मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Sunday, September 25, 2016

धिक्कार है

बेटा उत्तराखण्ड पुलिस में हवलदार है
शादी के लिए कब से तैंयार है
इसी बात पे हर बार अटक जाती है गाड़ी
दहेज की सूची में शामिल महंगी कार है।
सरकारी स्कूल में पढता था, सस्ती ही पढाई थी
दसवीं कक्षा में दो विषयों में नैया डुबाई थी
हट्टा - कट्टा था, जरा सा दौड़ लेता था
हवलदारी भी उसके जीजा ने दिलाई थी।
उसका बाप कहता है मैंने पैंसा लगाया है
घूस में रुपया पानी सा बहाया है
इसीलिये दहेज में एक कार मांगी है
जिसने जो गँवाया है, इसी मौके से पाया है।
जो अफसरों के मुँह में रुपया ठूँस देते हैं
हवलदारी की खातिर भी मोटी घूस देते हैं
दहेज की तृष्णा कभी मिटती नहीं उनकी
लड़की वालों का सारा लहू चूस लेते हैं।
इनके लिए रिश्ता महज व्यापार है
मेरी ओर से इनका कड़ा प्रतिकार है
इससे अधिक प्रवेश भला क्या कह पायेगा
धिक्कार है ! धिक्कार है ! धिक्कार है !! ~ प्रवेश ~

No comments:

Post a Comment