मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Sunday, September 25, 2016

बूँद का प्यासा था, समंदर ढूँढ़ने निकला

बूँद का प्यासा था, समंदर ढूँढ़ने निकला।
अंदर झाँक न पाया, बाहर ढूँढ़ने निकला।

चादर के बराबर जब सिकुड़ पाये न पाँव उसके।
पाँवों से लम्बी चादर ढूँढ़ने निकला।

कर दिया अपनों ने जब अपनों में बेग़ाना।
अपने ही घर में अपना घर ढूँढ़ने निकला।

नेकी भी बनकर बदी जब सामने आई।
हारकर खुदा का दर ढूँढ़ने निकला। ~ प्रवेश ~

धिक्कार है

बेटा उत्तराखण्ड पुलिस में हवलदार है
शादी के लिए कब से तैंयार है
इसी बात पे हर बार अटक जाती है गाड़ी
दहेज की सूची में शामिल महंगी कार है।
सरकारी स्कूल में पढता था, सस्ती ही पढाई थी
दसवीं कक्षा में दो विषयों में नैया डुबाई थी
हट्टा - कट्टा था, जरा सा दौड़ लेता था
हवलदारी भी उसके जीजा ने दिलाई थी।
उसका बाप कहता है मैंने पैंसा लगाया है
घूस में रुपया पानी सा बहाया है
इसीलिये दहेज में एक कार मांगी है
जिसने जो गँवाया है, इसी मौके से पाया है।
जो अफसरों के मुँह में रुपया ठूँस देते हैं
हवलदारी की खातिर भी मोटी घूस देते हैं
दहेज की तृष्णा कभी मिटती नहीं उनकी
लड़की वालों का सारा लहू चूस लेते हैं।
इनके लिए रिश्ता महज व्यापार है
मेरी ओर से इनका कड़ा प्रतिकार है
इससे अधिक प्रवेश भला क्या कह पायेगा
धिक्कार है ! धिक्कार है ! धिक्कार है !! ~ प्रवेश ~

माँ समझती है

मैं बोल न पाऊँ हर वो जुबाँ समझती है।
मेरी फ़र्जी मुस्कान को भी माँ समझती है।

बच्चे भूल जाते हैं जिसे तरक्की की दौड़ में।
माँ उनके हर दुःख - दर्द को अपना समझती है।

बेटा आज जिसको सिर्फ ऐ बुढिया बुलाता है।
वो उसको आज भी कलेजे का टुकड़ा समझती है।

जब नासमझ थे और अब जब समझदार हैं बच्चे ।
माँ तब भी समझती थी, माँ ही अब भी समझती है।

उसको तैश आता है, छोटी सी ख़ता पर भी।
उसके गुनाह भी हों तो माँ बच्चा समझती है। ~ प्रवेश ~