मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Sunday, September 25, 2016

माँ समझती है

मैं बोल न पाऊँ हर वो जुबाँ समझती है।
मेरी फ़र्जी मुस्कान को भी माँ समझती है।

बच्चे भूल जाते हैं जिसे तरक्की की दौड़ में।
माँ उनके हर दुःख - दर्द को अपना समझती है।

बेटा आज जिसको सिर्फ ऐ बुढिया बुलाता है।
वो उसको आज भी कलेजे का टुकड़ा समझती है।

जब नासमझ थे और अब जब समझदार हैं बच्चे ।
माँ तब भी समझती थी, माँ ही अब भी समझती है।

उसको तैश आता है, छोटी सी ख़ता पर भी।
उसके गुनाह भी हों तो माँ बच्चा समझती है। ~ प्रवेश ~

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