मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Sunday, July 9, 2017

क्यों झूठी शान लिये फिरते हो।

क्यों झूठी शान लिये फिरते हो।
क्यों दिखावे की दुकान लिये फिरते हो!!

ये लोग किसी चीज की कीमत नहीं जानते।
क्यों हथेली पर ज़ान लिये फिरते हो !!

बड़ी जल्दी थक - हार - बैठ जाओगे।
क्यों बेवजह इतना सामान लिये फिरते हो!!

बचा सको तो अपने हिस्से की जमीन।
क्यों सर पर सारा आसमान लिये फिरते हो!!

तुम्हें ख़बर है वो ज़वाब न दे पाएंगे।
क्यों इम्तहान पे इम्तहान लिये फिरते हो!!

चुकाना ही होता है हर शख्स का हिसाब।
आप यूं ही सबका अहसान लिये फिरते हो!! ~ प्रवेश ~

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