मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, March 27, 2015

तुकबंदी जरूरी है ।

ये ना समझें मजबूरी है,
तुकबंदी जरूरी है ।
आ से आ तुक मिले न मिले
ई से ई भी भले न मिले
किन्तु मिले तुक भावों का
मिले तुक अनुभावों का ।
बात बेतुकी कौन सराहे
कोई सुनना तक न चाहे,
कभी किसी को कहो बेतुका
उसी समय हो धक्का मुक्का । 
तुक मिले ही रचना पूरी है,
तुकबंदी जरूरी है । ~ प्रवेश ~

7 comments:

  1. नवरात्रों की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (28-03-2015) को "जहां पेड़ है वहाँ घर है" {चर्चा - 1931} पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. धन्यवाद श्रीमान .. आपको भी नवरात्रि की मंगल कामनाएँ

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  2. तुक के साथ तुक्का भी चलेगा!

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  3. वाह, बहुत खूब

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