मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Wednesday, April 29, 2015

मानवता और प्रलय

जब भी कोई मुल्क
आपदा की चपेट में आता है,
मानवता का सबसे पावन 
रूप सामने आता है । 
छोटी - छोटी बातों पर जो 
आँख दिखाता बड़ी - बड़ी, 
तोड़ के सीमा का बंधन, 
पड़ौसी का धर्म निभाता  है । 

मानवता है गुण प्राकृतिक, 
और प्रलय भी प्राकृतिक है । 
प्रलय के जग जाने से 
मानवता जगना स्वाभाविक है । 
ह्रदय और मस्तिष्क परस्पर 
सामंजस्य बिठा लेते हैं, 
मानव का ऐसा चरित्र 
सच्चरित्र है और  नैतिक है । 

मानवता और प्रलय दोनों 
जाति - धर्म को नहीं मानते ,
दोनों ही नक़्शे पर खींची 
रेखाओं को नहीं जानते । 
फिर भी रेखाओं के ऊपर 
रेखाएँ खींचे जाते हैं 
मानवता सो जाती है और 
अब के मानव नहीं मानते । ~ प्रवेश 

1 comment: