मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Tuesday, August 15, 2017

सीखा है

सच बोलना अपने घर से सीखा है।
झूठ मैंने तेरे शहर से सीखा है।

मैं समझता था गोलियों से मरते हैं लोग
ये हुनर मैंने तेरी नज़र से सीखा है।

कौन उंगली पकड़कर सिखाता है उम्र भर
बहुत कुछ मैंने इधर - उधर से सीखा है।

वक़्त तबीयत से तराशेगा एक दिन
चोट खाना बुत बने पत्थर से सीखा है।

झुकना कभी कहीं मेरी तालीम में न था
ज़माने ये मैंने तेरे डर से सीखा है। ~ प्रवेश ~

Friday, August 11, 2017

लिख दूँ

तुम कहो मैं किस्सा तुम्हारी ज़बानी लिख दूँ।
दो बात कहूँ और सारी कहानी लिख दूँ।

सारा शहर सुबह से खड़ा है कतार में।
आग ही लग जाये जो पानी लिख दूँ।

दो दिन अगर जो ज़िन्दगी के चैन से गुजरें।
तो नाम तेरे चार दिन की जवानी लिख दूँ।

तू साथ हो तो हर दिन खूबसूरत हो।
तू साथ हो तो हर शाम सुहानी लिख दूँ। ~ प्रवेश ~

Wednesday, August 9, 2017

भेड़िये आ गए हैं

सँभालो बेटियाँ कि भेड़िये आ गए हैं।
नोंच डालेंगे बोटियाँ कि भेड़िये आ गए हैं।

कितनी लम्बी हो कुर्ती, कितना लम्बा हो दुपट्टा
कितना लम्बा घूंघट हो, बताने भेड़िये आ गए हैं।

कब जाना है दफ़्तर, कब आना है वापस
कब निकलना है घर से, बताने भेड़िये आ गए हैं।

कितनी उठानी है नज़र, कितनी झुकानी है नज़र
कितनी मिलानी है नज़र, बताने भेड़िये आ गए हैं।

क्यों डरेंगीं बेटियाँ अगर भेड़िये आ गए हैं
डटकर लड़ेंगीं बेटियाँ अगर भेड़िये आ गए हैं। ~ प्रवेश ~

Sunday, August 6, 2017

दिलों की दूरियाँ मोहब्बत से पाट आऊँ।
चुटकी भर इश्क सबको बाँट आऊँ।

तुम्हारे साथ फिर से शाम को घूमने निकलूं।
तुम्हारे साथ उसी ठेले पर चाट खाऊँ।

मैं चाहता हूँ फिर कोई ग़लती हो मुझसे ।
मैं चाहता हूँ फिर माँ की डाँट खाऊँ। ~ प्रवेश ~

Friday, August 4, 2017

किसी को अपना बनाने में वक़्त लगता है।
इश्क बड़ा मर्ज है, दवा बनाने में वक़्त लगता है।

ज़ान की बाजी है, कोई खेल नहीं है।
मैदान में पैर जमाने में वक़्त लगता है।

मैं आज भी उसके ख़यालों में खोया रहता हूँ।
अच्छी यादों को भुलाने में वक़्त लगता है।

मुझे जल्दी नहीं है क्योंकि जानता हूँ।
रूठे यार को मनाने में वक़्त लगता है। ~ प्रवेश ~