मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Saturday, October 24, 2015

तय है

बकरियों का रेवड़ जा रहा है
कसाई - बाड़े की तरफ
काली - सफ़ेद
भूरी - चितकबरी
सींग वाली
बिना सींग की
बाँझ - गाभन - दुधारू
बूढी - जवान
सुन्दर मेमने
बकरे भी हैं
दाढ़ी वाले
बिना दाढ़ी के
किसी पर छपा है
कोई पवित्र निशान
समय हाँक रहा है
कसाई बनकर ,
यहाँ सभी कटेंगे
बिना लाड़ - प्यार के
बिना भेदभाव के
सबके गले रेते जायेंगे ।
बकरे नहीं भूले हैं
दाढ़ी और सींगों की धौंस जमाना
जबकि जानते हैं
तय है जान जाना । ~ प्रवेश ~

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (25-10-2015) को "तलाश शून्य की" (चर्चा अंक-2140) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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