसे ही गाडी रुकी
कविता की नजर झुकी
आ गया ससुराल
घूँघट दिया डाल
देखा अगल - बगल, आस -पास
पीछे रह गया उल्लास । ~ प्रवेश ~



Friday, February 12, 2016

चुनाव आ गया है

मुझको देखते ही रुक गया वो
दुआ सलाम करने झुक गया वो
जो  कुछ भी मुझे नहीं मानता था
जो मेरा नाम तक ना जानता  था
मुझे कहने लगा कैसे हो भाई
सड़क गन्दी है या होती सफाई
क्या पानी रोज नल में आ रहा है
मुझे बच्चा समझ समझा रहा है
मैं भी चुपचाप सुनता जा रहा हूँ
माथे पर सलवटें ला रहा हूँ
कैसे पूछे ये मेरा हाल देखो
बदली- बदली है इसकी चाल देखो
इसके चेहरे पे दीन  भाव आ गया है
चुनाव आ गया है - चुनाव आ गया है । ~ प्रवेश ~

Friday, December 18, 2015

घबरा मत

घबरा मत .. तिलमिला नहीं ।
तूने जब कुछ किया नहीं ॥

डरना काम है झूठों का ।
सच को किसी ने छुआ नहीं ॥

बोला जो  उघड़ता जायेगा ।
चुप रहा किसी से खुला नहीं ॥

खुद से ज्यादा विश्वास न कर ।
तेरे काम में कोई सगा नहीं ॥

बकती है दुनिया बका करे ।
इससे  काम तो दूजा हुआ नहीं ॥ ~ प्रवेश 

Monday, November 30, 2015

पीछे देखना

पीछे देखना
मोती छोड़ आये तो
बुरा नहीं है। ~प्रवेश~

Saturday, October 24, 2015

तय है

बकरियों का रेवड़ जा रहा है
कसाई - बाड़े की तरफ
काली - सफ़ेद
भूरी - चितकबरी
सींग वाली
बिना सींग की
बाँझ - गाभन - दुधारू
बूढी - जवान
सुन्दर मेमने
बकरे भी हैं
दाढ़ी वाले
बिना दाढ़ी के
किसी पर छपा है
कोई पवित्र निशान
समय हाँक रहा है
कसाई बनकर ,
यहाँ सभी कटेंगे
बिना लाड़ - प्यार के
बिना भेदभाव के
सबके गले रेते जायेंगे ।
बकरे नहीं भूले हैं
दाढ़ी और सींगों की धौंस जमाना
जबकि जानते हैं
तय है जान जाना । ~ प्रवेश ~