मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Tuesday, March 1, 2016

मायका और ससुराल

कल कविता बस में मिली
उल्लास के साथ
मायके से आ रही थी
ससुराल को जा रही थी
हँसते - बतियाते
अन्ताक्षरी  खेलते
बेझिझक - बेपरवाह
एक - दूजे को रिझाते ।
जैसे ही गाडी रुकी
कविता की नजर झुकी
आ गया ससुराल
घूँघट दिया डाल
देखा अगल - बगल, आस -पास
पीछे रह गया उल्लास । ~ प्रवेश ~