मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, August 4, 2017

किसी को अपना बनाने में वक़्त लगता है।
इश्क बड़ा मर्ज है, दवा बनाने में वक़्त लगता है।

ज़ान की बाजी है, कोई खेल नहीं है।
मैदान में पैर जमाने में वक़्त लगता है।

मैं आज भी उसके ख़यालों में खोया रहता हूँ।
अच्छी यादों को भुलाने में वक़्त लगता है।

मुझे जल्दी नहीं है क्योंकि जानता हूँ।
रूठे यार को मनाने में वक़्त लगता है। ~ प्रवेश ~

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (06-08-2017) को "जीवन में है मित्रता, पावन और पवित्र" (चर्चा अंक 2688 पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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