मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Sunday, September 25, 2016

बूँद का प्यासा था, समंदर ढूँढ़ने निकला

बूँद का प्यासा था, समंदर ढूँढ़ने निकला।
अंदर झाँक न पाया, बाहर ढूँढ़ने निकला।

चादर के बराबर जब सिकुड़ पाये न पाँव उसके।
पाँवों से लम्बी चादर ढूँढ़ने निकला।

कर दिया अपनों ने जब अपनों में बेग़ाना।
अपने ही घर में अपना घर ढूँढ़ने निकला।

नेकी भी बनकर बदी जब सामने आई।
हारकर खुदा का दर ढूँढ़ने निकला। ~ प्रवेश ~

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