मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Sunday, June 12, 2016

प्रकृति की जागर

तेज हवा आती है,
धूल - मिट्टी की भभूत लाती है,
टिन की छतें
बजती हैं थाली सी,
पेड़ नाचते हैं
किसी आत्मा के प्रभाव से,
फिर बादल छिड़कते हैं
कुछ बूँदें गोमूत्र की तरह
और प्रकृति की जागर
पूरी हो जाती है। ~ प्रवेश~

1 comment:

  1. सुन्दर चित्र खींचा है आपने

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